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ओणम – फूलों की खुशबू से महकता पर्व


ओणम – फूलों की खुशबू से महकता पर्व

रोजमर्रा के कार्यों और अपनी जीवन शैली के बीच ही हम अपनी खुशियों को मनाने के तरीके और मौके ढूंढ लेते हैं या कहें कि इन अवसरों को खुद ही पैदा कर लेते हैं। इन्हीं अवसरों को फिर हम नाम देते हैं त्यौहार। भारतवर्ष चूंकि सामाजिक-सांस्कृतिक विविधताओं का देश है इसलिये यहां पर हर समाज और संस्कृति के अपने-अपने त्यौहार और उसे मनाने के अपने-अपने तौर तरीके रीति रिवाज़ हैं। लेकिन मुख्य त्यौहार देशभर में किसी न किसी धार्मिक आस्था, पौराणिक इतिहास या फिर सामाजिक उन्नति के प्रतीक के रूप में मनाये जाते हैं। ऐसा ही एक त्यौहार है ओणम जो कि दक्षिण भारत खास तौर पर केरल का प्राचीन और पारंपरिक त्यौहार है। जिस तरह देशभर में दशहरा, दुर्गापूजा, गणेशोत्सव की दस दिनों तक धूम रहती है उसी तरह केरल में ओणम का त्यौहार भी लगातार दस दिनों तक मनाया जाता है।


क्या है ओणम


ओणम का यह त्यौहार जिस समय पर आता है उस समय केरल में चाय, अदरक, इलायची, काली मिर्च, धान आदि फसलें पक जाती है जिससे लोगों में नयी उम्मीदें नयी उमंगें भर जाती हैं। अपनी फसलों की सलामती और इच्छाओं की पूर्ति की कामना के लिये लोग ओणम के दिन श्रावण देवता और फूलों की देवी की आराधना करते हैं। हालांकि इस त्यौहार की तैयारियां दस दिन पहले ही शुरु हो जाती हैं।


पौराणिक कथा


पौराणिक मान्यताओं के अनुसार कथा कुछ इस प्रकार है। हुआं यूं कि एक समय महाबली नाम का असुर राजा हुआ करता था। बाकि असुर राजाओं तरह उसने भी अपने तपोबल से इतनी शक्ति अर्जित कर ली की वह देवताओं के लिये भी मुसीबत बन गया। हालांकि अपनी प्रजा के लिये वह असुर राजा किसी देवता से कम न था। लेकिन शक्ति कई बार अंहकार भी लेकर आती है। देवताओं में महाबलि को हराने की ताकत नहीं थी। सभी ने भगवान विष्णु की शरण ली ताकि वे ही अब इसका कोई समाधान निकालें। तब भगवान श्री हरि ने वामन रूप में अवतार लिया। कुछ समय बाद वामन रूप में ही वह महाबलि के दरबार में पंहुचें जहां महाबलि ने उनके आकर्षण से प्रभावित होकर वचन दे दिया कि जो भी मांगना चाहो मांग सकते हो। तब वामन रूप में अवतरित भगवान विष्णु ने महाबलि से तीन कदम रखने के लिये जगह मांग ली। जिसे महाबलि ने स्वीकार कर लिया। अब इसके बाद जो हुआ वह हैरान करने वाला था। वामन देखते ही देखते इतने विशाल हो गये कि एक कदम में भू लोक तो दूसरे कदम में गगन को नाप लिया अब महाबलि का वचन पूरा कैसे हो? वे अपना तीसरा कदम कहां रखें? यह सवाल उन्होंनें महाबलि से ही कर लिया। तब तक महाबलि का अंहकार काफूर हो चुका था। उन्होंनें विनयशीलता के साथ अपना वचन पूरा करने के लिये तीसरे पैर के लिये अपना सिर उनके कदमों में झुका दिया। कदम रखते ही महाबलि पाताल लोक में गमन कर गये। अब जब जनता तक यह खबर पंहुची तो हाहाकार मच गया। जनता का उनके प्रति अगाध स्नेह देखकर भगवान विष्णु ने महाबलि को वरदान दिया कि वे तीन दिनों तक अपनी प्रजा से मिलने आ सकेंगें।

मान्यता है कि तब से लेकर अब तक ओणम के अवसर पर महाबलि केरल के हर घर में प्रजाजनों का हाल-चाल जानने के लिये आते हैं और उनकी दुख-तकलीफों को दूर करते हैं।


अन्य कथा

एक और पौराणिक कथा है कि परशुराम ने क्षत्रियों को पराजित कर समस्त पृथ्वी ब्राह्मणों को दान कर दी। अब संकट उनके स्वयं के लिये पैदा हो गया कि वे कहां जायें। तब उन्होंनें घोर तपस्या कर जल देवता को प्रसन्न किया। जल देवता ने कहा कि वे समुद्र में अपना फरसा फेंकें, जहां तक फरसा पंहुचेगा वहां तक समुद्र का जल सूख जायेगा और वहां पृथ्वी बन जायेगी। तब भगवान परशुराम ने अपना फरसा फेंककर समुद्र से पृथ्वी का एक हिस्सा अपने लिये लिया। इस क्षेत्र का नाम आरंभ में परशुक्षेत्र था मान्यता है कि कालांतर में यही क्षेत्र केरल व मलयालम के रूप में जाना जाने लगा।


कब होता है ओणम

मलयाली कैलेंडर के अनुसार कोलावर्षम के पहले महीने छिंगम जो कि अगस्त से सितंबर के बीच ही आता है, में मनाने की परंपरा है। ओणम का त्यौहार वैसे त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है लेकिन इसकी तैयारियों घरों में दस दिन पहले से शुरु हो जाती हैं। प्राचीन परंपरा के अनुसार यह हस्त नक्षत्र से शुरू होकर श्रवण नक्षत्र तक दस दिनों तक मनाया जाता है। ओणम के पहले दिन को अथम कहा जाता है। ओणम उत्सव के समापन यानि अंतिम दिन को थिरुओनम या तिरुओणम कहा जाता है।


मूर्ति स्थापना

केरल में इस त्यौहार के अवसर पर हर घर के आंगन में महाबलि की मिट्टी की त्रिकोणात्मक मूर्ति जिसे ‘तृक्काकारकरै अप्पन’ कहा जाता है बनाई जाती है फिर इसके चारों और विविध रंगों के फूलों से वृत चित्र बनाये जाते हैं। पहले दिन से शुरु हुई वृत चित्रों की संख्या दूसरे दिन दुगनी फिर तिगुनी चौगुनी होती हुई दसवें दिन दस गुना तक होती है। इस त्यौहार के साथ मान्यता जुड़ी है कि तिरुवोणम के तीसरे दिन महाबलि पाताल लोक चले जाते हैं जिसके बाद ये कलाकृतियां भी हटा ली जाती हैं।


गाना बजाना, नाचना-कूदना, पूजा-पाठ, खेल-मेलों का आयोजन इस त्यौहार पर आम हैं। फूलों से घरों की सजावट और विशेष प्रकार के व्यंजनों को तैयार करना भी इस त्यौहार की खासियत है। दक्षिण भारत में हिंदुओं का यह खास त्यौहार है लेकिन वर्तमान में क्षेत्रिय त्यौहार भी देश भर में लोकप्रिय होते जा रहे हैं। दुर्गा पूजा, गणेशोत्सव की तरह ओणम भी अब व्यापक स्तर पर मनाया जाने लगा है। इस दिन सोने की खरीददारी भी की जाती है। लेकिन इस त्यौहार पर भी पूजा करते समय, या फिर खरीददारी करते समय कुछ सावधानियां अवश्य रखनी चाहिये। किन बातों का आपको ध्यान रखना चाहिये यह विद्वान ज्योतिषाचार्यों से परामर्श कर आप जान सकते हैं। आपकी कुंडली देखकर ज्योतिषाचार्य आपको बता सकते हैं कि क्या-क्या सावधानियां आपको रखनी चाहिये या फिर कैसे यह त्यौहार आपके लिये बहुत ही भाग्यशाली साबित होगा। ज्योतिषाचार्यों से परामर्श करने के लिये एस्ट्रोयोगी पर अपना रजिस्ट्रेशन करें और 100 रूपये तक के निशुल्क परामर्श ऑफर का लाभ उठायें। रजिस्ट्रेशन के लिये लिंक पर क्लिक करें।


एस्ट्रोयोगी की पूरी टीम की ओर से आपको व आपके परिवार को ओणम के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।


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