वास्तु शास्त्र व ईशान दिशा

वास्तु शास्त्र व ईशान दिशा


वास्तु में पूर्व-उत्तर दिशाएं जहां मिलती हैं उस बिंदु को ईशान कोण माना जाता है। वास्तु शास्त्र के अनुसार घर में इस स्थान को ईशान दिशा कहा जाता है। हिंदू धर्म शास्त्रों में भगवान शिव का एक नाम ईशान भी है। दरअसल उत्तर-पूर्व दिशा में भगवान शिव का आधिपत्य है। इसीलिए इस दिशा को ईशान कोण कहा जाता है। ईशान दिशा के स्वामी ग्रह बृहस्पति और केतु माने गए हैं। हांलाकि इस दिशा के स्वामी ब्रह्मदेव और भगवान शिव हैं। इस दिशा में घर के दरवाजे और खिड़कियों का होना अत्यंत शुभ व फलदायी है। दिशा का वास्तुदोष से पीड़ित होने पर मन व बुद्धि पर नाकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ईशान दिशा के वास्तुदोष मुक्त होने पर मानसिक क्षमताओं पर अनुकूल प्रभाव होता है। घर में शांति और समृद्धि बनी रहती है। अभिभावकों को संतान के संबंध में शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं।

देव दिशा है ईशान दिशा

ईशान दिशा को देव दिशा भी कहा जाता है। हिन्दू मान्यता के अनुसार कोई शुभ कार्य किया जाता है तो घट स्थापना ईशान दिशा की ओर ही की जाती है। यह दिशा विवेक, धैर्य, ज्ञान, भक्ति वैराग्य, बुद्धि आदि प्रदान करती है। भवन में इस दिशा को पूरी तरह शुद्ध व पवित्र रखाना चाहिए। यह दिशा दूषित व अपवित्र होने पर भवन में रहने वालों को प्रायः कलह व विभिन्न कष्टों का सामना करना पड़ता है, साथ ही व्यक्ति की बुद्धि भ्रष्ट होती है। उत्तरी-पूर्वी दिशा अर्थात्‌ ईशान कोण जल का प्रतीक है। भवन का यह भाग ब्राह्मणों, बालकों तथा अतिथियों के निवास हेतु उत्तम  है। इस दिशा में पूजन स्थल या अध्ययन कक्ष का निर्माण करवाना शुभ होता है।

ईशान दिशा में शुभ स्थिति

भवन का ईशान हिस्सा सबसे पवित्र होता है। इसलिए हमारे प्राचीन वास्तुशास्त्रियों ने इस दिशा की तुलना कुबेर नगरी अलकापुरी से की है। इसे साफ-स्वच्छ और रिक्त रखाना चाहिए। यहां जल की स्थापना की जानी चाहिए। जैसे कुआं, बोरिंग, मटका या फिर पीने के पानी का प्रबंधन। इसके अलावा इस स्थान को अध्यात्मिक स्थल भी बनाया जा सकता है। घर के मुख्य द्वार का इस दिशा में होना वास्तु की दृष्टि से अत्यधिक शुभ माना जाता है।

ईशान दिशा वास्तु दोष

वास्तु में ईशान दिशा को बेहद शुभ व अति संवेदनशील माना गया है। इस दिशा में दोष होने से अकारण विपत्ति का सामना करना पड़ता है। इस स्थान पर कूड़ा-करकट रखना, स्टोर, शौचालय, रसोई निर्मित करना, लौह धातु से बना कोई भारी सामान रखना वर्जित है। इससे धन-संपत्ति व सुख का नाश और दुर्भाग्य का निर्माण होता है। ऐसा करने से आप स्वयं के लिए विनाश का द्वार खोलेंगे। अतः भवन में ईशान दिशा की ओर कोई भी बदलाव करने से पूर्व वास्तुशास्त्री से विमर्श अवश्य करें।

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