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खाटू श्याम मंदिर - हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा


खाटू श्याम मंदिर - हारे का सहारा बाबा श्याम हमारा

निर्धन को धनवान का, निर्बल को बलवान और इंसा को भगवान का सहारा मिलना चाहिये। हिम्मत वाले के हिमायती तो राम बताये ही जाते हैं लेकिन हारे हुए बिल्कुल हताश निराश व्यक्ति का सहारा बाबा खाटू श्याम ही बनते हैं। वही बाबा खाटू श्याम जिनका राजस्थान के खाटू में मंदिर भी स्थापित है। आइये जानते हैं हारे के हरिनाम खाटू श्याम शीश के दानी की कहानी।

कौन हैं बाबा खाटू श्याम जी

बाबा खाटू श्याम की कहानी पौराणिक ग्रंथों में मिलती है। कहानी महाभारत काल की है। कुंती पुत्र महाबली भीम एवं हिडिंबा के समागम से उन्हें बहुत ही बलशाली संतान प्राप्त हुई जिसका नाम था घटोत्कच। घटोत्कच केवल बल ही नहीं बुद्धि में भी अद्वितीय थे। उन्होंने प्रागज्योतिषपुर जो कि अब आसाम कहलाता है में शास्त्रार्थ में हिस्सा लिया और अपने तर्कों से उसमें विजय प्राप्त की। शास्त्रार्थ की यह प्रतियोगिता जीतने के फलस्वरूप घटोत्कच का विवाह दैत्यराज मूर की पुत्री कामकंटककटा जिसे मोरवी भी कहते थे से हुआ। घटोत्कच व मोरवी के मिलन से उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई। बालक के केश बब्बर शेर की तरह थे जिस कारण इसका नाम पड़ा बर्बरीक। महाबली भीम के पौत्र बर्बरीक को ही आज हम खाटू श्याम जी के रूप में जानते हैं।

बर्बरीक कैसे बने खाटू श्याम

बर्बरीक भी अपने माता-पिता व दादा की तरह बहुत बलशाली था। उसने युद्ध की कला स्वयं भगवान श्री कृष्ण व अपनी माता मोरवी से सीखी थी। कड़ी तपस्या के बल पर ऐसे शस्त्र प्राप्त किये थे जिनसे पूरे ब्रह्मांड पर विजय प्राप्त की जा सकती थी। उनके पास तीन ऐसे बाण थे जिनके बल पर वे समस्त ब्रह्मांड का क्षण भर में विनाश कर सकते थे। कुछ समय बाद ही महाभारत का युद्ध छीड़ने के आसार नज़र आने लगे। बर्बरीक की भी इच्छा थी कि वह भी युद्ध भूमि में दो दो हाथ दिखाए। जब उसने युद्ध कला सीखनी आरंभ की थी तो भगवान श्री कृष्ण से पूछा था कि हे प्रभु जीवन का सबसे उत्तम प्रयोग कैसे किया जा सकता है। कैसे जीवन की सार्थकता है। तब श्री कृष्ण ने कहा था कि किसी असहाय की सहायता करके, हारे हुए का सहारा बनने में ही जीवन की सार्थकता है। फिर युद्धभूमि में जाने से पहले माता ने भी वचन ले लिया कि तुम उसकी तरफ से लड़गो जो हारेगा। माता मोरवी को वचन देकर तीन बाणों के साथ बर्बरीक युद्ध के लिये निकल पड़े।

अब भगवान श्री कृष्ण तो अंतर्यामी हैं उन्हें भी पता था कि बर्बरीक अगर युद्ध में शामिल हुआ तो वह हारते हुए कौरवों का साथ देगा जिस कारण पांडवों का पासा उलटा पड़ेगा और कौरवों की हार नहीं होगी। ऐसे में बर्बरीक को रोकने के लिये उन्होंने ब्राह्मण का वेश धारण किया और बर्बरीक को रास्ते में ही रोक लिया और पूछा कि कहां जा रहे हो। बर्बरीक ने पूरी बात दी यह भी कि वह हारने वाले का साथ देगा। इस पर ब्राह्मण ने उसका मजाक उड़ाया और तीन बाणों के साथ युद्ध भूमि में जाने के उसके विचार पर हंस दिये। बर्बरीक ने कहा कि इन तीन बाणों से पूरे ब्रह्मांड को क्षण भर में नष्ट किया जा सकता है। फिर युद्ध भूमि में शत्रु की पूरी सेना को हराने के लिये तो मेरा एक ही तीर काफी है। तब श्री कृष्ण ने कहा कि मैं नहीं मानता यदि ऐसा है तो पीपल के इस वृक्ष के समस्त पत्तों को एक तीर से भेद कर दिखाओ। बर्बरीक ने भगवान का नाम लिया और तीर चला दिया देखते ही देखते सारे पत्ते छेद दिये और उसके बाद तीर भगवान श्री कृष्ण के पांव के पास आकर रूक गया। बर्बरीक ने कहा कि ब्राह्मण देव पत्ते पर से पैर हटा लिजिये अन्यथा यह आपके पैर को भी छेद डालेगा। तब ब्राह्मण बने श्री कृष्ण ने बर्बरीक से दान प्राप्ति की इच्छा व्यक्ति की। बर्बरीक ने वचन दे दिया। वचन देने के तुरंत बाद उन्होंने बर्बरीक का शीश दान में मांग लिया। बर्बरीक को हैरानी हुई लेकिन वचन दे चुके थे इस कारण अपनी शंका प्रकट करते हुए कहा कि मैं वचनबद्ध हूं मेरा शीश इस कारण आपका हुआ लेकिन मुझे लगता है कि आप साधारण ब्राह्मण तो नहीं हैं क्योंकि वह ऐसा दान नहीं मांगता कृपया अपने वास्तविक रूप में आयें। तब श्री कृष्ण अपने वास्तविक रूप में आये और बर्बरीक को समझाया कि उन्होंने क्यों ऐसा किया। उन्होंने कहा कि युद्ध आरंभ करने से पहले श्रेष्ठ योद्धा की आहुति की आवश्यकता थी। बर्बरीक ने श्री कृष्ण के सामने युद्ध देखने की इच्छा व्यक्त की तब भगवान श्री कृष्ण ने पर्वत की चोटी पर बर्बरीक के शीष को रख दिया जहां से वे युद्ध का सारा हाल अपनी आंखों से देख पाये।

युद्ध समाप्ति के पश्चात पांडवों की जीत तो हो चुकी थी लेकिन इस बात पर उनमें बहस छिड़ गई की जीत का श्रेय वास्तव में किसे जाता है। तब भगवान श्री कृष्ण ने कहा आपस में मत उलझो बर्बरीक ने सारा युद्ध अपनी आंखों से देखा है उससे ही चलकर पूछो। तब बर्बरीक ने कहा कि युद्ध के कर्ता-धर्ता भगवान श्री कृष्ण ही हैं युद्ध भूमि में इन्हीं का सुदर्शन चक्र चलता हुआ दिखाई दे रहा था। इन्हीं की रणनीतियों ने आपको विजय दिलाई है। तब भगवान श्री कृष्ण ने बर्बरीक को वरदान दिया कि तुम कलियुग के अवतार बनोगे और लोग तुम्हें श्याम के नाम से ही जानेंगें। किसी भी तरह के हालातों से हारा जो भी जन कलियुग में तुम्हारा दामन थामेगा, तुम्हारी शरण में आयेगा उसका कल्याण होगा। इस प्रकार बर्बरीक का नाम श्याम पड़ा। चूंकि उनका शीष राजस्थान के खाटू में दफनाया गया इसी कारण इन्हें बाबा खाटू श्याम जी के नाम से जाना जाता है। अपना शीश दान में देने के कारण ये शीश के दानी, माता मोरवी के पुत्र होने के कारण मोरवीनंदन भी इन्हें कहा जाता है।

खाटू श्याम जी का मंदिर

खाटू श्याम जी का मंदिर राजस्थान के सीकर क्षेत्र के खाटू नगर में स्थित है क्योंकि यहीं पर उनके शीश को दफ़नाया गया था। मान्यता है कि पहले यहां एक गाय नियमित रूप से दुध की धारा स्वयं बहाती थी। कुछ वर्षों पश्चात वहां खुदाई हुई तो एक शीश प्रकट हुआ। आरंभ में इसे ब्राह्मण को सौंपा गया। मान्यता है कि इसके कुछ समय बाद ही स्वपन में राजा को दिखाई देकर यहा पर मंदिर निर्माण का आदेश दिया इसके पश्चात यहां मंदिर का निर्माण हुआ कार्तिक मास की एकादशी को यह शीश मंदिर में स्थापित किया गया। इसी दिन को बाबा खाटू श्याम के जन्मदिवस के रूप में भी मनाया जाता है। मंदिर का निर्माण 1027 ई. में रूपसिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कंवर ने करवाया था इसके बाद इसमें लगातार जीर्णोद्धार होता रहा है। खाटू श्याम यहां कुल देवता के रूप में भी बहुत से परिवारों द्वारा पूजे जाते हैं। फाल्गुन मास में खाटू श्याम जी के दरबार में फाल्गुन मेले का आयोजन होता है। दूर-दूर से श्रद्धालु खाटू नगरिया में श्याम बाबा के दर्शन करने आते हैं।

खाटू श्याम जी मंदिर द्वार खुलने का समय

खाटू श्याम जी के मंदिर का द्वार गर्मियों के दिनों में प्रात: 4:30 बजे खुलता है और दोपहर 1:00 बजे बंद हो जाता है। शाम के 5:00 बजे पुन: द्वार खोला जाता है और रात्रि 10:00 बजे बंद होता है। सर्दियों में समय प्रात: के 6:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे और सांय 4:00 बजे से रात्रि 9 बजे तक का रहता है।

कैसे पंहुचे खाटू श्याम जी के धाम

देश दुनिया के किसी भी कौने से दिल्ली या जयपुर हवाई, सड़क या रेल मार्ग से पंहुच सकते हैं। जयपुर से लगभग 63 किलोमीटर की दूरी पर राजस्थान के सीकर जिले के खाटू कस्बे में श्याम जी का दरबार है। जयपुर या दिल्ली से रिंगस नामक स्थान पर रेल अथवा सड़क मार्ग से राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-11) के जरिये पंहुचा जा सकता है। रिंगस से श्याम जी के दरबार की दूरी लगभग 17 किलोमीटर की है। यहां से आप टेक्सी कैब आदि माध्यमों से भी पंहुच सकते हैं। धर्मशालाओं में रहने की समुचित व्यवस्था भी आप कर सकते हैं।

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