पितृ-पक्ष - श्राद्ध 2022



पितृ-पक्ष - श्राद्ध पर्व तिथि व मुहूर्त 2022

Janmashtami 2029
01 September
Nishith Puja – 11:58 Pm To 12:44 Pm
Paran – After 06:00 Am (September 02)
Rohini Ends - Before Sunrise
Ashtami Date Starts From 09:00 (31st August 2029)
Ashtami Date Ends - Till 10:56 Pm (01 September 2029)

Janmashtami 2030
21 August
Nishith Puja – From 12:02 To 12:46 At Night
Paran – After 05:54 (August 22)
Rohini Ends - Before Sunrise
Ashtami Date Starts From 05:31 (August 20, 2030)
Ashtami Date Ends - Till 08:00 (21 August 2030)

Janmashtami 2031
09 August
Nishith Puja – From 12:05 To 12:48 At Night
Parana – After 06:31 (August 10)
Ashtami Date Starts From 05:25 Pm (09 August 2031)
Ashtami Date Ends - Till 06:31 (August 10, 2031)

Janmashtami 2032
August 28
Nishith Puja – Night From 12:00 To 12:45
Paran – After 05:58 Am (August 29)
Rohini Ends - Before Sunrise
Ashtami Date Starts From 01:06 Pm (27 August 2032)
Ashtami Date Ends - Till 01:10 Pm (28 August 2032)

Ganesh Chaturthi 2028
23 August
Midday Ganesh Puja – 11:06 Am To 01:41 Pm
Surviving Time Of Chandra Darshan - 08:55 Am To 08:38 Pm (23 August 2028)
Chaturthi Date Starts From 05:09 Am (23 August 2028)
Chaturthi Date Ends - Till 01:55 (24 August 2028)

Ganesh Chaturthi 2029
September 11
Midday Ganesh Puja – 11:03 Am To 01:32 Pm
Surviving Time Of Chandra Darshan - 09:03 Am To 08:18 (11 September 2029)
Chaturthi Date Starts From 06:08 Am (11 September 2029)
Chaturthi Date Ends - Till 02:57 (September 12, 2029)

पितृ पक्ष 2028

03-09-से 18-09-

पूर्णिमा श्राद्ध – 03-09-2028

सर्वपितृ अमावस्या – 18-09-2028

पितृ पक्ष 2029

22-09-से 07-10-

पूर्णिमा श्राद्ध – 22-09-2029

सर्वपितृ अमावस्या – 07-10-2029

पितृ पक्ष 2030

11-09-से 27-09-

पूर्णिमा श्राद्ध – 11-09-2030

सर्वपितृ अमावस्या – 27-09-2030

पितृ पक्ष 2031

30-09-से 15-10-

पूर्णिमा श्राद्ध – 30-09-2031

सर्वपितृ अमावस्या – 15-10-2031

पितृ पक्ष 2032

19-09-से 04-10-

पूर्णिमा श्राद्ध – 19-09-2032

सर्वपितृ अमावस्या – 04-10-2032

हिंदू धर्म में वैदिक परंपरा के अनुसार अनेक रीति-रिवाज़, व्रत-त्यौहार व परंपराएं मौजूद हैं। हिंदूओं में जातक के गर्भधारण से लेकर मृत्योपरांत तक अनेक प्रकार के संस्कार किये जाते हैं। अंत्येष्टि को अंतिम संस्कार माना जाता है। लेकिन अंत्येष्टि के पश्चात भी कुछ ऐसे कर्म होते हैं जिन्हें मृतक के संबंधी विशेषकर संतान को करना होता है। श्राद्ध कर्म उन्हीं में से एक है। वैसे तो प्रत्येक मास की अमावस्या तिथि को श्राद्ध कर्म किया जा सकता है लेकिन भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक पूरा पखवाड़ा श्राद्ध कर्म करने का विधान है। इसलिये अपने पूर्वज़ों को के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के इस पर्व को श्राद्ध कहते हैं।

 

पितृ पक्ष का महत्व

पौराणिक ग्रंथों में वर्णित किया गया है कि देवपूजा से पहले जातक को अपने पूर्वजों की पूजा करनी चाहिये। पितरों के प्रसन्न होने पर देवता भी प्रसन्न होते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में जीवित रहते हुए घर के बड़े बुजूर्गों का सम्मान और मृत्योपरांत श्राद्ध कर्म किये जाते हैं। इसके पिछे यह मान्यता भी है कि यदि विधिनुसार पितरों का तर्पण न किया जाये तो उन्हें मुक्ति नहीं मिलती और उनकी आत्मा मृत्युलोक में भटकती रहती है। पितृ पक्ष को मनाने का ज्योतिषीय कारण भी है। ज्योतिषशास्त्र में पितृ दोष काफी अहम माना जाता है। जब जातक सफलता के बिल्कुल नज़दीक पंहुचकर भी सफलता से वंचित होता हो, संतान उत्पत्ति में परेशानियां आ रही हों, धन हानि हो रही हों तो ज्योतिषाचार्य पितृदोष से पीड़ित होने की प्रबल संभावनाएं बताते हैं। इसलिये पितृदोष से मुक्ति के लिये भी पितरों की शांति आवश्यक मानी जाती है।

 

किस दिन करें पूर्वज़ों का श्राद्ध

वैसे तो प्रत्येक मास की अमावस्या को पितरों की शांति के लिये पिंड दान या श्राद्ध कर्म किये जा सकते हैं लेकिन पितृ पक्ष में श्राद्ध करने का महत्व अधिक माना जाता है। पितृ पक्ष में किस दिन पूर्वज़ों का श्राद्ध करें इसके लिये शास्त्र सम्मत विचार यह है कि जिस पूर्वज़, पितर या परिवार के मृत सदस्य के परलोक गमन की तिथि याद हो तो पितृपक्ष में पड़ने वाली उक्त तिथि को ही उनका श्राद्ध करना चाहिये। यदि देहावसान की तिथि ज्ञात न हो तो आश्विन अमावस्या को श्राद्ध किया जा सकता है इसे सर्वपितृ अमावस्या भी इसलिये कहा जाता है। समय से पहले यानि जिन परिजनों की किसी दुर्घटना अथवा सुसाइड आदि से अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। पिता के लिये अष्टमी तो माता के लिये नवमी की तिथि श्राद्ध करने के लिये उपयुक्त मानी जाती है।

पर्व को और खास बनाने के लिये गाइडेंस लें इंडिया के बेस्ट एस्ट्रोलॉजर्स से।

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