Bhishma Ashtami Stotra: तिथि, पूजन विधि, तर्पण मंत्र, महत्व और कथा

Sun, Jan 25, 2026
टीम एस्ट्रोयोगी
 टीम एस्ट्रोयोगी के द्वारा
Sun, Jan 25, 2026
Team Astroyogi
 टीम एस्ट्रोयोगी के द्वारा
article view
480
Bhishma Ashtami Stotra: तिथि, पूजन विधि, तर्पण मंत्र, महत्व और कथा

Bhishma Ashtami Stotra: भीष्म अष्टमी स्तोत्र महाभारत के महान योद्धा, दृढ़ प्रतिज्ञ और धर्म के प्रतीक भीष्म पितामह को समर्पित एक पवित्र स्तुति है। कहा जाता है कि उत्तरायण के शुभ काल में उन्होंने अपने प्राण त्यागकर मोक्ष प्राप्त किया। इस स्तोत्र का पाठ श्रद्धा से करने पर व्यक्ति को पितरों का आशीर्वाद मिलता है, परिवार में शांति बढ़ती है और जीवन के महत्वपूर्ण निर्णयों में स्पष्टता प्राप्त होती है। भीष्म पितामह की अद्भुत ज्ञान-शक्ति, कर्तव्यनिष्ठा और त्याग की स्मृति में यह स्तोत्र विशेषकर भीष्म अष्टमी के दिन पाठ करने के लिए अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है।

एस्ट्रोयोगी स्टोर से अब एस्ट्रोलॉजी गिफ्ट भेजना है आसान अपने लव्ड वन्स को दें पॉजिटिव एनर्जी से भरा खास तोहफा! अभी भेजें और उन्हें फील कराएं स्पेशल!

भीष्म अष्टमी स्तोत्र (Bhishma Ashtami Stotra)

अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।

नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम्।।

इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।

सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ।।

मन्वादीनां च नेतार: सूर्याचन्दमसोस्तथा ।

तान् नमस्यामहं सर्वान् पितृनप्युदधावपि ।।

नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा ।

द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि:।।

देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान् ।

अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येहं कृताञ्जलि: ।।

प्रजापते: कश्पाय सोमाय वरुणाय च ।

योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि: ।।

नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु ।

स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ।।

सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा ।

नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ।।

अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् ।

अग्रीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत: ।।

ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्रिमूर्तय:।

जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण: ।।

तेभ्योखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतामनस:।

नमो नमो नमस्तेस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुज ।।

भीष्म तर्पण श्लोक (Bhishma Tarpan Shlok)

इस व्रत के करने से मनुष्य सुन्दर और गुणवान् संतति प्राप्त करता है-

माघे मासि सिताष्टम्यां सतिलं भीष्मतर्पणम् ।

श्राद्धं च ये नराः कुर्युस्ते स्युः सन्ततिभागिनः ॥

महाभारत के अनुसार, जो व्यक्ति माघ शुक्ल अष्टमी के दिन भीष्म पितामह के नाम से तर्पण, जलदान आदि करता है, उसके पूरे वर्ष के पाप नष्ट हो जाते हैं।

शुक्लाष्टम्यां तु माघस्य दद्याद् भीष्माय यो जलम् ।

संवत्सरकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति ॥

भीष्म तर्पण व्रत-विधि

इस दिन सुबह नित्यकर्म पूरा करने के बाद, यदि संभव हो तो किसी पवित्र नदी या सरोवर के किनारे स्नान करें। यदि बाहर जाना संभव न हो, तो घर पर ही शुद्ध विधि से स्नान कर भीष्म पितामह के नाम से तर्पण की तैयारी करें। हाथ में तिल और जल लेकर अपसव्य अर्थात् जनेऊ को दाहिने कंधे पर रखें। यदि जनेऊ न हो, तो उत्तरीय या गमछे को दाहिने कंधे पर रखना नियम माना गया है। इसके बाद दक्षिण दिशा की ओर मुख करके नीचे दिए गए मंत्रों द्वारा तर्पण करें।

वैयाघ्रपदगोत्राय सांकृत्यप्रवराय च ।

गङ्गापुत्राय भीष्माय सर्वदा ब्रह्मचारिणे ॥

भीष्मः शान्तनवो वीरः सत्यवादी जितेन्द्रियः ।

आभिरद्भिरवाप्नोतु पुत्रपौत्रोचितां क्रियाम् ॥

यह तर्पण दाहिने हाथ पर बने पितृतीर्थ द्वारा अंजलि देकर करें अर्थात् उपरोक्त मंत्रों को पढ़ते हुए तिल-कुश युक्त जल को तर्जनी और अंगूठे के मध्य भाग से  होते हुए पात्र पर छोड़ें।

इसके बाद पुनः सव्य[वापस पहले की तरह बायें कंधे पर जनेऊ कर लें।] होकर निम्न मंत्र से गङ्गापुत्र भीष्म को अर्घ्य देना चाहिये-

वसूनामवताराय शान्तनोरात्मजाय च ।

अर्घ्यं ददामि भीष्माय आबालब्रह्मचारिणे ॥

इसके बाद तर्पण और अर्घ्य वाले इस जल को किसी पवित्र वृक्ष की जड़ पर डाल दें।

भीष्म पितामह को अर्घ्य अर्पणः

तर्पण की विधि पूर्ण होने के बाद जनेऊ को पुनः अपने बाएँ कंधे पर स्थापित करें और दोनों हाथ जोड़कर पितरों को श्रद्धा से प्रणाम करें। गंगापुत्र भीष्म की पवित्र स्मृति में जलयुक्त अर्घ्य अर्पित करें तथा उनके आदर्शों और जीवन मूल्यों को अपने आचरण में अपनाने का संकल्प लें।

भीष्म अर्घ्य मंत्र (Bhishma Tarpan Mantra)

वसूनामवताराय शंतनोरात्मजाय च |

अर्घ्यं ददामि भीष्माय आबल्य ब्रह्मचारिणे ||

इस उपरोक्त श्लोक से ताम्बे के कलश में जल लेकर भीष्म को उद्देशित करे अर्घ्य देना चाहिये ||

कृपया ध्यान दे : कौस्तुभ के अनुसार जिनके पिता जीवित हो उनके पुत्रो को यह तर्पण नहीं करना चाहिये।

पिता को ही यह तर्पण करना है | इस तर्पण को करते समय यज्ञोपवीत अपसव्य करके ही करना है |

यह तर्पण महिलाओ को नहीं करना चाहिये ||

|| भीष्म तर्पण सम्पूर्णं ||

भीष्म कथा

भीष्म पितामह हस्तिनापुर के राजा शान्तनु के पुत्र थे और उनकी माता देव नदी भागीरथी श्रीगंगा थीं। बचपन में उनका नाम देवव्रत था। उन्होंने शास्त्रों की शिक्षा देवगुरु बृहस्पति से तथा अस्त्र-शस्त्र की विद्या भगवान परशुराम से प्राप्त की। उनके समय में शस्त्र और शास्त्र—दोनों का इतना व्यापक ज्ञान किसी अन्य के पास नहीं था। वीरता के साथ वे अत्यंत सदाचारी और धर्मनिष्ठ थे। इन्हीं गुणों से प्रसन्न होकर महाराज शान्तनु ने उन्हें युवराज घोषित किया था।

एक अवसर पर महाराज शान्तनु शिकार के लिए निकले। वहीं उन्हें मत्स्यगन्धा नामक निषादकन्या दिखाई पड़ी, जो पाराशर ऋषि के वरदान से अद्वितीय रूपवती बन गई थी। उसके शरीर से एक योजन दूर तक कमल की सुगंध फैलती थी। उसके सौंदर्य से मोहित होकर महाराज शान्तनु ने निषादराज से उसका विवाह माँगा। लेकिन निषादराज ने यह शर्त रखी कि उसी कन्या से उत्पन्न पुत्र ही भविष्य में राजा बनेगा।

शान्तनु इस शर्त से दुखी हो गए, क्योंकि इससे देवव्रत का अधिकार छिन जाता। लेकिन वे मत्स्यगन्धा के प्रति अपने आकर्षण से उबर नहीं सके और उदासी में रहने लगे। देवव्रत को जब पिता की व्यथा और उसका कारण पता चला, तो वे निषादराज के पास पहुँचे और उन्होंने पिता के लिए उस कन्या का प्रस्ताव रखा। निषादराज ने पुनः वही शर्त सामने रख दी।

तब देवव्रत ने अपने पिता की इच्छा पूर्ण करने का निर्णय लेते हुए प्रतिज्ञा की कि मत्स्यगन्धा से उत्पन्न संतान ही गद्दी पर बैठेगी और वे स्वयं कभी सिंहासन का अधिकारी नहीं बनेंगे। निषादराज ने आशंका जताई कि भले ही वे स्वयं राजसिंहासन न लें, लेकिन उनके पुत्र भविष्य में अधिकार के लिए संघर्ष कर सकते हैं। यह सुनते ही देवव्रत ने सभी दिशाओं और देवताओं को साक्षी मानकर आजीवन ब्रह्मचारी रहने और विवाह न करने की भयानक प्रतिज्ञा ले ली। इसी अत्यंत कठोर व्रत के कारण उन्हें ‘भीष्म’ नाम दिया गया।

अपने पिता की खुशी के लिए इतना बड़ा त्याग करने वाले आजीवन बालब्रह्मचारी भीष्म का जीवन हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है। भले ही उनका देहांत पुत्रहीन अवस्था में हुआ, लेकिन उनके अक्षुण्ण ब्रह्मचर्य व्रत और आदर्श जीवन के कारण पूरा हिन्दू समाज उन्हें पुत्र-समान मानकर तर्पण करता है।

‘भीष्मं तर्पयामि’ कहते हुए पतितपावनी गंगा के पुत्र भीष्म को भीष्माष्टमी पर हमारा शत-शत प्रणाम।

भीष्म अष्टमी पर पूजन और तर्पण विधि

प्रातःकाल स्नान और शुद्धिः सुबह सूर्योदय से पूर्व उठें। नित्यकर्म के बाद स्नान करें। यदि पवित्र नदी, सरोवर या कुंड में स्नान संभव न हो तो घर के स्नान जल में गंगाजल मिलाएँ। इसके बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 

पूजन स्थल की तैयारीः भीष्म पितामह के चित्र या प्रतिमा के सामने दीपक जलाएँ, पुष्प अर्पित करें और भगवान विष्णु का ध्यान करें। पूजा स्थल को शांत और पवित्र रखें। 

तर्पण का संकल्प एवं दिशाः अब अपने पूर्वजों और भीष्म पितामह की शांति हेतु तर्पण का संकल्प लें। तर्पण के समय दक्षिण दिशा की ओर मुख रखकर बैठें। यदि जनेऊ धारण करते हैं, तो इसे दाएँ कंधे पर चढ़ा लें, जिसे उपवीत स्थिति कहते हैं। 

जल-तिल अर्पण और मंत्र जापः हाथ में जल, तिल और कुश लेकर नीचे दिए गए पवित्र मंत्र का उच्चारण करते हुए शांतचित्त होकर तर्पण करें।

भीष्म अष्टमी पर किसी भी तरह की ज्योतिषीय हेल्प चाहिए? तो अभी बात करें एस्ट्रोयोगी के टॉप एस्ट्रोलॉजर्स से – समाधान सिर्फ एक कॉल दूर

article tag
Festival
article tag
Festival
नये लेख

आपके पसंदीदा लेख

अपनी रुचि का अन्वेषण करें
आपका एक्सपीरियंस कैसा रहा?
facebook whatsapp twitter
ट्रेंडिंग लेख

ट्रेंडिंग लेख

और देखें

यह भी देखें!