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Brahmacharini Chalisa: ब्रह्मचारिणी चालीसा देवी दुर्गा के दूसरे स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित एक पवित्र स्तुति है। मां ब्रह्मचारिणी तप, संयम और साधना की देवी मानी जाती हैं। ब्रह्मचारिणी चालीसा का पाठ करने से मन में धैर्य और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है।
मान्यता है कि सच्चे मन से मां ब्रह्मचारिणी की आराधना करने से जीवन की कठिनाइयों का सामना करने की शक्ति मिलती है और व्यक्ति अपने लक्ष्य की ओर दृढ़ता से आगे बढ़ता है।
नवरात्रि के दौरान ब्रह्मचारिणी चालीसा का पाठ विशेष रूप से शुभ माना जाता है। नियमित रूप से इस चालीसा का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति, आत्मबल और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त होती है। मां ब्रह्मचारिणी की कृपा से जीवन में संयम, साहस और सफलता की राह खुलती है।
दोहा
कोटि कोटि नमन मेरे माता पिता को, जिसने दिया शरीर
बलिहारी जाऊँ गुरू देव ने, दिया हरि भजन में सीर ॥
चौपाई
जय जय जग मात ब्रह्माणी ।
भक्ति मुक्ति विश्व कल्याणी ॥ १ ॥
वीणा पुस्तक कर में सोहे ।
शारदा सब जग सोहे ॥ २ ॥
हँस वाहिनी जय जग माता ।
भक्त जनन की हो सुख दाता ॥ ३ ॥
ब्रह्माणी ब्रह्मा लोक से आई ।
मात लोक की करो सहाई ॥ ४ ॥
क्षीर सिन्धु में प्रकटी जब ही ।
देवों ने जय बोली तब ही ॥ ५ ॥
चतुर्दश रतनों में मानी ।
अद॒भुत माया वेद बखानी ॥ ६ ॥
चार वेद षट शास्त्र कि गाथा ।
शिव ब्रह्मा कोई पार न पाता ॥ ७ ॥
आदि शक्ति अवतार भवानी ।
भक्त जनों की मां कल्याणी ॥ ८ ॥
जब−जब पाप बढे अति भारे ।
माता शस्त्र कर में धारे ॥ ९ ॥
पाप विनाशिनी तू जगदम्बा ।
धर्म हेतु ना करी विलम्बा ॥ १० ॥
नमो नमो ब्रह्मी सुखकारी ।
ब्रह्मा विष्णु शिव तोहे मानी ॥ ११ ॥
तेरी लीला अजब निराली ।
सहाय करो माँ पल्लू वाली ॥ १२ ॥
दुःख चिन्ता सब बाधा हरणी ।
अमंगल में मंगल करणी ॥ १३ ॥
अन्न पूरणा हो अन्न की दाता ।
सब जग पालन करती माता ॥ १४ ॥
सर्व व्यापिनी असंख्या रूपा ।
तो कृपा से टरता भव कूपा ॥ १५ ॥
चंद्र बिंब आनन सुखकारी ।
अक्ष माल युत हंस सवारी ॥ १६ ॥
पवन पुत्र की करी सहाई ।
लंक जार अनल सित लाई ॥ १७ ॥
कोप किया दश कन्ध पे भारी ।
कुटम्ब संहारा सेना भारी ॥ १८ ॥
तु ही मात विधी हरि हर देवा ।
सुर नर मुनी सब करते सेवा ॥ १९ ॥
देव दानव का हुआ सम्वादा ।
मारे पापी मेटी बाधा ॥ २० ॥
श्री नारायण अंग समाई ।
मोहनी रूप धरा तू माई ॥ २१ ॥
देव दैत्यों की पंक्ती बनाई ।
देवों को मां सुधा पिलाई ॥ २२ ॥
चतुराई कर के महा माई ।
असुरों को तू दिया मिटाई ॥ २३ ॥
नौ खण्ङ मांही नेजा फरके ।
भागे दुष्ट अधम जन डर के ॥ २४ ॥
तेरह सौ पेंसठ की साला ।
आस्विन मास पख उजियाला ॥ २५ ॥
रवि सुत बार अष्टमी ज्वाला ।
हंस आरूढ कर लेकर भाला ॥ २६ ॥
नगर कोट से किया पयाना ।
पल्लू कोट भया अस्थाना ॥ २७ ॥
चौसठ योगिनी बावन बीरा ।
संग में ले आई रणधीरा ॥ २८ ॥
बैठ भवन में न्याय चुकाणी ।
द्वार पाल सादुल अगवाणी ॥ २९ ॥
सांझ सवेरे बजे नगारा ।
उठता भक्तों का जयकारा ॥ ३० ॥
मढ़ के बीच खड़ी मां ब्रह्माणी ।
सुन्दर छवि होंठो की लाली ॥ ३१ ॥
पास में बैठी मां वीणा वाली ।
उतरी मढ़ बैठी महा काली ॥ ३२ ॥
लाल ध्वजा तेरे मंदिर फरके ।
मन हर्षाता दर्शन करके ॥ ३३ ॥
चैत आसोज में भरता मेला ।
दूर दूर से आते चेला ॥ ३४ ॥
कोई संग में, कोई अकेला ।
जयकारो का देता हेला ॥ ३५ ॥
कंचन कलश शोभा दे भारी ।
दिव्य पताका चमके न्यारी ॥ ३६ ॥
सीस झुका जन श्रद्धा देते ।
आशीष से झोली भर लेते ॥ ३७ ॥
तीन लोकों की करता भरता ।
नाम लिए सब कारज सरता ॥ ३८ ॥
मुझ बालक पे कृपा की ज्यो ।
भुल चूक सब माफी दीज्यो ॥ ३९ ॥
मन्द मति यह दास तुम्हारा ।
दो मां अपनी भक्ती अपारा ॥ ४० ॥
जब लगि जिऊ दया फल पाऊं ।
तुम्हरो जस मैं सदा ही गाऊं ॥ ४१ ॥
दोहा
राग द्वेष में लिप्त मन, मैं कुटिल बुद्धि अज्ञान ।
भव से पार करो मातेश्वरी, अपना अनुगत जान ॥
मां ब्रह्मचारिणी नवदुर्गा का दूसरा स्वरूप हैं। इनकी पूजा से जीवन में धैर्य, संयम और आत्मबल बढ़ता है। यह चालीसा मानसिक शक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा बढ़ाने में सहायक मानी जाती है। नियमित पाठ करने से मन में शांति और दृढ़ता का भाव आता है।
ब्रह्मचारिणी चालीसा का पाठ करने से पहले मन और वातावरण को शांत और पवित्र रखना आवश्यक माना जाता है। सही विधि से पाठ करने पर भक्त अधिक एकाग्रता के साथ मां की आराधना कर पाते हैं।
सबसे पहले पूजा स्थान को साफ करें और मां ब्रह्मचारिणी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
दीपक और अगरबत्ती जलाकर मां को प्रणाम करें।
शांत मन से आसन पर बैठकर मां ब्रह्मचारिणी का ध्यान करें।
हाथ जोड़कर श्रद्धा के साथ ब्रह्मचारिणी चालीसा का पाठ प्रारंभ करें।
पाठ के दौरान मन को एकाग्र रखें और बीच में उठने से बचें।
चालीसा समाप्त होने के बाद “जय ब्रह्मचारिणी माता” का जयकारा लगाकर आरती करें।
अंत में मां को फल या मिठाई का नैवेद्य अर्पित करें और अपनी मनोकामनाएं प्रार्थना के रूप में निवेदित करें।
चालीसा पाठ के दौरान कुछ सामान्य नियमों का पालन करना शुभ माना जाता है।
चालीसा का पाठ सुबह सूर्योदय के समय या ब्रह्ममुहूर्त (सुबह लगभग 4 से 6 बजे के बीच) करना अच्छा माना जाता है।
नवरात्रि के दूसरे दिन या पूरे नवरात्रि में प्रतिदिन चालीसा पढ़ना विशेष फलदायक माना जाता है।
पाठ से पहले स्नान कर स्वच्छ और साफ वस्त्र धारण करें।
पूजा स्थान को साफ और पवित्र रखें।
मां ब्रह्मचारिणी को फूल, दीपक, अगरबत्ती और नैवेद्य अर्पित करें।
पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठना शुभ माना जाता है।
पाठ शुरू करने से पहले मन में मां ब्रह्मचारिणी का ध्यान करें और तीन बार “ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नमः” मंत्र का जाप कर सकते हैं।
जब जीवन में धैर्य की कमी महसूस हो, लक्ष्य से मन भटकने लगे या कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा हो, तब मां ब्रह्मचारिणी की आराधना विशेष लाभकारी मानी जाती है।
मां ब्रह्मचारिणी तप, संयम और साधना की देवी हैं। उनकी भक्ति से व्यक्ति में कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखने की शक्ति आती है।
नियमित रूप से चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक जागरूकता और मानसिक संतुलन बढ़ सकता है।
मां ब्रह्मचारिणी की आराधना से मन स्थिर होता है और व्यक्ति अपने लक्ष्य पर अधिक ध्यान केंद्रित कर पाता है।
नवरात्रि का दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित होता है। इस दिन उनकी पूजा और चालीसा का पाठ करना विशेष शुभ माना जाता है।
मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप साधना और आत्मसंयम का प्रतीक है। उनकी भक्ति से जीवन में संतुलन और सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है।
श्रद्धा से ब्रह्मचारिणी चालीसा का पाठ करने से घर के वातावरण में सकारात्मकता और शांति बढ़ती है।
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