स्कंद षष्ठी 2019 - भगवान कार्तिकेय को समर्पित है शुक्ल पक्ष की षष्ठी

यदि आपके घर में कोई बहुत लंबे समय से बीमार है? आपको हमेशा पैसों की तंगी बनी रहती है? कड़ी मेहनत के बाद भी आपके संतान को सफलता नहीं मिलती है तो आपको हर माह हिंदू कैलेंडर के अनुसार. शुक्ल पक्ष की षष्ठी के दिन भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र भगवान कार्तिकेय की पूजा करनी चाहिए। इस दिन को हिंदू धर्म में स्कंद षष्ठी के रूप में मनाया जाता है। यह त्योहार दक्षिण भारत का प्रमुख पर्व है। इस पर्व को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि इस तिथि को कुमार कार्तिकेय ने तारकासुर नामक राक्षस का वध किया था। दक्षिण भारत में भगवान कार्तिकेय को मुरुगन के नाम से जाना जाता है क्योंकि इनका वाहन मोर है।

 

क्यों कहा जाता है स्कंद षष्ठी? 

 

दरअसल मां दुर्गा के 5वें स्वरूप स्कंदमाता को भगवान कार्तिकेय (kartikeya) की माता के रूप में जाना जाता है। नवरात्रि के 5 वें दिन स्कंदमाता का पूजन करने का विधान है। इसके अलावा इस षष्ठी को चम्पा षष्ठी भी कहते हैं, क्योंकि भगवान कार्तिकेय को सुब्रह्मण्यम के नाम भी पुकारते हैं और उनका प्रिय पुष्प चम्पा है। इस महीने स्कंद षष्ठी 4 सितंबर 2019 को मनाई जा रही है। दक्षिण भारत में यह त्योहार 6 दिनों तक मनाया जाता है। 

 

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स्कंद षष्ठी महत्व 

 

स्कंद षष्ठी मनाने को लेकर पौराणिक मान्यता है कि एक बार भगवान कार्तिकेय अपने माता-पिता और श्रीगणेश से नाराज होकर कैलाश पर्वत से मल्लिकार्जुन चले गए थे। उस वक्त देवलोक में तारकासुर नामक राक्षस ने आतंक मचा रखा था और सभी देवता काफी परेशान थे। तब देवताओं ने भगवान मुरुगन से प्रार्थना की वे देवलोक की रक्षा करें। तब कार्तिकेय ने तारकासुर राक्षस का वध किया और उस दिन स्कंद षष्ठी थी।  भगवान कार्तिकेय (kartikeya) के पराक्रम को देखकर उन्हें देवताओं का सेनापति बना दिया गया। इस पर्व पर भगवान मुरुगन की आराधना से मान-सम्मान, शौर्य-यश और विजय की प्राप्ति होती है। इस शुभ अवसर पर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा का भी विधान है। ज्योतिष की माने तो यह षष्ठी तिथि मंगल ग्रह का स्वामी है और भगवान कार्तिकेय दक्षिण दिशा में निवास करते हैं। इसलिए कर्क राशि वालों को अपना मंगल मजबूत करने के लिए स्कंद षष्ठी का व्रत करना चाहिए। बता दें कि कुमार कार्तिकेय ही स्कंद पुराण के मूल उपदेष्टा हैं और यह पुराण समस्त पुराणों में सबसे विशाल है।

 

स्कंद षष्ठी कथा

 

कुमार कार्तिकेय के जन्म का वर्णन हमें पुराणों में ही मिलता है। जब देवलोक में असुरों ने आतंक मचाया हुआ था, तब देवताओं को पराजय का सामना करना पड़ा था। लगातार राक्षसों के बढ़ते आतंक को देखते हुए देवताओं ने भगवान ब्रह्मा से मदद मांगी थी। भगवान ब्रह्मा ने बताया कि भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही इन असुरों का नाश होगा, परंतु उस काल च्रक्र को दौरान माता सती के वियोग में भगवान शिव समाधि में लीन थे। इंद्र और सभी देवताओं ने भगवान शिव को समाधि से जगाने के लिए भगवान कामदेव की मदद ली और कामदेव ने भस्म होकर भगवान भोलेनाथ की तपस्या को भंग किया। इसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती से विवाह किया और दोनों देवदारु वन में एकांतवास के लिए चले गए। उस वक्त भगवान शिव और माता पार्वती एक गुफा में निवास कर रहे थे। उस वक्त एक कबूतर गुफा में चला गया और उसने भगवान शिव के वीर्य का पान कर लिया परंतु वह इसे सहन नहीं कर पाया और भागीरथी को सौंप दिया। गंगा की लहरों के कारण वीर्य 6 भागों में विभक्त हो गया और इससे 6 बालकों का जन्म हुआ। यह 6 बालक मिलकर 6 सिर वाले बालक बन गए। इस प्रकार कार्तिकेय (kartikeya) का जन्म हुआ। 

 

स्कंद षष्ठी पूजा विधि

 

इस तिथि पर विधिपूर्वक व्रत करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है और रोग, दुख, दरिद्रता से भी मुक्ति मिलती है।.विधिपूर्वक व्रत करने के लिए सबसे पहले प्रातकाल उठकर स्नानादि के बाद नए वस्त्र धारण करें। तत्पश्चात् भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा की स्थापना करें और दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पूजन करें। पूजा सामग्री में घी और दही को अवश्य शामिल करें। इसके बाद भगवान मुरुगन की आराधना के लिए “ॐ तत्पुरुषाय विधमहे: महा सैन्या धीमहि तन्नो स्कंदा प्रचोदयात”।। या“ॐ शारवाना-भावाया नम: ज्ञानशक्तिधरा स्कंदा वल्लीईकल्याणा सुंदरा, देवसेना मन: कांता कार्तिकेया नामोस्तुते” ।। मंत्र का जाप करें। ध्यान रखें कि व्रती को मांस, मदिरा, प्याज, लहसुन का परित्याग कर देना चाहिए। किसी वैद्य से सलाह लेकर ब्राह्मी का रस और घी का सेवन कर सकते हैं और रात्रि को जमीन पर सोना चाहिए। 


स्कंद षष्ठी तिथि 2019

 

12 जनवरी (शनिवार) स्कन्द षष्ठी

10 फरवरी (रविवार) स्कन्द षष्ठी

12 मार्च (मंगलवार) स्कन्द षष्ठी

10 अप्रैल (बुधवार) स्कन्द षष्ठी

10 मई (शुक्रवार) स्कन्द षष्ठी

08 जून (शनिवार) स्कन्द षष्ठी

07 जुलाई (रविवार) स्कन्द षष्ठी

05 अगस्त (सोमवार) स्कन्द षष्ठी

04 सितम्बर(बुधवार) स्कन्द षष्ठी

03 अक्टूबर(बृहस्पतिवार) स्कन्द षष्ठी

02 नवम्बर (शनिवार) सूर सम्हारम

02 दिसम्बर(सोमवार) सुब्रहमन्य षष्ठी

31 दिसम्बर(मंगलवार) स्कन्द षष्ठी

 

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