वास्तु शास्त्र व वायव्य दिशा

वास्तु शास्त्र व वायव्य दिशा


उत्तर और पश्चिम दिशा के मध्य में वायव्य दिशा स्थिति है। वायव्य कोण के स्वामी वायुदेव हैं। इस दिशा में वायु तत्व की प्रधानता रहती है। यह दिशा वायु का स्थान है। अतः भवन निर्माण में गोशाला, बेड रूम और गैरेज का निर्माण इसी दिशा में करवाना चाहिए। इसका शुभ- अशुभ प्रभाव परिवार की स्त्रियों तथा संतान पर पड़ता है। यह दिशा घर के सदस्यों के मानसिक अवस्था पर अपना असर डालती है। इस दिशा में खिड़कियों का बनवाना लाभदायी होता है। जैसी ही इस दिशा से हवा भवन में प्रवेश करती है वैसे ही आपके बाहरी लोगों के साथ अच्छे संबंध बनते हैं। इसलिए आप इस दिशा को दूषित न रखें। इस स्थान पर कभी भी कूड़ा करकट न डालें।

वायव्य मुखी भवन निर्माण के मुख्य बिंदु

वास्तु में वायव्य कोण को तीन भागों में बाँटा गया है। वायव्य, उत्तरी वायव्य एवं पश्चिमी वायव्य कोण । सद्गृहस्थ को उत्तरी वायव्य तथा वायव्य में मुख्य द्वार का निर्माण कभी नहीं करवाना चाहिए। ये दोनों द्वार गृह स्वामी के सम्मान, धन सम्पत्ति इत्यादि को क्षतिग्रस्त करने में सहायक भूमिका निभाते हैं। वास्तु विद्वान पश्चिमी वायव्य कोण को मुख्य द्वार के लिए उत्तम स्थिति मानते हैं। अग्नि कोण के सम्मुख कोण होने के कारण इसे अग्नि कोण से प्रभावित माना गया है एवं अग्नि कोण में रसोई नहीं बना पाने से इस स्थान पर बनाया जा सकता है। परंतु वायव्य कोण में रसोई बनाने से अकस्मात खर्चे बढ़ जाते हैं। वायव्य कोण में सेप्टिक टैंक एवं शौचालय का निर्माण करवाना उत्तम है। इस कोण से दूषित जल के निकासी के लिए नाली का निर्माण करवा सकते हैं।

वायव्य कोण में इन्हें करना चाहिए निवास

वायव्य कोण में वायुदेव का आधिपत्य है। यें हमेशा चलायमान रहते हैं। डॉक्टर, वैद्य, वकील, वास्तुशास्त्री, ज्योतिष, राजनेता, अभिनेता, संगीतकार, पत्रकार, गायक एवं जिनका काम बाहर ज्यादा घूमने का है उन्हें भूखण्ड के वायव्य कोण में अपना शयनकक्ष बनाना चाहिए। क्योंकि वे जितना भ्रमण करेंगें उतना ही उनकी ख्याती बढ़ती जायेगी। वे जनमानस के करीब आते जायेंगे। सफलता के शिखर तक पहुँचाने में यह दिशा सहयोगी साबित होगी।

वायव्य कोण में दोष

इस दिशा में भवन निर्माण नियम के अनुरूप हो तो वह गृह स्वामी को बहुत धनवान बनाता है, परंतु दोषपूर्ण निर्माण होने पर मान- सम्मान एवं यश में कमी आती है। लोगों से अच्छे सम्बन्ध नहीं बन पाते हैं तथा कानूनी मामलों में भी उलझना पड़ सकता है। दिशा दोष मुक्त होने पर लाभ मिलता है। मान एवं यश की प्राप्ति होती है। अच्छे संबंध स्थापित होते हैं। कंसलटेंट, चिकित्सा, वकालत, आध्यात्मिक, आर्किटेक्ट का काम करने वालों वायव्य दिशा को दोष मुक्त रखें। दोष रहीत होने पर नये लोगों से अच्छे संबंध बनते हैं। जिस पर इनकी तरक्की और लाभ निर्भर करता है। इस दिशा में वास्तु दोष होने पर भवन में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। मन अशांत रहता है।

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