
Anant chaturdashi 2025: भारत त्योहारों का देश है और यहां हर पर्व को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। गणेश चतुर्थी का पर्व भी इसमें से एक है। इस अवसर पर भगवान गणेश के सभी भक्त उन्हें अपने घर पर आमंत्रित करते हैं। दस दिनों तक चलने वाले इस उत्सव में आपको हर जगह गणपति बप्पा की खूबसूरत मूर्तियां और उनका पसंदीदा भोग यानी लड्डू देखने को मिलते हैं। यह उत्सव धार्मिक आस्था के साथ-साथ परिवार और समाज को एकसाथ लाने से जुड़ा होता है। जगह जगह गणपति पांडाल सजाए जाते हैं, लोग धूमधाम से दस दिनों तक गणपति पूजा करते हैं। इस उत्सव की समाप्ति पर गणेश विसर्जन के साथ होती है। यह गणपति बाप्पा की विदाई का दिन होता है। इसे अनंत चतुर्दशी या अनंत चौदस भी कहा जाता है। तो चलिए जानें साल 2025 में अनंत चतुर्दशी कब है? गणेश विसर्जन मुहूर्त कब है? और इसके पीछे की पौराणिक कथा क्या है?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, अनंत चतुर्दशी का दिन गणेश विसर्जन के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। इस दिन भक्त गणेशजी की प्रतिमा को जल में विसर्जित करते हैं और उन्हें भावपूर्ण विदाई देते हैं। साल 2025 में गणेश विसर्जन का शुभ दिन 6 सितंबर (शनिवार) है।
अनंत चतुर्दशी तिथि 06 सितंबर को सुबह 06:02 से 07 सितंबर को रात 01:41 मिनट तक रहेगी।
आमतौर पर पूजा और आरती के बाद दोपहर से लेकर शाम के समय विसर्जन का विधान किया जाता है। अलग-अलग शहरों में समय थोड़ा भिन्न हो सकता है, लेकिन अनुष्ठान और शोभायात्रा पूर्ण होने के बाद ही बप्पा की प्रतिमा को जल में प्रवाहित किया जाता है।
प्रातः मुहूर्त (शुभ): सुबह 07:36 बजे से 09:10 बजे तक
अपराह्न मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): दोपहर 12:19 बजे से शाम 05:02 बजे तक
सायाह्न मुहूर्त (लाभ): शाम 06:37 बजे से 08:02 बजे तक
रात्रि मुहूर्त (शुभ, अमृत, चर): रात 09:28 बजे से 01:45 बजे तक (07 सितम्बर)
उषाकाल मुहूर्त (लाभ): सुबह 04:36 बजे से 06:02 बजे तक (07 सितम्बर)
गणेश विसर्जन केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा भी है। इस दिन परिवार और समाज मिलकर बप्पा को आदर और प्रेम के साथ विदाई देते हैं। साथ ही इसके लिए एक आसान और प्रभावी पूजा विधि का पालन करते हैं-
विसर्जन से पहले घर या पंडाल में एक अंतिम पूजा की जाती है जिसे उत्तरांग पूजा कहते हैं।
इसमें पांच प्रमुख वस्तुएँ जैसे फूल, दीपक, धूप, सुगंध और नैवेद्य अर्पित की जाती हैं ।
इसके बाद पूरे परिवार के साथ मिलकर गणपति की आरती की जाती है और प्रसाद बांटा जाता है।
विसर्जन के समय घर का मुखिया प्रतिमा को हल्का सा आगे बढ़ाता है, जो इस बात का प्रतीक है कि बप्पा अब विदाई के लिए तैयार हैं।
परंपरा के अनुसार, प्रतिमा के हाथ पर दही रखा जाता है, जिससे यह संकेत मिलता है कि प्रिय मेहमान अगले वर्ष फिर पधारेंगे।
विसर्जन से पहले मूर्ति पर चढ़ी हुई सभी माला, फूल और आभूषण उतार दिए जाते हैं।
इसके बाद भक्तजन “गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या” के नारों के साथ शोभायात्रा निकालते हैं और नृत्य, संगीत व भक्ति गीतों के बीच प्रतिमा को जल में विसर्जित किया जाता है।
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अनंत चतुर्दशी का दिन भगवान विष्णु और भगवान गणेश दोनों के लिए विशेष माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब पांडव जुए में अपना सब कुछ हारकर वनवास में भटक रहे थे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत चतुर्दशी व्रत करने की सलाह दी। इस व्रत में ‘अनंत सूत्र’ बाँधने और भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान है। पांडवों ने श्रद्धा से यह व्रत किया, जिससे उनके जीवन की कठिनाइयाँ धीरे-धीरे दूर होने लगीं और उन्हें सुख-समृद्धि प्राप्त हुई। इसी कारण इसे “अनंत फल देने वाला व्रत” कहा जाता है। गणेश चतुर्थी के दस दिन पूरे होने पर जब गणपति बप्पा को विदाई दी जाती है, उसी दिन अनंत चतुर्दशी भी आती है, इसलिए इस दिन का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व और भी बढ़ जाता है।
गणेश विसर्जन का संदेश अत्यंत गहरा और आध्यात्मिक है। सबसे बड़ा सबक यह है कि जीवन में सब कुछ अस्थायी है। मूर्ति का जल में विलीन होना हमें यह याद दिलाता है कि हर आरंभ का एक अंत होता है और हर अंत से एक नई शुरुआत जन्म लेती है। यह जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र का प्रतीक है।
भगवान गणेश विघ्नहर्ता कहलाते हैं। उनका विसर्जन यह विश्वास जगाता है कि उनके साथ हमारे घरों और जीवन की नकारात्मकता भी दूर होती है, और नए वर्ष के लिए सुख-समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। इस पर्व का एक और पहलू है समुदायिक एकता। विसर्जन के दौरान निकलने वाली शोभायात्राएँ समाज में मेल-जोल और भाईचारे का वातावरण बनाती हैं। छोटे-बड़े, स्त्री-पुरुष, सब मिलकर इस उत्सव को मनाते हैं। यही कारण है कि गणेशोत्सव न केवल धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का भी प्रतीक है।
गणेश चतुर्थी का पर्व आमतौर पर दस दिनों तक चलता है, लेकिन कुछ परिवार परंपरा अनुसार एक, तीन, पांच या सात दिन में भी विसर्जन कर देते हैं। सबसे बड़ा विसर्जन अनंत चतुर्दशी के दिन होता है, जब पूरे शहर की सड़कों पर भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में यह उत्सव बेहद धूमधाम से मनाया जाता है। वहीं, तमिलनाडु और उत्तर भारत में निजी पूजा और छोटे स्तर पर विसर्जन अधिक प्रचलित है।
आजकल पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए पर्यावरण अनुकूल मूर्तियों का चलन बढ़ा है। लोग अब मिट्टी की प्रतिमा और कृत्रिम जलाशयों में विसर्जन को प्राथमिकता देते हैं ताकि नदियों और समुद्रों को प्रदूषण से बचाया जा सके। यह बदलाव इस पर्व की पवित्रता को और भी बढ़ाता है क्योंकि प्रकृति का संरक्षण भी एक तरह से ईश्वर की सेवा ही है।
गणेश विसर्जन 2025 केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि जीवन की जरूरी शिक्षाओं और भारतीय संस्कृति की गहराई को दर्शाता है। यह हमें त्याग, भक्ति, धैर्य और सामूहिकता का संदेश देता है। जल में प्रतिमा का विलय यह समझाता है कि भौतिक वस्तुएं अस्थायी हैं, परंतु भक्ति और संस्कार सदा रहने वाले हैं।
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