महाशिवरात्रि पौराणिक व्रत कथा: चित्रभानु शिकारी और शिव-पार्वती विवाह की कहानी

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महाशिवरात्रि पौराणिक व्रत कथा: चित्रभानु शिकारी और शिव-पार्वती विवाह की कहानी

Maha Shivaratri Story In Hindi: सभी शिव भक्तों को महाशिवरात्रि का बड़ी ही बेसब्री से इंतजार होता है। पूरी श्रद्धा के साथ शिव की साधना करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का यह सबसे पवित्र अवसर होता है। साल 2026 में महाशिवरात्रि 27 फरवरी को मनाई जायेगी। ऐसा माना जाता है कि इस दिन शिव और शक्ति का पवित्र विवाह संपन्न हुआ था। यही कारण है कि बड़ी संख्या में शिव भक्त इस दिन व्रत का संकल्प लेते हैं और अच्छे वैवाहिक जीवन की भी कामना करते हैं। 

इसके अलावा यह भी माना जाता है कि इस समय सृष्टि के निर्माण और संहार से जुड़ी शिव की ऊर्जा सक्रिय होती है। इसलिए दिन किया गया मंत्र जाप, पूजा, साधना या कथा अन्य दिनों की तुलना में बहुत फलदायी साबित होती है। महाशिवरात्रि पर रात्रि पूजा को भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।

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महाशिवरात्रि की कथा (Maha Shivaratri Story In Hindi)

महाशिवरात्रि की यह प्रसिद्ध कथा आपको बताती है कि भगवान शिव की कृपा कैसे अनजाने में की गई भक्ति से भी मिल सकती है। यह कथा एक शिकारी चित्रभानु से जुड़ी है, जो परिस्थितियों के कारण महाशिवरात्रि का व्रत और पूजन बिना जाने ही कर बैठता है। चित्रभानु एक गांव में रहने वाला शिकारी था। वह कर्ज के बोझ से परेशान था और उससे निकलने का कोई रास्ता उसे नजर नहीं आ रहा था। एक दिन साहूकार ने उसे पकड़ लिया और शिव मंदिर में बंद कर दिया। संयोग से वह दिन महाशिवरात्रि का था। 

वहीं रहते हुए चित्रभानु ने शिवरात्रि की महिमा और कथा सुनी। शाम को उसने साहूकार से वादा किया कि अगर उसे छोड़ दिया जाए तो वह अगले दिन कर्ज चुका देगा। भरोसा करके साहूकार ने उसे छोड़ दिया। कर्ज चुकाने की चिंता में चित्रभानु जंगल में शिकार की तलाश में निकल पड़ा। जंगल में एक तालाब के पास उसे एक बेल का पेड़ दिखाई दिया। उसी पेड़ के नीचे शिवलिंग स्थापित था, लेकिन चित्रभानु इससे अनजान था। वह पेड़ पर चढ़कर शिकार का इंतजार करने लगा। 

भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह बार-बार बेल के पत्ते तोड़कर नीचे गिराता रहा, जो सीधे शिवलिंग पर गिरते रहे। इस तरह बिना जाने वह शिव पूजन करता रहा। कुछ समय बाद तालाब की ओर एक गर्भवती हिरणी आई, जो पानी पीने के लिए वहां पहुंची थी। चित्रभानु ने जैसे ही उसे देखा, शिकार करने की तैयारी कर ली। तभी उस हिरणी ने विनम्र स्वर में कहा कि वह गर्भ से है और यदि उसका वध किया गया, तो यह दो जीवन समाप्त करने के समान होगा। उसने यह भी वादा किया कि बच्चे को जन्म देने के बाद वह स्वयं वापस आ जाएगी। हिरणी की बातों ने चित्रभानु के मन को छू लिया और उसने उस पर दया करते हुए उसे जाने दिया। इसी दौरान उसके हाथ से कुछ बेल पत्र नीचे गिर पड़े, जो अनजाने में शिवलिंग पर अर्पित हो गए। इस प्रकार पहला प्रहर बिना जाने पूर्ण हो गया। 

कुछ देर बाद दूसरी हिरणी वहां आई। चित्रभानु ने फिर से धनुष उठाया, लेकिन उस हिरणी ने आग्रह किया कि वह अपने साथी से बिछुड़ गई है और उसे खोजने निकली है। उसने अनुरोध किया कि मिलन के बाद वह स्वयं लौट आएगी। चित्रभानु ने उसे भी मुक्त कर दिया। रात धीरे-धीरे बीतती गई और हर प्रहर में बेल पत्र शिवलिंग पर गिरते रहे। अंतिम पहर के समय एक हिरणी अपने बच्चों के साथ वहां आई। उसने भी अपने परिवार की रक्षा की गुहार लगाई, जिसे सुनकर चित्रभानु का हृदय भर आया और उसने उन्हें भी जाने दिया। 

थोड़ी देर बाद एक हिरण सामने आया। इस बार चित्रभानु ने सोचा कि अब शिकार करेगा, लेकिन हिरण ने भी उससे थोड़ी देर का समय मांगा। चित्रभानु ने उसे पूरी रात की घटनाएं सुना दीं। हिरण ने कहा कि जैसे बाकी हिरणियां वचन देकर गई हैं, वैसे ही अगर वह मारा गया तो वे अपना धर्म पूरा नहीं कर पाएंगी। उसने भी भरोसा दिलाया कि वह सबके साथ शीघ्र लौट आएगा। 

चित्रभानु ने विश्वास करके उसे भी जीवनदान दे दिया। इस तरह पूरी रात जागरण, उपवास और बेल पत्र अर्पण के साथ महाशिवरात्रि की पूजा अनजाने में पूरी हो गई। सुबह होते ही जब सभी हिरण वापस लौटे, तो चित्रभानु का मन पश्चाताप और करुणा से भर गया। उसने शिकार छोड़ दिया। जीवन के अंत समय में जब यमदूत उसे लेने आए, तो शिव के गणों ने उन्हें लौटा दिया और चित्रभानु को शिवलोक ले गए। भगवान शिव की कृपा से उसे अपने पूर्व जन्म का स्मरण भी हुआ और अगले जन्म में उसने जानबूझकर महाशिवरात्रि का व्रत किया 

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महाशिवरात्रि कथा : माता पार्वती और भगवान शिव का विवाह 

महाशिवरात्रि से जुड़ी एक अत्यंत भावपूर्ण और महत्वपूर्ण कथा भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की है। यह कथा केवल एक विवाह की कहानी नहीं है, बल्कि चेतना और ऊर्जा के संतुलन का प्रतीक मानी जाती है। माता सती के देह त्याग के बाद भगवान शिव गहरे वैराग्य में चले गए और वर्षों तक तपस्या में लीन रहे। उधर माता सती ने पार्वती के रूप में राजा दक्ष के घर जन्म लिया। बचपन से ही पार्वती का मन शिव भक्ति में रमा हुआ था। उन्होंने भगवान शिव को अपने पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की। 

उनका यह तप केवल इच्छापूर्ति के लिए नहीं था, बल्कि पूर्ण समर्पण और अटूट श्रद्धा का प्रतीक था। महाशिवरात्रि की पावन रात्रि पर ऋषि-मुनियों ने शिव को पार्वती की तपस्या, धैर्य और निस्वार्थ प्रेम की कथा सुनाई। पार्वती की भक्ति और साधना ने शिव का हृदय पिघला दिया। इसी शुभ रात्रि पर शिव ने पार्वती को स्वीकार किया और उनका विवाह संपन्न हुआ। 

यह विवाह केवल सांसारिक नहीं, बल्कि ब्रह्मांडीय महत्व रखता है। शिव को पुरुष तत्व यानी चेतना माना जाता है और पार्वती को प्रकृति यानी शक्ति। इन दोनों का मिलन सृष्टि में संतुलन, सृजन और स्थिरता लाता है।

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