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धनतेरस पर करें दीपदान दूर होगा अकाल मृत्यु का भय


धनतेरस पर करें दीपदान दूर होगा अकाल मृत्यु का भय

मृत्यु का भय संसार में सबसे बड़ा भय माना जाता है। हालांकि यह एक सत्य है कि जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु भी निश्चित है अटल है। लेकिन बहुत सारी मौतें अकाल ही हो जाती हैं। कुछ मामलों में तो किसी के चले जाने का मलाल इतना होता है कि ताउम्र उसकी कमी खलती है और टीस उठती रहती है कि हे भगवान अभी क्या उसका समय पूरा हो गया था। ये अकाल मृत्यु क्यों उसके भाग्य में लिखी थी। खैर यहां मृत्यु का जिक्र करके हमारा उद्देश्य आपको भयभीत करने का नहीं है बल्कि हम बताने जा रहे हैं वो उपाय जिसके करने से अकाल मृत्यु से आप बच सकते हैं।

दरअसल धन तेरस के दिन भगवान धन्वंतरि की पूजा तो की जाती है क्योंकि वे देवताओं को अमृत का पान कराकर उन्हें अमरता प्रदान करने के लिये प्रकट हुए थे। आयुर्वेद का जनक भी उन्हीं को माना जाता है। धन्वंतरि, कुबेर और मां लक्ष्मी की पूजा जीवन में सुख-समृद्धि तो प्रदान करती है लेकिन इस दिन मृत्यु के देवता यम की पूजा करने का भी विधान है।

 

यमदेवता के लिये दीपदान

 

मृत्यु के देवता यम की दिशा दक्षिण मानी जाती है। धनतेरस के सांयकाल एक दिशा दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके जलायें और इसे यम देवता को समर्पित करें। तत्पश्चात दिये को अन्न की ढ़ेरी पर घर की दहलीज पर रख देना चाहिये। ऐसा करने से अकाल मृत्यु का भय टल जाता है।

 

पौराणिक कथा

 

धनतेरस पर यमदीप क्यों जलाया जाता है इस बारे में एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। बहुत समय पहले की बात है कि एक हंसराज नामक राजा हुआ करते थे। एक बार राजा अपनी मंडली के साथ वन में शिकार के लिये गये हुए थे कि वह जंगल में भटक जाते हैं और अपने सैनिकों, मित्रों आदि पूरी मंडली से बिछुड़ जाते हैं। चलते-चलते राजा हंसराज एक दूसरे राजा हेमराज के राज्य में पहुंच जाते हैं। थके हारे हंसराज की वह खूब आवभगत करते हैं। तभी राजा हेमराज को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। अब वह हंसराज से भी राजकीय समारोह तक रुकने का आग्रह करते हैं। छठी के दिन ज्योतिषाचार्य बालक के भविष्य को देखते हैं तो हैरान रह जाते हैं। वह राजा हंसराज से कहते हैं कि यह बालक बहुत तेजस्वी बनेगा लेकिन एक विपदा इस पर युवावस्था में आयेगी। जैसे ही इस बालक का विवाह होगा उसके चौथे ही दिन इसकी मृत्यु हो जायेगी। राजा हेमराज पर तो मानो दुखों का पहाड़ टूट पड़ा हो। हंसराज उन्हें व उनके परिवार को धीरज बंधाते हैं और उन्हें आश्वस्त करते हैं कि इसका लालन-पालन मैं करूंगा देखता हूं कौन इसका बाल बांका करता है। इस तरह हंसराज एक भूमिगत महल बनवाकर, चाक चौबंध व्यवस्था कर उसका लालन-पालन करते हैं देखते ही देखते वह बालक से युवराज भी हुआ। उसकी तेजस्विता का चर्चे दूर तक फैलने लगे। ऐसे ही तेज वाली एक राजकुमारी से उसका विवाह भी कर दिया जाता है। अब होनी को कौन टाल सकता है। विवाह के चौथे दिन यमदूत वहां आन खड़े हुए। नवविवाहित इस राजकीय जोड़े की खुबसूरती को देखकर एक बार तो यम के दूत भी उन्हें निहारते ही रह गये। बहुत ही अनमने मन से उन्होंने अपने कर्तव्य का पालन किया और राजकुमार के प्राण हर लिये। वहां का दारूण दृश्य उनसे देखा नहीं गया।

कुछ दिन पश्चात यमराज ने अपनी सभा बुलाई और यमदूतों से ऐसे ही प्रश्न किया कि क्या आप में से कभी भी किसी को किसी के प्राण हरते समय कभी दया आई या कोई ऐसा दृश्य आपने देखा हो जिसके बाद आपको लगा हो के इसके प्राण मुझे नहीं हरने चाहिये। अब यमदूतों को पक्का शक हो गया कि वे राजकुमार के प्राण हरने में हिचके थे इसलिये यमराज कर्तव्य में कोताही के लिये उन्हें सजा देने वाले हैं। उसके बाद यमराज भी दूतों के मन के भाव कुछ-कुछ भांप गये। उन्होंनें दूतों को और कुरेदा और आश्वस्त किया कि घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है खुलकर अपनी बात कहो। तत्पश्चात दूतों की सांस में सांस आई और उन्होंनें यमराज को राजकुमार के प्राण हरने का पूरा वृतांत और दारुण दृश्य बता डाला। यमदूतों से यह वृतांत सुनने मात्र से ही स्वयं यमराज भी द्रवित हो गये।

अब यमराज बोले मेरे प्रिय दूतो हम सभी अपने कर्तव्य से बंधे हुए हैं। मृत्यु अटल है और उसे टाला नहीं जा सकता। लेकिन भविष्य में यदि कोई कार्तिक कृष्ण पक्ष की तेरस को उपवास रखकर यमुना में स्नान कर धन्वंतरि और यम का पूजन करे तो अकाल मृत्यु से उसका बचाव हो सकता है।

इसके बाद से ही धनतेरस पर यम देवता के नाम से भी दीप जलाने की परंपरा है।




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