Gangaur Geet: गणगौर गीत राजस्थान की लोकसंस्कृति की सुंदर और मधुर अभिव्यक्ति हैं। ये गीत विशेष रूप से गणगौर पर्व के दौरान गाए जाते हैं, जो माता पार्वती और भगवान शिव को समर्पित होता है। इस पर्व में महिलाएं और कुंवारी लड़कियां सुहाग, सुख-समृद्धि और अच्छे जीवनसाथी की कामना करती हैं। गणगौर गीतों में मायके की याद, ससुराल का जीवन, प्रेम, भक्ति और लोकजीवन की भावनाएं बड़ी सरल भाषा में व्यक्त होती हैं। इन गीतों की धुन और बोल मन को छू लेते हैं और त्योहार के माहौल को और भी उल्लासपूर्ण बना देते हैं।
गणगौर गीत राजस्थान की लोक संस्कृति और परंपराओं से जुड़े मधुर लोकगीत होते हैं। इन गीतों के माध्यम से महिलाएं माता गौरी से सुखी वैवाहिक जीवन और खुशहाली की कामना करती हैं।
बाड़ी वाला बाड़ी खोल,
बाड़ी की किवाड़ी खोल,
छोरियां आई दूब न।
थे कुण्या जीरी बेटी हो,
कुण्या जीरी भैण हो,
के तुम्हारो नाम है।
म्हे ब्रह्मादास जीरो बेटी हो,
ईसरदास जीरो भैण हो,
रोवां म्हारो नाम है।
बाड़ी वाला बाड़ी खोल,
बाड़ी की किवाड़ी खोल।
हरिये गोबर गीली दाबो,
मोत्यां चोक पुरावो।
मोत्यां का दोय आखा ल्यावो,
निरणी गोर पुजावो॥
गोर ए गणगौर माता,
खोल किवाड़ी।
बाहेर ऊठी रोवां,
पूजण वाली॥
पूजो एक पुजावो सइयां,
क्या फल माँगा।
माँगा ए म्हे अन्न धन,
लाछर लक्ष्मी॥
जलहर जामी बाबुल माँगा,
राता देई मायण।
कान कंवर सो बीरो माँगा,
राई सी भोजाई॥
ऊँट चडयो बहनोई माँगा,
चूड़ल वाली भैणड़।
पूत पिछोकड़ फूफो माँगा,
मांडा पोवण भुवा॥
लाल दुशाला चाचा माँगा,
बिणजारी सी चाची।
गोर ए गणगौर माता,
खोल किवाड़ी॥
नीव ढलती बेलड़ी जी,
मालन फुलड़ा सा ल्याय।
ईसरदास थारो कोटडया जी,
मालन फुलड़ा सा ल्याय।
कानीराम थारो आरती जी॥
आरतड़दात धाम सुपारी,
लागी डोड़ा स जी।
डोड़ा राज कोट चिणाए,
झीलो म्हारी चूनड़ी जी॥
गायां जाई छ ठाणम जी,
बहुवां जाई छ साल,
झीलो म्हारी चूनड़ी जी।
गायां जाया बाछड़ा जी,
बहुवां जाया छ पूत,
झीलो म्हारी चूनड़ी जी॥
गायां खाया खोपरा जी,
बहुवां खाई छ सूट,
झीलो म्हारी चूनड़ी जी।
गायां क गल घूघरा जी,
बहुवां कागल हार,
झीलो म्हारी चूनड़ी जी॥
गोरल जायो द पूत जी,
कुण खिलायगी जी।
खिलासी रोवां ननद,
झाबर क पालण जी॥
आँख मोड़, नाक मोड़,
कड़ मोड़, घूमर घाल,
बाड़ी न रुंदल जी॥
बाड़ी म लाल किवाड़,
झीली म्हारी चूनड़ी जी।
आवगा ब्रह्मदासजी रा पूत,
पाजोव थारी मन राली जी॥
एल खैल नंदी जाय,
यो पाणी कित जाय सी।
आदो जासी अलियाँ गलियाँ,
आदो ईसरदास न्हासी॥
आदो जासी अलियाँ गलियाँ,
आदो कानीराम न्हासी॥
ईसरदास करया बधावना बहू,
गोरल जायो पूत जी॥
कानीराम घोड़ी घूघरा बहू,
लाडेला माथ मोर जी॥
अड़दा द्यावो, पड़दा द्यावो,
बंदरवाल बंधावो॥
सार की सूई ल्यावो,
पात का तागा।
सीमर दर्जी का बीटा,
भाई का भतीजा नागा॥
सीमतां पोवतां दिन दस लागा।
पैरो र म्हारा भाई भतीजा,
भुवा ल्याई बागा॥
अं भुवा क कारण,
भतीजा रहगा नागा॥
नागा नागा के करो,
था न और सिवास्यां बागा॥
पैरो र म्हारा भाई भतीजा,
भुवा ल्याई बागा॥
ईसरदास बीरा,
लीलड़ी पलाण क टिक्की ल्यादो जड़ाव की जी।
कानीराम बीरा,
लीलड़ी पलाण क टिक्की ल्यादो जड़ाव की जी।
टिक्की चेप हेमाजलजी की धीय क,
ब्रह्मादासजी की कुल बहू जी।
टिक्की चेप साजनियारी धीय क,
ब्रह्मादासजी की कुल बहू जी।
म्हारी गोर ती साईं ओ,
राज घाट्यांरी मुकुट करो।
ब्रह्मदास बीरा,
ईसरदास राज घाट्यांरी मुकुट करो।
ब्रह्मदासजी रा कानीराम,
राज घाट्यांरी मुकुट करो।
म्हारी गोरां न पाणीड़ा प्याई ओ,
राज घाट्यांरी मुकुट करो।
धूपियो देर धूपईयो ए,
द्यो बाई रोवाक हाथ।
अगर देवर पाइयो ए,
पायो सूरजमल भरतार।
ज तेरो धूपियो सापज ए,
सुहागण सांज सबेर।
हाथां मेहँदी,
सिर धड़ी ए,
चूड़ला रो सर्व सुहाग।
कोयाँ काजल धुल रयो ए,
बिंदली रो सर्व सुहाग।
म्हार माथा न मैंमद ल्याओ रंगरसिया,
गैरोजी फूल गुलाब को।
म्हारी रखड़ी रतन जड़ाओ रंगरसिया,
गैरोजी फूल गुलाब को।
गैरो गैरोजी सासुजी थारो जायो रंगरसिया,
गैरोजी फूल गुलाब को।
म्हारी हथेली फरूक रुपिया ल्याओ रंगरसिया,
गैरोजी फूल गुलाब को।
म्हारा काना म कुंडल ल्याओ रंगरसिया,
गैरोजी फूल गुलाब को।
म्हारा चुड़ला म टीप लगाओ रंगरसिया,
गैरोजी फूल गुलाब को।
गैरो गैरोजी बाईजी थारो बीरो रंगरसिया,
गैरोजी फूल गुलाब को।
म्हारी जीभड़ली फरूक बरफी ल्याओ रंगरसिया,
गैरोजी फूल गुलाब को।
म्हारी आंगालियाँ न बीटी ल्याओ रंगरसिया,
गैरोजी फूल गुलाब को।
म्हारी बेसर बैठ जड़ाओ रंगरसिया,
गैरोजी फूल गुलाब को।
ईसरजी तो पेचो बांध,
गोरा बाई पेच संवार ओ राज,
म्हे ईसर थारी साली छां।
साली छां मतवाली ओ राज,
भंवर पटा पर वारी ओ राज।
केसर की सी क्यारी ओ राज,
लूंगा की सी बाड़ी ओ राज।
माय भैण स प्यारी ओ राज,
चाबा लूँग सुपारी ओ राज।
म्हे ईसर थारी साली छां।
यो मोती समंदरियां म नीपज,
सोवणा ईसरदास र कान,
बधावोजी म्हारी गोर को।
बाधगा कानीराम क कान,
बधावोजी म्हारी गोर को।
म्हे थान बूजां बहू ए गोरल दे,
थारो छ मोत्यां जोगो भाग,
बधावोजी म्हारी गोर को।
ओ गोरल तू आंछी आव,
ओ गोरल तू पाछी आव,
तन बाई रोवां याद कर।
ओ गोरल तू आवण देख,
ओ गोरल तू बावण देख,
तन बाई सोवां याद कर।
इस तरह गणगौर गीत केवल गीत नहीं, बल्कि हमारी परंपरा, भावनाओं और संस्कृति की जीवंत पहचान हैं। ये गीत पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे लोकविश्वास और स्त्री मन की सच्ची अभिव्यक्ति को दर्शाते हैं। गणगौर पर्व पर गाए जाने वाले ये लोकगीत आपसी प्रेम, सौहार्द और आस्था को मजबूत करते हैं तथा त्योहार की खुशियों को दोगुना कर देते हैं।