वास्तु में पश्चिम दिशा

वास्तु में पश्चिम दिशा


जब सूर्य अस्तांचल की ओर होता है तो वह दिशा पश्चिम कहलाती है। इस दिशा के देवता वरूण देव हैं। जिन्हें जल का स्वामी कहा जाता है। जो संसार में वर्षा करने और रोकने के कार्य संचालित करते हैं। इस दिशा का तत्व वायु होता है और वायु की प्रकृति चंचल होती है। अतः यह दिशा चंचलता प्रदान करती है। इसका दिशा का प्रतिनिधि ग्रह शनि है। ऐसे में गृह का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा वाला है तो वह गलत है। इस कारण गृहस्वामी की आमदनी ठीक नहीं होगी और उसे गुप्तांग की बीमारी हो सकती है। पश्चिम दिशा में द्वार होने से कभी व्यापार अच्छा चलता है और कभी मंदा।

भवन निर्माण के कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु

वास्तु में कभी भी यह नहीं माना जाता है कि कौनसी दिशा निवास करने के लिए उपयुक्त और कौनसी अत्यन्त खराब है। वास्तविकता यह है कि वास्तु में सभी दिशाएं भवन निर्माण के लिए उपयुक्त है, परंतु महत्वपूर्ण बात यह है कि भवन के निर्माण में वास्तु के नियमों एवं सिद्धांतों का पालन करना अत्यन्त आवश्यक है।

पश्चिम मुखी भवन का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा में ही होना चाहिए। अगर भवन के मुख्य द्वार को किसी कारण वश नैऋत्य और वायव्य कोण की ओर बनवाया जाए तो भवन में निवास करने वालों को रोग से पीड़ित, धन हानि और अकाल मृत्यु का खतरा बना रहता है। इसी तरह से पश्चिम मुख वाले भवन में आगे की ओर रिक्त स्थान है तो पीछे पूर्व की ओर साथ ही संभव हो सके तो उत्तर दिशा की ओर भी रिक्त स्थान जरूर छोड़ें। पूर्व की अपेक्षा पश्चिम दिशा में अधिक रिक्त स्थान छूटने पर सौभाग्य, समृद्धि एवं पारिवारिक ऐश्वर्य तथा संतान प्रभावित होती है। पश्चिम मुखी भवन का निर्माण पश्चिम दिशा से ही करवाना शुरू करना चाहिए। इस दिशा में आगे की ओर ऊंची दीवार के साथ निर्माण कार्य शुरू करना बहुत ही फलदायी सिद्ध होता है। पश्चिम दिशा की चारदीवारी पूर्व दिशा से सदैव ऊंची होनी चाहिए।

यदि भवन का मुख्य दरवाजा पश्चिम दिशा में है तो किसी भी प्रकार का भूमिगत टैंक जैसे वाटर टैंक, बोरिंग, कुंआ आदि उत्तर अथवा पूर्व दिशा में होना चाहिए। यानी कि ऐसे स्थिति में जल संचय व निकास स्थान वास्तु में उत्तर व पूर्व दिशा माना गया है। अगर किसी कारण वश भवन के पश्चिम भाग से जल निकासी मार्ग बनवाते हैं तो परिवार के पुरुषों को गंभीर बीमारियों से पीड़ित होने का खतरा बना रहता है।

वास्तु शास्त्र में पश्चिम दिशा की ओर रसोईघर बनाना निषिद्ध है। ऐसा करने पर भवन में रहने वालों को गर्मी, पित्त और फोड़े-फुंसी की समस्याओं से सामना करना पड़ता है। भवन का ईशान कोण यानी उत्तर पूर्व कोण घटा, कटा, गोल अथवा ऊंचा नहीं होना चाहिए। यदि वास्तु शास्त्र के इन नियमों का पालन किया जाए तो पश्चिम मुखी भवन खुशहाल साबित होगा।

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