तिथि

तिथि पंचांग का सबसे मुख्य अंग है यह हिंदू चंद्रमास का एक दिन होता है। तिथि के आधार पर ही सभी वार, त्यौहार, महापुरुषों की जयंती, पुण्यतिथि आदि का निर्धारण होता है। एक तिथि तब पूर्ण मानी जाती है जब चंद्रमा सूर्य से 12 डिग्री पर स्थित होता है। तिथियां 16 होती हैं जिनमें अमवास्या व पूर्णिमा मास में एक बार ही आती हैं जबकि अन्य तिथियां दो बार आती हैं। वैदिक ज्योतिष में परिभाषित एक महीने में कुल 30 तिथियां होती हैं। पहले पंद्रह तीथों को शुक्ल पक्ष में, जबकि अगले पंद्रह तीथों को कृष्ण पक्ष में शामिल किया जाता है। 12 डिग्री पर चंद्रमा के झुकाव के साथ, माह के एक तिथि का समापन होता है। एक तिथि में पांच भाग होते हैं जिन्हें नंदा, भद्रा, रिक्ता, जया और पूर्णा कहा जाता है।

आज की तिथि - Aaj ki tithi


पंचांग में तिथि का महत्व
Wednesday, 20 November 2019 |
पूर्णिमांत -शुक्ल द्वादशी 26:43:48 तक, भाद्रपद, विक्रम संवत -2076
अमांत -2

पंचांग में तिथि का महत्व


हिंदू कैलेंडर या पंचांग में तिथियों का अत्यधिक महत्व है क्योंकि यह लोगों को एक नया कार्य करने या उसकी शुरूआत करने के लिए शुभ समय प्रदान करती है। शुभ तिथियों के साथ-साथ अशुभ तिथियां भी होती हैं। तिथि दिन के अलग-अलग समय पर शुरू होती है और लगभग 19 से 26 घंटे की अवधि तक भिन्न हो सकती हैं। तिथियों के नाम इस प्रकार हैं – प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमवास्या और पूर्णिमा।

पंचांग की 30 तिथियों


हिंदू पंचांग की तिथियों को दो भागों में बांटा गया है - शुक्ल और कृष्ण पक्ष। प्रत्येक में कुल 15 तिथि हैं। सामूहिक रूप से कैलेंडर में कुल 30 तिथियां हैं। अमावस्या और पूर्णिमा को छोड़कर सभी तिथियां महीने में दो बार आती हैं। आइए जानते हैं तिथियों के बारे में..
प्रथम / प्रतिपदा
सभी प्रकार के शुभ और धार्मिक अनुष्ठानों के लिए यह सबसे उपयुक्त तिथि है। इस तिथि के अधिपति देवता अग्नि हैं।

द्वितीया / विद्या
स्थायी इमारत और माकान जैसे अन्य चीजों की नींव रखने के लिए यह उत्तम तिथि है। इस तिथि पर ब्रह्मदेव का आधिपत्य है।

तृतीया / तीज
बाल कटाने, नाखून काटने और मुंडन करवाने के लिए यह अच्छी तिथि मानी जाती है। इस पर देवी गौरी का अधिकार है।

चतुर्थी / चौथ
शत्रुओं के विनाश, बाधाओं को दूर करने के लिए यह तिथि उपयुक्त है। इस तिथि के स्वामी यमदेव व भगवान श्री गणेश है।

पंचमी
यह तिथि सर्जरी करवाने और चिकित्सीय सलाह लेने की दृष्टि से श्रेष्ट है। इस तिथि के अधिपति देवता नाग हैं।

षष्ठी
यह तिथि विशेष अवसरों या उत्सवों को मनाने, नए लोगों से मिलने और नये मित्र बनाने के लिए उत्तम है। इस तिथि के स्वामी देव कार्तिकेय हैं।

सप्तमी
यह तिथि यात्रा शुरू करने और खरीदारी करने के लिए सबसे उत्तम है। इस दिन किसी विशेष कार्य के लिए यात्रा कर रहे हैं तो परिणाम अच्छे मिलने के अधिक आसार होते हैं। क्योंकि इस तिथि पर सूर्यदेव का स्वामित्व है।

अष्टमी
यह तिथि जीत दिलाने वाली है। इस दिन भगवान रुद्र की पूजा करना उत्तम माना जाता है। क्योंकि यह दिन शिव का है। कृष्ण पक्ष में पूजन कारना श्रेष्ट है जबकि शुक्ल पक्ष में इस तिथि में शिव पूजन वर्जित है।

नवमी
यह दिन विनाश और हिंसा के कृत्यों की शुरुआत करता है। तिथि समारोह या यात्रा के लिए अशुभ है। इस दिन पर देवी अंबिका का अधिकार है।

दशमी
पुण्य, धार्मिक व आध्यात्मिक कार्यों और अन्य पवित्र कार्यों के लिए यह तिथि शुभ है। इस दिन के स्वामी धर्मराज हैं।

एकादशी
हिंदू धर्म और जैन धर्म में विशेष धार्मिक महत्व के साथ सबसे शुभ दिनों में से एक है, जो आमतौर पर उपवास और भगवान की भक्ति कर मनाया जाता है। क्योंकि इस तिथि पर देवों के देव महादेव का आधिपत्य है।

द्वादशी
धार्मिक अनुष्ठानों के लिए शुभ है। भगवान विष्णु इस तिथि के स्वामी हैं।

त्रयोदशी
मित्रता करने , कामुक सुख की प्राप्ति और उत्सव मनाने के लिए यह तिथि उत्तम है। इस दिन पर कामदेव का स्वामित्व है।

चतुर्दशी
इस दिन पर देवी काली का अधिकार है। यह दिन प्रेत बाधा को दूर करने के लिए तथा सिद्धि प्राप्त करने के लिए उत्तम है।

पूर्णिमा
व्रत और यज्ञ के लिए उपयुक्त तिथि है। इस दिन कथा सुनने व सुनाने से अधिक फल प्राप्त होता है। पूर्णिमा तिथि पर चंद्रमा का स्वामित्व है।

अमावस्या
यह तिथि पितृ- देवों की है। इस दिन पितरों की सेवा व दान करने पर श्रेष्ट फल की प्राप्ति होती है। व्रत के लिए भी यह तिथि विशेष है।

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