होलाष्टक - क्या करें क्या न करें

होलाष्टक - क्या करें क्या न करें


होली इस त्यौहार का नाम सुनते ही हम अपने चारों ओर रंग बिरंगे चेहरे, उल्लास, उमंग व खुशी से सराबोर लोग दिखाई देने लगते हैं। होली का फील होने लगता है। रंग बिरंगी होली से पहले दिन होलिका का दहन किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर इतनी उमंग व उल्लास से भरे इस पर्व से आठ दिन पहले ही लोग शुभ कार्य क्यों नहीं करते? जी हां होली से ज्योतिष शास्त्र में होली से आठ दिन पूर्व शुभ कार्यों के करने की मनाही होती है। होली से पूर्व के इन आठ दिनों को होलाष्टक कहा जाता है। इस वर्ष होलाष्टक 23 फरवरी से शुरु हो रहा है जो कि होलिका दहन (1 मार्च 2018) के दिन  तक रहेगा। आइये जानते हैं उन ज्योतिषीय कारणों को जो बताते हैं कि क्यों नहीं किये जाते होलाष्टक में शुभ कार्य।


होलाष्टक – इसलिये होता है शुभ कार्यों पर बैन

होलाष्टक में दो शब्दों का योग है। होली और अष्टक यहां पर होलाष्टक का अर्थ है होली से पहले के आठ दिन। इन आठ दिनों में विवाह हो या ग्रह प्रवेश, कोई नया बिजनेस शुरु करना हो या फिर अन्य कोई भी ऐसा शुभ कार्य जिसे करने के लिये शुभ समय देखने की आवश्यकता आपको पड़ती है, नहीं किया जाता। इसके पिछे जो प्रचलित कारण हैं उनमें से मुख्य कारण यहां दिये जा रहे हैं –

  • मान्यता है कि हरिण्यकशिपु ने अपने पुत्र भक्त प्रह्लाद को भगवद् भक्ति से हटाने और हरिण्यकशिपु को ही भगवान की तरह पूजने के लिये अनेक यातनाएं दी लेकिन जब किसी भी तरकीब से बात नहीं बनी तो होली से ठीक आठ दिन पहले उसने प्रह्लाद को मारने के प्रयास आरंभ कर दिये थे। लगातार आठ दिनों तक जब भगवान अपने भक्त की रक्षा करते रहे तो होलिका के अंत से यह सिलसिला थमा। इसलिये आज भी भक्त इन आठ दिनों को अशुभ मानते हैं। उनका यकीन है कि इन दिनों में शुभ कार्य करने से उनमें विघ्न बाधाएं आने की संभावनाएं अधिक रहती हैं।

  • वहीं होलाष्टक में शुभ कार्य न करने की ज्योतिषीय वजह भी बताई जाती है। एस्ट्रोलॉजर्स का कहना है कि इन दिनों में नेगेटिव एनर्जी काफी हैवी रहती है। होलाष्टक के अष्टमी तिथि से आरंभ होता है। अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक अलग-अलग ग्रहों की नेगेटिविटी काफी हाई रहती है। जिस कारण इन दिनों में शुभ कार्य न करने की सलाह दी जाती है। इनमें अष्टमी तिथि को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चुतर्दशी को मंगल तो पूर्णिमा को राहू की ऊर्जा काफी नकारात्मक रहती है। इसी कारण यह भी कहा जाता है कि इन दिनों में जातकों के निर्णय लेने की क्षमता काफी कमजोर होती है जिससे वे कई बार गलत निर्णय भी कर लेते हैं जिससे हानि होती है।


होलाष्टक - क्या न करें

  • होलाष्टक के दौरान विवाह का मुहूर्त नहीं होता इसलिये इन दिनों में विवाह जैसा मांगलिक कार्य संपन्न नहीं करना चाहिये।

  • नये घर में प्रवेश भी इन दिनों में नहीं करना चाहिये।

  • भूमि पूजन भी इन दिनों में न ही किया जाये तो बेहतर रहता है।

  • नवविवाहिताओं को इन दिनों में मायके में रहने की सलाह दी जाती है।

  • हिंदू धर्म में 16 प्रकार के संस्कार बताये जाते हैं इनमें से किसी भी संस्कार को संपन्न नहीं करना चाहिये। हालांकि दुर्भाग्यवश इन दिनों किसी की मौत होती है तो उसके अंत्येष्टि संस्कार के लिये भी शांति पूजन करवाया जाता है।

  • किसी भी प्रकार का हवन, यज्ञ कर्म भी इन दिनों में नहीं किये जाते।


होलाष्टक – क्या करें

होलाष्टक में भले ही शुभ कार्यों के करने की मनाही है लेकिन इन दिनों में अपने आराध्य देव की पूजा अर्चना कर सकते हैं। व्रत उपवास करने से भी आपको पुण्य फल मिलते हैं। इन दिनों में धर्म कर्म के कार्य, वस्त्र, अनाज व अपनी इच्छा व सामर्थ्य के अनुसार जरुरतमंदों को धन का दान करने से भी आपको लाभ मिल सकता है। साथ ही हमारी सलाह है कि आपको एस्ट्रोलॉजर्स की गाइडेंस भी जरुर ले लेनी चाहिये। वे आपको अच्छे से गाइड कर सकते हैं कि आप कैसे अपनी लाइफ को बेहतर बना सकते हैं। कैसे नेगेटिव एनर्जी के असर को बेअसर कर सकते हैं। एस्ट्रोयोगी पर आप इंडिया के बेस्ट एस्ट्रोलॉजर्स से गाइडेंस ले सकते हैं। पंडित जी से अभी बात करने के लिये यहां क्लिक करें।


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