रुद्राक्ष धारण करना या मंत्र जाप करने में कौन है ज्यादा फलदायी? जानिए

20 अगस्त 2019

हिंदू और सनातन धर्म में मालाओं और रत्नों का बहुत महत्व है। माना जाता है कि मनुष्य को ये मालाएं और रत्न ही नकारात्मक ऊर्जा से बचाते हैं। प्राचीन काल में ऋषि मुनि अपनी साधना को सिद्ध करने के लिए इन मालाओं से मंत्र जाप किया करते थे लेकिन आज भी लोग रुद्राक्ष और तुलसी की माला को धारण करते हैं ताकि उनका चित्त शांत और मन एकाग्र रहे। आमतौर पर बात जब रुद्राक्ष की आती है तो सबसे पहले ख्याल आता है कि रुद्राक्ष कौन सा अच्छा होता है और इससे फायदा क्या होता है? रुद्राक्ष को धारण करना शुभ है या इससे मंत्र का जाप करना? ऐसे कई सवाल आपके जहन में रुद्राक्ष को लेकर उठते होंगे तो चलिए आज हम इन सभी सवालों के जवाब आपको विस्तार से देंगे...

 

रुद्राक्ष की उत्पत्ति

रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन आपको वेदों में, पुराणों में और उपनिषदों में मिल जाएगा। शिवपुराण के अध्याय 25 में "दर्शकनास्पर्शनाप्यत्सर्वपापहर: स्मृतः ॥" श्लोक को वर्णित किया गया है। कहा गया है कि यह रुद्राक्ष एक अत्यंत शुभ मनका है और भगवान भोलेनाथ को अत्यंत प्रिय है। इस मनका का जाप करने से या इसे माला के रूप में धारण करने से ही पाप नष्ट हो जाते हैं। यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि शिव और रुद्राक्ष एक-दूसरे के पूरक हैं। मान्यता है कि रुद्राक्ष में शिव वास करते हैं। रुद्राक्ष की उत्पत्ति को लेकर कई पौराणिक मान्यताएं हैं। एक प्रसिद्ध मान्यता के अनुसार, हजारों वर्षों तक समाधि में लीन रहने के बाद जब भगवान भोलेनाथ ने अपने नेत्र खोले तो उनके नेत्रों से अश्रु छलक आए और वह धरती पर गिर पड़े। इन्ही अश्रु की बूंदों से रुद्राक्ष वृक्ष की उत्पत्ति हुई।    

रुद्राक्ष के प्रकार 

शिव के अश्रु से उत्पन्न रुद्राक्ष जनासाधारण के लिए बहुत महत्व रखता है। आमतौर पर रुद्राक्ष के प्रकार की बात की जाए तो यह एकमुखी से चौदहमुखी तक पाए जाते हैं, लेकिन अक्सर मन में संदेह रहता है कि कौन सा रुद्राक्ष उत्तम और फलदायी है? ज्योतिष की माने तो आंवले के आकार वाला रुद्राक्ष श्रेष्ठ माना गया है और इसे पहनने से जीवन की समस्त परेशानियां दूर हो जाती हैं। वहीं बेर के आकार का रुद्राक्ष मध्यम फलदायी माना गया है और इसे धारण करने से सौभाग्य और सुख-समृद्धि की प्राप्त होती है। अंत में चने के आकार वाला रुद्राक्ष निम्न कोटि का माना जाता है और इसे धारण करने पर सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। अगर बात सबसे श्रेष्ठ रुद्राक्ष की जाए तो जिस रुद्राक्ष में डोरा पिरोने के बराबर स्वयं छिद्र हो जाता है, उसे अधिक फल दायी माना जाता है। 

धारण करने का तरीका

शास्त्रों के अनुसार, 1100 रुद्राक्ष धाऱण करने के बाद मनुष्य को जगत में जिस फल की प्राप्ति होती है उसका वर्णन करना असंभव है। ज्योतिष की माने तो मानसिक तनाव को दूर करने के लिए 100 दानों की रुद्राक्ष, अच्छे स्वास्थ्य के लिए 140 दानों की रुद्राक्ष, धन प्राप्ति के लिए 62 दानों की रुद्राक्ष और 360 दानों की 3 माला बनाकर यज्ञोपवित यानि जनेऊ करना चाहिए। इसके अलावा रुद्राक्ष को शरीर के विभिन्न अंग में धारण करते वक्त अलग-अलग मंत्रोच्चारण करना हितकारी होता है। यदि आप सिर पर रुद्राक्ष धारण कर रहे हैं तो ईशान मंत्र का जाप करें, यदि रुद्राक्ष को कान में धारण कर रहे हैं तो तत्पुरुष मंत्र का जाप करें और गले में धारण करते वक्त अघोर मंत्र का जाप करना चाहिए। वहीं उदर यानि पेट पर 15 रुद्राक्ष वाला माला धारण करते वक्त वामदेव मंत्र का जाप करना चाहिए। यदि आप 3,5,7 मनका वाला रुद्राक्ष धारण कर रहे हैं तो आपको 5 बार ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जाप करना चाहिए। 

वर्ण के अनुसार धारण करें रुद्राक्ष

शिवपुराण के अनुसार, आपको अपने वर्ण या जाति के मुताबिक ही रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। ब्राह्मण वर्ण को गिरिराजनंदिनी उमे! श्वेत रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। क्षत्रिय को गहरी लाल रंग का रुद्राक्ष धारण करना शुभ बताया गया है। वहीं वैश्य को पीले रुद्राक्ष को धारण करना चाहिए और शूद्र को काले रंग का रुद्राक्ष धारण करना हितकर रहता है। ऐसा वेदों में वर्णित हैं। 

"सर्वाश्रमाणां वर्णानां स्त्रीशूद्राणां शिवाज्ञया| धार्याः सदैव रुद्राक्षा यतीनां प्रणवेन हि || "

अर्थात् सभी आश्रमों, समस्त वर्णों, स्त्रियों और शुद्र को भी भगवान शिव की आज्ञा के अनुसार सदैव रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। 

रुद्राक्षधारी पुरुष को अपने खान-पान में मदिरा, मांस, लहसुन, प्याज, सहिजन, लिसोड़ा आदि का त्याग कर देना चाहिए। 

रुद्राक्ष के प्रकार

रुद्राक्ष के मुखों के भेद से 14 प्रकार के रुद्राक्ष धारण करने का विधान है। एकमुखी से लेकर 14 मुखी तक रुद्राक्ष धारण करने के लिए 14 तरह के मंत्रों का भी वर्णन शिवुपुराण में किया गया है। मनुष्य को नींद और आलस्य को छोड़कर भक्तिपूर्वक, सभी मनोकामना को पूर्ण करने के लिए निम्मलिखित मंत्रों का जाप करते हुए ही रुद्राक्ष को धारण करना चाहिए।  

1. ॐ ह्रीं नमः 

2. ॐ नमः 

3. ॐ क्लीं नमः 

4. ॐ ह्रीं नमः 

5. ॐ ह्रीं नमः 

6. ॐ श्रीं हुं नमः 

7. ॐ हुं नमः 

8. ॐ हुं नमः 

9. ॐ ह्रीं हुं नमः 

10. ॐ ह्रीं नमः 

11. ॐ ह्रीं हुं नमः 

12. ॐ क्रौं क्ष्रौं रौं नमः

13. ॐ ह्रीं नमः 

14. ॐ नमः 

रुद्राक्ष की माला से जाप

याद रखे कि जिस रुद्राक्ष को आप धारण करते हैं उससे कभी भी मंत्र जाप नहीं करना चाहिए। वहीं ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, रुद्राक्ष धारण करने से अच्छा है कि आप रुद्राक्ष से मंत्र का जाप करें। ये काफी प्रभावशाली होता है। मंत्र जाप करने से आपको चारों ओर एक सकारात्मक ऊर्जा का कवच बन जाता है और नकारात्मक ऊर्जाएं दूर रहती हैं। रुद्राक्ष से जाप करने के विभिन्न तरीके हैं। इनमें से 4 जापों का अपना ही अलग महत्व है।

वाचिक जाप

इस जाप में मंत्रों का उच्चारण जोर से किया जाता है ताकि दूसरे को भी सुनाई दे। उसे वाचिक जाप कहते हैं। यह जाप विधियज्ञ से 10 गुना श्रेष्ठ है। 

उपांशु जाप

इस जाप में मंत्रों का उच्चारण होंठ हिलाकर किया जाता है और मुंह के अंदर ही मंत्रोच्चारण किया जाता है। इस जाप में केवल आप ही जाप को सुन सकते हैं और कोई नहीं। यह जाप विधियज्ञ से 100 गुना श्रेष्ठ होता है। 

भ्रमर जाप

इस जाप में मंत्रों का उच्चाऱण आप भौंरे की तरह गुनगुनाकर करते हैं। इस जाप में होंठ नहीं हिलते, जीह्वा हिलती है और आंखें बंद रहती है। यह जाप विधियज्ञ से सहस्त्र गुना श्रेष्ठ है।

मानस जाप

इसे जाप की आत्मा कहा जाता है। इस जाप में मंत्रोच्चारण नहीं करना होता बल्कि मन में ही मंत्रोच्चारण करना होता है और नेत्रों को बंद रखना होता है। 

सगर्भ जाप

इस जाप को करते वक्त प्राणायाम किया जाता है, वह जप सगर्भ जप कहलाता है। मन को शुद्ध और एकाग्रचित्त रखने के लिए साधक को प्राणायाम करते सयम 40 बार मंत्र का जाप करना चाहिए। यदि साधक ऐसा करने में असमर्थ है तो अपनी क्षमतानुसार आपको मंत्रोच्चार करना चाहिए। रुद्राक्ष से मंत्र जाप करने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। वहीं अलग-अलग प्रकार के रुद्राक्षों की माला से मंत्र जाप करने से अलग-अलग फल भी प्राप्त होता है।

मंत्र जाप करते वक्त ध्यान रखने योग्य बातें  

सबसे पहले माला के मनकों की संख्या कम से कम 27 और 108 होनी चाहिए और हर मनके के बाद एक गांठ जरूर लगी होनी चाहिए। माला से मंत्र जाप करते वक्त तर्जनी अंगुली से माला को नहीं छूना चाहिए। माला को किसी वस्त्र से ढंककर ही जाप करना चाहिए। यदि संभव हो तो सूर्य, अग्नि, गुरु, चंद्रमा, दीपक, जल, ब्राह्मण और गायों के पास ही मंत्र का जाप करना चाहिए, क्योंकि ज्योतिष के मुताबिक यह तरीका श्रेष्ठ माना गया है।

"रुद्राक्षेण जपन्मत्रं पुण्यं कोटिगुणं भवेत् ।

दशकोटिगुणं पुण्यं धारणाल्लभते नर:॥"

अर्थात् रुद्राक्ष से मंत्र जाप करने से फल 1 करोड़ गुना और इसे धारण करने से 10 करोड़ गुना फल प्राप्त होता है। 

रुद्राक्ष धारण करने के नियम

आमतौर पर वर्तमान में रुद्राक्ष को लेकर अवधारणा है कि यह सभी समस्याओं से निजात दिलाने वाला मनका है, लेकिन इस मनके को धारण करने के अपने ही कुछ अलग नियम हैं। यदि आप रुद्राक्षधारी हैं और आप कायदे से नियमों का पालन नहीं करते हैं तो इसके नकारात्मक प्रभाव भी आपको जल्द दिखाई देने लग सकते हैं। जैसे- करियर, फाइनेंशियल, हेल्थ-वेल्थ और मैरिड लाइफ में दिक्कते पैदा होने लगेंगी। इसलिए हम आपको रुद्राक्ष धारण करने के बाद पालन करने वाले नियमों के बारे में बता रहे हैं। नित्यक्रिया के दौरान रुद्राक्ष को उतार देना चाहिए। रुद्राक्ष को कभी भी श्मशान घाट, प्रसूति गृह या अंतिम यात्रा पर नहीं पहने रखना चाहिए। यदि महिलाओं ने इसे धाऱण कर रखा है तो मासिक धर्म के दौरान इसे उतार देना चाहिए। इसके अलावा रात को सोने से पहले रुद्राक्ष को उतारकर सोना चाहिए। 

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