तृतीया तिथि

हिंदू पंचाग की तीसरी तिथि तृतीया(Tritiya) है, इस तिथि को जया तिथि भी कहा जाता है क्योंकि इस तिथि में किए गए कार्यों में हमेशा विजय प्राप्त होती है। इसे हिंदी में ततिया, तइया, तेजा, तीजा, तीज, त्रीज और त्रीजा कहते हैं। यह तिथि चंद्रमा की तीसरी कला है, इस कला में अमृत का कृष्ण पक्ष में साक्षात परमात्मा पान करते हैं। तृतीया तिथि का निर्माण शुक्ल पक्ष में तब होता है जब सूर्य और चंद्रमा का अंतर 25 डिग्री से 36 डिग्री अंश तक होता है। वहीं कृष्ण पक्ष में तृतीया तिथि का निर्माण सूर्य और चंद्रमा का अंतर 205 से 216 डिग्री अंश तक होता है। तृतीया तिथि की स्वामिनी माता गौरी मानी गई हैं। जीवन में सुख और सौभाग्य की वृद्धि के लिए इस तिथि में जन्मे लोगों को माता गौरी का पूजन अवश्य करना चाहिए। 

तृतीया तिथि का ज्योतिष महत्त्व

यदि किसी भी पक्ष में तृतीया तिथि(Tritiya tithi) मंगलवार को पड़ती है तो सिद्ध योग बनता है। इस योग में शुभ कार्य करना वर्जित है। इसके अलावा किसी माह में यदि तृतीया तिथि दोनों पक्षों में बुधवार के दिन पड़ती है तो मृत्युदा योग बनता है। ऐसे समय शुभ कार्य करने से शुभ फल प्राप्त होता है। हिंदू कैलेंडर के भाद्रपद माह की तृतीया शून्य होती है। वहीं चंद्र के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि में शिववास सभा में और कृष्ण पक्ष की तृतीया को भगवान भोलेनाथ के क्रीडा में होने से, इन दोनों पक्षों की तृतीया में कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।

तृतीया तिथि में जन्मे जातक आलसी प्रवृत्ति के और मेहनत से मुंह चुराने वाले होते हैं, जिसकी वजह से इनको आर्थिक संकट झेलना पड़ता है। ये लोग दूसरों के प्रति द्वेष रखने वाले होते हैं। तृतीया तिथि में जन्म लेने वाले लोगों का चित्त स्थिर नहीं रहता है उनका मन हमेशा भटकता रहता है। यदि इन जातकों को किसी सही व्यक्ति का साथ मिल जाता है तो वे जीवन में सफलता पाने में सक्षम हो सकते हैं। इस तिथि में जन्मे जातक दूसरों पर अत्यधिक निर्भर रहते हैं। इन लोगों को घूमने का शौक नहीं होता है लेकिन ये एक सफल प्रेमी जरूर होते हैं। इनको अपने परिजनों से बहुत लगाव होता है। 

शुभ कार्य
द्वितीया तिथि के समान ही तृतीया तिथि(tritiya tithi) में यात्रा, विवाह, संगीत, विद्या व शिल्प आदि कार्य करना लाभप्रद रहता है। इस तिथि में गोदभराई संस्कार भी शुभ माना जाता है।

तृतीया तिथि के प्रमुख हिन्दू त्यौहार एवं व्रत व उपवास

  • अक्षय तृतीया

हर साल वैसाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि में जब सूर्य और चन्द्रमा अपने उच्च प्रभाव में होते हैं, और जब उनका तेज सर्वोच्च होता है, उस तिथि में अक्षय तृतीया पर्व मनाया जाता है। अक्षय तृतीया में विवाह, गृह-प्रवेश जैसे शुभ कार्य भी बिना पंचांग देखे किये जा सकते हैं| इस दिन पितृ पक्ष में किये गए पिंडदान का उत्तम परिणाम भी मिलता है। अक्षय तृतीया में पूजा-पाठ और हवन इत्यादि भी अत्याधिक सुखद परिणाम देते हैं| 

  • गौणगौर तृतीया

गणगौर की पूजा चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया को की जाती है। इस पर्व में पति को बताये बिना ही विवाहित स्त्रियां उपवास रखती हैं। साथ ही अविवाहित कन्याएं भी मनोवांछित वर पाने के लिये गणगौर पूजा करती हैं। इस दिन भगवान शिव और पार्वती की मूर्तियां स्थापित करके उनके पूजन का प्रावधान है। इसके अलावा इस दिन देवी-देवताओं को झूला भी झुलाया जाता है। 

  • केदारनाथ और बद्रीनाथ यात्रा की शुरुआत

वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन से ही गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बदीनाथ यात्रा की शुरुआत होती है। तृतीया तिथि को ही केदारनाथ और बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं। 

  • रम्भा तृतीया

रंभा तृतीया ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाई जाती है। इस दिन विवाहित स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु और संतान प्राप्ति के लिए व्रत रखती हैं। साथ ही अविवाहित कन्याएं सुयोग्य वर पाने के लिए यह व्रत करती हैं।

  • हरियाली तीज

श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को श्रावणी तीज या हरियाली तीज कहते हैं। इस दिन स्त्रियां माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा करती हैं। इस दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं। 

  • हरतालिका तीज

भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरतालिका तीज कहते हैं। इस दिन माता पार्वती की आराधना करने, व्रत रखने से सुहागिन स्त्रियों को अपने सुहाग की लंबी आयु एवं अविवाहित कन्याओं को मनोवांछित वर प्राप्त होने का वरदान मिलता है।

  • कजरी तीज 

भादो मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया को कजरी तीज मनाई जाती है। इस दिन विवाहिता स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु के लिए उपवास रखती हैं। साथ ही उनके संबंध में प्रेम, सुख -शांति बनी रहे यही कामना करती हैं। इसके साथ ही चंद्रमा को जल अर्पित करती हैं। वहीं मान्यता है कि इस व्रत का पालन श्रद्धा के साथ यदि कोई कन्या करती है तो उसे योग्य वर की प्राप्ति होती है। 

  • वराह जयंती 

भाद्रपद यानि भादो मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को भगवान विष्णु अपने तृतीय अवतार वराह के रूप में अवतरित हुए थे। इसलिये इस तिथि को वराह जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। पौराणिक कथानुसार वराह रूपी भगवान विष्णु ने हरिण्याक्ष का संहार कर भू देवी को उसके चंगुल से मुक्त करवाया था।


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