Shiv Parvati Vivah Katha: भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में शिव-पार्वती विवाह की कथा अत्यंत सम्मानित मानी जाती है। इस विवाह के दौरान एक प्रसंग ऐसा आता है जब पार्वती के पिता, पर्वतराज हिमवान, शिव के कुल और वंश के बारे में जानना चाहते हैं। उन्होंने प्रश्न किया, मगर शिव ने कोई उत्तर नहीं दिया। हिमवान को लगा कि शायद शिव अपने वंश के बारे में जानते ही नहीं। आगे इस कथा में बताया गया है कि वास्तव में क्या हुआ।
भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह अद्भुत वैभव के साथ संपन्न हुआ। पार्वती पक्ष से अनेक राजा-महाराजा, कुलीन लोग और शाही परिवार शामिल हुए। लेकिन शिव की ओर से कोई परिजन मौजूद नहीं था, क्योंकि शिव किसी पारिवारिक वंश से जुड़े ही नहीं हैं। वे तो स्वयंभू माने जाते हैं। आगे की कथा इसी रहस्य को खोलती है।
विवाह से पहले एक असाधारण दृश्य देखने को मिला। यह आयोजन इतना भव्य था कि जैसे पूरे सृष्टि के जीव-जन्तु इस उत्सव में शामिल होना चाहते हों। सभी देवता और ऋषि तो आए ही, साथ ही असुर भी वहां पहुंच गए। आम तौर पर देव और असुर एक ही स्थान पर साथ खड़े होना पसंद नहीं करते थे, मगर यह शिव का विवाह था-इसलिए सभी मतभेद भूलकर एक साथ उपस्थित हुए।
शिव पशुपति हैं-सभी प्राणियों के स्वामी। इसलिए पशु-पक्षी, कीड़े-मकोड़े, हर प्रकार के जीव-जंतु, यहां तक कि भूत-प्रेत और विक्षिप्त प्राणी भी विवाह में सम्मिलित हुए। यह दृश्य स्वयं में अनोखा था।
राजपरंपराओं में विवाह से पहले वधू और वर-दोनों की वंशावली का परिचय दिया जाता है। पार्वती पक्ष की वंशावली बड़े गौरव के साथ प्रस्तुत की गई। पर्वतराज के कुल-वंश, प्रतिष्ठा, पूर्वजों और शौर्य का विस्तार से उल्लेख हुआ।
अब सबकी नजरें शिव की ओर थीं। लोग आशा कर रहे थे कि कोई उठकर शिव की वंशावली का वर्णन करेगा। लेकिन शिव की ओर से कोई नहीं बोला। वहां उनके माता-पिता, रिश्तेदार-कोई भी नहीं था। केवल गण थे-जो मानवीय रूप-रंग से अलग दिखते थे, ठीक से बोल भी नहीं पाते थे, और विचित्र स्वर निकाल रहे थे।
पर्वतराज ने सीधे शिव से पूछा- “कृपया अपने वंश के बारे में कुछ बताएँ।”
शिव शून्यता में खोए हुए मौन बैठे रहे। न दुल्हन की ओर देखा, न विवाह के उत्साह का कोई भाव उनके चेहरे पर था। जैसे उन्हें संसारिक रस्मों से कोई मतलब न हो।
शुभ मुहूर्त बीत रहा था, इसलिए पार्वती पक्ष चिंतित होने लगा। लोग फुसफुसाने लगे-
“यह बोल क्यों नहीं रहा?”
“क्या इसका वंश किसी निम्न कुल का है?”
“कहीं ऐसा तो नहीं कि इसे अपने मूल का ज्ञान ही न हो?”
राजा-महाराजा और पंडितों में असहजता फैल गई।
नारद मुनि यह सब देखकर अपनी वीणा उठाते हैं और केवल एक ही तार को बार-बार खींचते हैं
पर्वतराज नाराज होकर पूछते हैं- “हम उत्तर चाहते हैं, और आप यह अजीब ध्वनि क्यों निकाल रहे हैं?”
नारद मुस्कुराए और बोले- “क्योंकि वर के माता-पिता हैं ही नहीं।”
पर्वतराज चौंक पड़े- “क्या मतलब? कोई अपने माता–पिता को कैसे नहीं जान सकता?”
नारद ने कहा- “न केवल इन्हें माता-पिता का पता नहीं… बल्कि इनके माता-पिता हैं ही नहीं। शिव का न कोई जन्मदाता है, न कोई गोत्र, न वंश। ये किसी भी परंपरा या कुल से संबंध नहीं रखते। ये प्रकृति से परे, समय से परे और जन्म-मरण से परे हैं।”
सभा चकित रह गई।
नारद आगे बोले- “शिव स्वयंभू हैं-स्वयं प्रकट हुए हैं। जब प्रकृति में पहली हलचल हुई, तो सबसे पहले ध्वनि प्रकट हुई। शिव उसी आदितत्व-उस प्रथम ध्वनि के रूप में प्रकट हुए। इसलिए मैं वीणा के तार को खींच रहा हूं। इनके लिए एक ही वंश है-ध्वनि। ये जन्म से नहीं, अस्तित्व से प्रकट हुए हैं।”
सभा समझ गई कि शिव किसी साधारण परिवार से नहीं, बल्कि स्वयं अस्तित्व के स्रोत से जुड़े हैं।
शिव पार्वती विवाह (Shiv Parvati Marriage) की सबसे खास बात है भगवान शिव की अद्भुत और अनोखी बारात।
उनकी बारात में शामिल थे- जिसमें भूत, प्रेत, योगी, सिद्ध, गण, नाग और उनके समस्त गणपति।
जब बारात हिमाचल पहुंची तो देवताओं ने रूप बदलकर बारात को सुंदर और दिव्य बना दिया, ताकि आम लोग डर न जाएँ।