Sakat Chauth Vrat Katha: सकट चौथ की व्रत कथा हिंदू धर्म में आस्था, मातृत्व और संतान की रक्षा से जुड़ी एक पावन कथा है। यह व्रत विशेष रूप से माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से करती हैं। सकट चौथ का व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है, जिन्हें विघ्नहर्ता और संतान के रक्षक माना जाता है। इस दिन की कथा व्रत के महत्व, नियमों और इसके पीछे छिपे आध्यात्मिक संदेश को सरल और भावपूर्ण तरीके से समझाती है। कथा सुनने और व्रत करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं।
सकट चौथ की व्रत कथा हिंदू धर्म में आस्था, सेवा और सच्चे भाव की महत्ता को दर्शाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, एक समय की बात है जब एक नगर में दो बहुएं रहती थीं- एक जेठानी और दूसरी देवरानी। जेठानी बहुत संपन्न थी, जबकि देवरानी अत्यंत गरीब थी। देवरानी अपना जीवन बड़ी सादगी से जीती थी। वह जेठानी के घर सेवा करके ही अपना और अपने परिवार का पालन-पोषण करती थी। उसका घर एक छोटी सी झोपड़ी थी, जहां टूटी-फूटी चारपाई और साधारण भोजन ही उसका सहारा था।
एक बार किसी पर्व का अवसर आया। इस दिन जेठानी ने देवरानी को बिना कुछ दिए ही वापस भेज दिया। देवरानी दुखी तो हुई, लेकिन उसने मन में किसी के प्रति दुर्भाव नहीं रखा। वह खेत से थोड़ा-सा बथुआ और कुछ चावल ले आई। उसी से उसने कन के लड्डू बनाए और बथुआ की सादी सब्जी तैयार की।
उसी रात सकट माता वेश बदलकर देवरानी की झोपड़ी के बाहर आईं। उन्होंने द्वार खुलवाया और अंदर आकर कहा कि उन्हें बहुत भूख लगी है। देवरानी ने बिना किसी संकोच के अपने पास उपलब्ध सादा भोजन माता को प्रेमपूर्वक खिला दिया। माता ने देवरानी के घर की दरिद्रता, उसकी सेवा-भावना और सच्चे मन को देखा। परीक्षा लेने के लिए माता ने झोपड़ी को गंदा कर दिया, लेकिन जब वे वहां से बाहर निकलीं तो वह गंदगी सोने में बदल गई। इस तरह देवरानी का जीवन एक ही क्षण में बदल गया और वह समृद्ध हो गई।
जब यह बात जेठानी को पता चली, तो उसने भी वैसा ही करने का प्रयास किया। लेकिन उसके मन में सेवा और श्रद्धा का भाव नहीं था। इसलिए उसके घर में कुछ भी चमत्कार नहीं हुआ। इस कथा से यह संदेश मिलता है कि सकट माता केवल बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि सच्चे मन, सेवा और विश्वास से प्रसन्न होती हैं।
सकट चौथ से जुड़ी एक अन्य प्रसिद्ध कथा संतान प्राप्ति से संबंधित है। एक राज्य में एक राजा था, जिसकी कोई संतान नहीं थी। संतान न होने के कारण राजा और रानी दोनों ही दुखी रहते थे। एक दिन राजा ने किसी के मुख से अपने लिए अपमानजनक शब्द सुन लिए, जिससे वह अत्यंत व्यथित हो गए।
रानी की एक दासी ने स्थिति को संभालने के लिए एक उपाय बताया और रानी ने उसके अनुसार आचरण किया। कुछ समय बाद पूरे महल में यह घोषणा हुई कि रानी गर्भवती हैं। राज्य में खुशियां मनाई जाने लगीं, हालांकि वास्तव में कोई संतान नहीं थी। वर्षों बाद जब राजकुमार के विवाह का समय आया, तब दासी ने सकट माता का ध्यान करते हुए तिल और गुड़ का भोग लगाया।
सकट माता प्रकट हुईं और भोग स्वीकार किया। उसी क्षण माता की कृपा से रानी को एक स्वस्थ पुत्र प्राप्त हुआ। राजा और पूरा राज्य यह देखकर आश्चर्यचकित और आनंदित हो गया। इसके बाद रानी ने आजीवन सकट माता का व्रत किया। तभी से यह मान्यता प्रचलित हुई कि जो स्त्रियां संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए सकट चौथ का व्रत श्रद्धा से करती हैं, उन्हें माता का आशीर्वाद अवश्य प्राप्त होता है।
यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा, सेवा और विश्वास से जीवन में सुख और समृद्धि प्राप्त की जा सकती है।
सकट चौथ व्रत की कथा का पाठ करने से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और संतान से जुड़े भय दूर होते हैं। शास्त्रों में बताया गया है कि इस दिन चंद्र दर्शन के बाद ही व्रत खोला जाता है। यह व्रत विशेष रूप से उन माताओं के लिए फलदायी माना गया है, जो संतान की रक्षा और उज्ज्वल भविष्य की कामना करती हैं।
आज भी अधिकांश परिवारों में सकट चौथ की कथा इन हिंदी पढ़ने और सुनने की परंपरा है, ताकि हर पीढ़ी इस व्रत के महत्व को समझ सके। सरल भाषा में कथा पढ़ने से भावनात्मक जुड़ाव बढ़ता है और व्रत का वास्तविक उद्देश्य स्पष्ट होता है।
इस दिन गणेश जी को तुलसी अर्पित नहीं की जाती।
तिल और गुड़ का विशेष महत्व होता है।
माताएं संतान के नाम का संकल्प लेकर व्रत करती हैं।
चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना व्रत पूर्ण नहीं माना जाता।
सकट चौथ व्रत कथा इन हिंदी, सकट चौथ की काथा, और सकट चौथ की कहानी हमें यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति और मातृत्व का भाव किसी भी संकट को दूर कर सकता है। यह व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार, संतान और विश्वास को जोड़ने का माध्यम है।
जब आप पूरे मन और श्रद्धा से सकट चौथ का व्रत करते हैं और कथा का पाठ करते हैं, तो भगवान गणेश और सकट माता की कृपा आपके और आपके परिवार पर सदैव बनी रहती है।