Lohri Kyu Manate Hai: सर्दियों की ठिठुरन से भरी रातों में हर गली-मोहल्ले में अलाव जलने शुरू हो जाते हैं। इसी समय से लोग लोहड़ी के त्योहार का इंतजार करना शुरू कर देते हैं। इस त्योहार को खासतौर पर उत्तर भारत जैसे पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, और जम्मू आदि राज्यों में मनाया जाता है। इस दौरान बड़ी मात्रा में लकड़ियों को इखट्ठा करके अलाव जलाया जाता है और आग के चारों ओर घूमकर ढोल की थाप पर नाचा जाता है। यह त्योहार हर साल जनवरी में 13 या 14 यानी मकर सक्रांति से एक रात पहले मनाया जाता है। यह त्योहार लंबी रातों को अलविदा कहकर एक नए मौसम के आगमन का प्रतीक है। लेकिन वास्तव में लोहड़ी क्यों मनाई जाती है और इसके पीछे का महत्व क्या है यह बहुत कम लोग जानते हैं। इस पर्व के साथ फसल के प्रति आभार, कुछ लोक कथाएं, ग्रह नक्षत्रों का बदलाव और लोगों में एकता बढ़ाने वाली परंपरा भी शामिल है।
तो चलिए आज जानते हैं कि लोहड़ी क्यों मनाते हैं, इसकी शुरुआत कहां से हुई, और इसे किस तरह मनाया जाता है। साथ ही आपको इस दौरान होने वाले ज्योतिषीय बदलावों के बारे में भी यहां जानने को मिलेगा।
लोहड़ी पंजाब का मशहूर त्योहार है, जिसे हर साल मकर संक्रांति से एक रात पहले, सूरज ढलने के बाद मनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है कि इसके नाम में भी तीन चीज़ों का संकेत मिलता है, ला यानी लकड़ी, ओह यानी सूखे उपले, और ड़ी यानी रेवड़ी जैसी मिठाई। इस त्योहार की चहल-पहल कई सप्ताह पहले ही शुरू हो जाती है। लगभग बीस–पच्चीस दिन पहले बच्चे घर-घर जाकर लकड़ियाँ और उपले इकट्ठा करते हैं और रास्ते में लोहड़ी के पारंपरिक गीत गाते रहते हैं। फिर त्योहार वाली शाम को इन्हीं चीज़ों से मोहल्ले की किसी खुली जगह या चौराहे पर बड़ा सा अलाव जलाया जाता है।
लोहड़ी की शुरुआत कोई आज की बात नहीं है। इसकी नींव उन पुराने समयों में मिलती है जब सिंधु घाटी सभ्यता के लोग खेती पर निर्भर रहते थे। पंजाब और आसपास के इलाकों में गेहूं, सरसों और गन्ने जैसी फसलें सूरज की चाल पर ही फलती-फूलती थीं। साल का यह समय सर्दियों के सबसे छोटे दिन के बाद आता है, जब सूरज दक्षिण की ओर से लौटकर उत्तर की ओर बढ़ने लगता है। इस बदलाव को नई शुरुआत, उपजाऊपन और खुशहाली का संकेत माना जाता था।
पुराने दौर में किसान सूरज देव और धरती माता को धन्यवाद देने के लिए लोहड़ी मनाते थे। आग जलाने की यह परंपरा इसी कृतज्ञता का रूप मानी जाती है। हिंदू परंपरा में भी लोहड़ी का संबंध फसल के चक्र और अग्नि पूजा से जुड़ा है। ऋग्वेद में अग्नि देव के लिए किए जाने वाले यज्ञों का ज़िक्र मिलता है, जिनसे सुरक्षा और समृद्धि की कामना की जाती थी। पंजाब के सिख समुदाय भी लोहड़ी को अपनाते हैं और कई जगह इसे गुरु गोबिंद सिंह के पुत्रों के जन्म या प्रकाश और आशा के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।
कुल मिलाकर, लोहड़ी सिर्फ एक त्योहार नहीं है। यह प्रकृति के प्रति सम्मान, लोकनायकों की याद, और समुदाय को जोड़ने वाली सदियों पुरानी परंपराओं का मिश्रण है।
पंजाब की लोककथाओं में दुल्ला भट्टी को लोहड़ी का नायक माना जाता है। वे मुगल शासन के समय गरीबों के मददगार और अन्याय के खिलाफ खड़े होने वाले बहादुर रणबांकुरे थे। दुल्ला ने कई लड़कियों को जबरन शादी और गुलामी से बचाया, उनके विवाह कराए और उन्हें सम्मान के साथ विदा किया। ऐसा कहते हैं कि वे रात में अलाव जलाकर सुरक्षित रास्ते का संकेत भी देते थे। लोहड़ी पर गाया जाने वाला गीत “सुंदर मुन्द्रिये” आज भी उनकी इसी हिम्मत और इंसानियत को याद करता है।
लोहड़ी का त्योहार आग, संगीत और मिल-बैठकर खाने की खूबसूरत परंपराओं से बनता है। शाम ढलते ही इसका असली रंग सामने आता है। यहाँ जानिए कि लोहड़ी आमतौर पर कैसे मनाई जाती है:
1. अलाव जलाया जाता है
शाम होते ही मोहल्ले के बीच एक बड़ा सा अलाव जलाया जाता है। इसके लिए बेर, कीकर जैसी झाड़ियों की लकड़ियाँ इस्तेमाल की जाती हैं। परिवार आग के चारों ओर बैठकर तिल, गुड़, मक्का और गन्ने के छोटे टुकड़े आग में अर्पित करते हैं और "हो लोहड़ी!" जैसी बोलियाँ लगाते हैं। यह सब सुख-समृद्धि की कामना का प्रतीक है।
2. देवी-देवताओं की पूजा
इसके बाद एक छोटी-सी पूजा होती है जिसमें सूर्य देव, अग्नि देव और स्थानीय देवी-देवताओं का स्मरण किया जाता है। तिल और गुड़ को शुभ माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि सफेद तिल शिव का और गुड़ शक्ति का प्रतीक है, जो मिलकर संतुलन और एकता का संदेश देते हैं।
3. लोकगीत और कथाओं का चलन
फिर शुरू होती है लोहड़ी की चहल-पहल। लोग दुल्ला भट्टी, फसल और प्यार की कहानियों से जुड़ी बोलियाँ गाते हैं। ढोल की थाप पड़ते ही भांगड़ा और गिद्धा अपने आप शुरू हो जाते हैं। बच्चे, बड़े, हर कोई ताल में झूमने लगता है।
4. स्वादिष्ट पकवानों का मज़ा
लोहड़ी का मज़ा इसके खाने के बिना पूरा नहीं होता। मक्की की रोटी, सरसों का साग, रबड़ी, दही भल्ले और तिल-गुड़ के लड्डू ठंड में शरीर को गर्म रखते हैं और स्वाद भी बढ़ाते हैं।
5. आशीर्वाद और शुभकामनाएं
अंत में बड़े-बुजुर्ग बच्चों को आरती की थाली घुमाकर आशीर्वाद देते हैं। नए शादीशुदा जोड़ों और नवजात बच्चों को विशेष शुभकामनाएँ और उपहार दिए जाते हैं, क्योंकि माना जाता है कि लोहड़ी उनके जीवन में नई खुशियाँ लाती है।
इस त्योहार को आप भी अपने परिवार और समूह के साथ पूरे उत्साह से मनाएं, और प्रकृति का आभार व्यक्त करें।
एस्ट्रोयोगी की ओर से आप सभी को लोहड़ी की बधाइयां!
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