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संत सिपाही गुरु गोबिंद सिंह


संत सिपाही गुरु गोबिंद सिंह

"जब-जब होत अरिस्ट अपारा। तब-तब देह धरत अवतारा।"

गुरु गोबिंद सिंह जी के यह वचन श्रीमद भगवत गीता के अध्याय 4 के श्लोक 7

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।

की याद दिलाते हैं। गुरु गोबिंद सिंह का जन्म जूलियन कलेंडर के अनुसार 22 दिसंबर सन् 1966 को व ग्रेगोरियन कलेंडर के अनुसार 1 जनवरी 1967 को हुआ। हिंदू कलेंडर के अनुसार यह तिथि 1723 विक्रम संवत् के पौष माह के शुक्ल पक्ष की सप्तमी थी। जैसा कि खुद गुरु गोबिंद सिंह ने कहा था, कि जब-जब अत्याचार बढता है, तब-तब भगवान मानव देह का धारण कर पीड़ितों व शोषितों के दुख हरने के लिए आते हैं।

गुरु गोबिंद सिंह की उदारता के किस्से बचपन से ही मशहूर हो गए थे। वे एक निस्संतान बुढिया के साथ शरारत करते व उसकी सूत की पिन्नियों को बिखेर देते। बुढिया गुरु माता गुजरी के पास गुरु गोबिंद सिंह की शिकायत लेकर जाती तो माता उन्हें पैसे देकर उन्हें खुश कर देती। माता गुजरी ने एक दिन गुरु साहब से पूछा तो उन्होंने बड़ी मासूमियत से कहा यदि वे उन्हें तंग नहीं करेंगें तो वह आपके पास कैसे आएगी? और जब आपके पास नहीं आएगी तो उसे पैसे कैसे मिलेंगें?

9 साल की उम्र में संभालानी पड़ी गुरु गद्दी

जब गुरु गोबिंद सिंह 9 साल के थे तब पिता गुरु तेग बहादुर जी ने कश्मीरी पंडितों की फरियाद पर दिल्ली के चांदनी चौंक में अपना बलिदान दिया। उसके बाद गुरु गोबिंद सिंह को गद्दी पर बैठाया गया।

9 साल के इस बालक ने गुरु गद्दी की लाज रखते हुए युद्ध कौशल के साथ-साथ संस्कृत, अरबी, फारसी व पंजाबी आदि कई भाषाओं में महारत हासिल की। अत्याचार के खिलाफ विरोध में खड़े हुए।

वाहे गुरु जी का ख़ालसा, वाहे गुरु जी की फतेह

गुरु गोबिंद सिंह के अनुसार जब सारे साधन निष्फल हो जायें, तब तलवार ग्रहण करना न्यायोचित है। गुरु गोबिन्द सिंह ने 1699 ई. में धर्म एवं समाज की रक्षा हेतु ही ख़ालसा पंथ की स्थापना की थी। उनका कहना था देश धर्म व मानवता की रक्षा के लिए जो तन-मन-धन सब न्यौछावर कर दे। जो निर्धनों, असहायों और अनाथों की रक्षा के लिए सदा आगे रहे वही सच्चा ख़ालसा है। ये संस्कार गुरु जी ने, उनकी परीक्षा पर खरे उतरे पंच प्यारों को अमृत छकाकर उनमें भर दिये। गरु जी ने सर्वधर्म समभाव का संदेश दिया। इतना ही नहीं धर्म की रक्षा के लिए गुरु जी के दो बड़े साहिबजादे 17 वर्षीय बाबा अजित सिंह, 15 वर्षीय बाबा जुझार सिंह ने युद्ध भूमि में अपनी शहादत दी तो 7 वर्षीय जोरावर सिंह और 5 वर्षीय फतेह सिंह को सरहंद में नवाब वजीर खां ने धर्मांतरण न करने पर दिवारों में जिंदा चुनवा दिया। माता गुजरी ने भी जो कि वजीर खां की कैद में थी, इसके बाद गुरु को याद कर अपनी देह त्याग दी थी।

महान विद्वान एवं ग्रंथकार

उन्होंने सिख्ख कानून को सूत्रबद्ध किया, काव्य की रचना की, गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया व इसे गुरु रुप में सुशोभित किया। जफरनामा, विचित्र नाटक, चण्डी चरित्र, जाप साहिब, आदि उनकी महान कृतियां हैं। भाई मणि सिंह ने दसम ग्रंथ में उनकी सभी रचनाओं का संकलन किया।

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