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नवरात्र – चैत्र नवरात्रि में करें मां भगवती की आराधना


नवरात्र – चैत्र नवरात्रि में करें मां भगवती की आराधना

वैसे तो साल में चैत्र, आषाढ़, आश्विन और माघ महीनों में चार बार नवरात्र आते हैं लेकिन चैत्र और आश्विन माह की शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक चलने वाले नवरात्र ही ज्यादा लोकप्रिय हैं जिन्हें पूरे देश में व्यापक स्तर पर मां भगवती की आराधना के लिये श्रेष्ठ माना जाता है। धर्म ग्रंथों, पुराणों के अनुसार चैत्र नवरात्रों का समय बहुत ही भाग्यशाली बताया गया है। इसका एक कारण यह भी है कि प्रकृति में इस समय हर और नये जीवन का, एक नई उम्मीद का बीज अंकुरित होने लगता है। जनमानस में भी एक नई उर्जा का संचार हो रहा होता है। लहलहाती फसलों से उम्मीदें जुड़ी होती हैं। ऐसे समय में मां भगवती की पूजा कर उनसे सुख-समृद्धि की कामना करना बहुत शुभ माना गया है। क्योंकि बसंत ऋतु अपने चरम पर होती है इसलिये इन्हें वासंती नवरात्र भी कहा जाता है। नवरात्र के दौरान जहां मां के नौ रुपों की पूजा की जाती है वहीं चैत्र नवरात्रों के दौरान मां की पूजा के साथ-साथ अपने कुल देवी-देवताओं की पूजा का विधान भी हैजिससे ये नवरात्र विशेष हो जाते हैं।


9 दिन में करें मां के नौ रूपों की पूजा

अपने कुल देवी देवता की पूजा के साथ-साथ नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना अर्थात घट स्थापना के साथ ही नवरात्र की शुरुआत होती है। पहले दिन मां शैलपुत्री तो दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। तीसरे दिन मां चंद्रघंटा, चौथे दिन मां कुष्मांडा, तो पांचवे दिन स्कंदमाता की पूजा होती है। छठे दिन मां कात्यायनी एवं सातवेंदिन मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। आठवें दिन महागौरी तो नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है।


चैत्र नवरात्र कब से कब तक

वर्ष 2016 में चैत्र नवरात्र 8 अप्रैल से 15 अप्रैल तक रहेंगें यानि चैत्र नवरात्र इस बार आठ दिन के रहेंगें। पहले दिन घटस्थापना का मुहूर्त सुबह 11:57 से दोपहर 12:48 तक रहेगा। प्रतिपदा 7 अप्रैल को 4 बजकर 52 मिनट पर शुरु होगी। इस बार नवरात्र में तृतीय नवरात्र की तिथि 10 अप्रैल रविवार को प्रात: 5 बजकर 55 मिनट पर समाप्त होगी इसके बाद चौथा नवरात्र शुरु हो जायेगा। 15 तारीख को अंतिम नवरात्र होगा साथ ही इस प्रभु श्री राम की जयतीं यानी रामनवमी भी मनाई जायेगी।  


कैसे करें कलश स्थापना

कलश स्थापना के लिये प्रतिपदा के दिन स्नानादि कर पूजा स्थल को शुद्ध कर लें। इसके बाद लकड़ी के एक फट्टे पर लाल रंग का वस्त्र बिछायें। वस्त्र पर गणेश जी का स्मरण करते हुये थोड़े चावल रखें। अब मिट्टी की वेदी बनाकर उस पर जौ बोयें, फिर इस पर जल से भरा मिट्टी, सोने या तांबे का कलश विधिवत स्थापित करें। कलश पर रोली से स्वास्तिक या ऊँ बनायें। कलश के मुख पर रक्षा सूत्र भी बांधना चाहिये साथ ही कलश में सुपारी, सिक्का डालकर आम या अशोक के पत्ते रखने चाहिये। अब कलश के मुख को ढक्कन से ढक कर इसे चावल से भर देना चाहिये। एक नारियल लेकर उस पर चुनरी लपेटें व रक्षासूत्र से बांध दें। इसे कलश के ढक्कन पर रखते हुए सभी देवी-देवताओं का आह्वान करें और अंत में दीप जलाकर कलश की पूजा करें व फूल व मिठाइयां भी चढा सकते हैं। इस घट पर कुलदेवी की प्रतिमा भी स्थापित की जा सकती है। कलश की पूजा के बाद दुर्गा सप्तशती का पाठ भी करना चाहिये।

माता के नौ रुप

माँ शैलपुत्री - नवरात्रि के पहले दिन की पूजा विधि                                                    माँ ब्रह्मचारिणी- नवरात्रे के दूसरे दिन की पूजा विधि 

माता चंद्रघंटा - तृतीय माता की पूजन विधि                                                            कूष्माण्डा माता- नवरात्रे के चौथे दिन करनी होती है इनकी पूजा 

स्कंदमाता- नवरात्रि में पांचवें दिन होती है इनकी पूजा                                               माता कात्यायनी- नवरात्रि के छठे दिन की पूजा

माता कालरात्रि - नवरात्रे के सातवें दिन होती है इनकी पूजा                                         माता महागौरी - अष्टमी नवरात्रे की पूजा विधि 

माता सिद्धिदात्री - नवरात्रे के अंतिम दिन की पूजा 




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