Skip Navigation Links
क्या होता अगर महाभारत में दुर्योधन न करता ये तीन गलतियां


क्या होता अगर महाभारत में दुर्योधन न करता ये तीन गलतियां

महाभारत के बारे में तो आप जानते ही होंगे। आपने इसे पढ़ा नहीं होगा तो देखा जरूर होगा। देखा भी नहीं होगा तो भी लोगों की जुबानी इसकी कहानी व इसके पात्रों से आप जरूर परिचित होंगे। हिंदू धर्म में आस्था रखने वालों व हिंदी साहित्य में रूचि रखने वालों के लिये महाभारत एक बहुत ही खास ग्रंथ है। महर्षि वेदव्यास ने इसके प्रत्येक पात्र को बहुत ही खास तरीके गढ़ा है। महाभारत के तमाम पात्रों में दुर्योधन जो रिश्ते में तो पांडवों का भाई ही है लेकिन इस कहानी का खलनायक भी। दुर्योधन के कृत्यों से उसके चरित्र का जो निर्माण होता है वह उसके प्रति सिर्फ और सिर्फ नफरत पैदा करता है। हम आपको अपने इस लेख में दुर्योधन की गलतियों को बतायेंगें। लेकिन ये गलतियां हम नहीं निकाल रहे हैं बल्कि इन्हें स्वयं दुर्योधन मानते हैं कि उनसे महाभारत के युद्ध में ये गलतियां हुई हैं।

कौनसी गलतियां थी दुर्योधन की

दरअसल जब महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था और दुर्योधन भीम के साथ मलयुद्ध करने के पश्चात मरणासन्न होकर युद्धभूमि में गिरा हुआ था तो वह उस हालत में कुछ कहना चाहता था, कुछ बताना चाहता था। वह अपने हाथ की तीन उंगलियां उठा रहा था। जब भगवान श्री कृष्ण की दृष्टि उन पर पड़ी तो वे दुर्योधन के पास गये और उससे पूछा कि क्या वह कुछ कहना चाह रहा है। तब दुर्योधन बड़ी मुश्किल से बोलता है कि उसे लगता है कि उससे तीन गलतियां इस युद्ध के दौरान हुई हैं उसे लगता है कि यदि वह ये गलतियां नहीं करता तो युद्ध का अंजाम कुछ और ही होता।

फिर श्री कृष्ण पूछते हैं कि वह क्या महसूस करता है ऐसी कौनसी गलतियां है जिन्हें वह नहीं करता तो युद्ध में उसकी विजय होती।

मृत्यु के निकट खड़े दुर्योधन ने अपनी दुविधा बताते हुए श्री कृष्ण से कहा कि हे प्रभु मैंने पहली गलती यह कि कि युद्ध में स्वयं नारायण यानि भगवान श्री कृष्ण को अपनी ओर से लड़ने की बजाय उनकी नारायणी सेना को शामिल किया। यदि स्वयं नारायण कौरवों की ओर से लड़ते तो विजय उनकी होती।

मुझे अपनी दूसरी गलती यह लगती है कि आपकी बातों में आकर मैं माता गांधारी के लाख कहने पर भी उनके सामने निर्वस्त्र खड़ा नहीं हो सका। यदि मैं माता का वचन मान लेता तो आज मृत्यु के निकट नहीं होता।

एक और बात जो मुझे लगती है वह यह है कि यदि मैं शुरुआत से ही युद्धभूमि पर आता तो काफी कुछ समझ सकता था और अपनी रणनीति को बेहतर बना सकता था तब शायद इतनी संख्या में कौरव नहीं मारे जाते और परिणाम हमारे हक में होता।

मृत्यु के समीप पंहुचे दुर्योधन को अपनी जो गलतियां नजर आ रही थी उन्हें सुनकर श्री कृष्ण को दुर्योधन पर तरस आ गया। फिर उन्होंने दुर्योधन से कहा कि दुर्योधन जैसा तुम सोच रहे हो तुम्हारी हार का कारण वैसा नहीं है। तुम्हारी हार सिर्फ और सिर्फ इस वजह से हुई है क्योंकि तुम अधर्म के पक्ष में थे। यदि तुम अधर्मी व्यवहार नहीं करती और अपनी ही कुलवधू का भरी सभा में चीरहरण नहीं करवाते तो युद्ध की नौबत ही नहीं आती। 

संबंधित लेख

कंस वध – कब और कैसे हुआ कंस का अंत   |   दानवीर कर्ण थे पूर्वजन्म के पापी, उन्हीं का मिला दंड   |   अन्य एस्ट्रोलेख पढ़ने के लिये यहां क्लिक करें




एस्ट्रो लेख संग्रह से अन्य लेख पढ़ने के लिये यहां क्लिक करें

माँ चंद्रघंटा - नवरात्र का तीसरा दिन माँ दुर्गा के चंद्रघंटा स्वरूप की पूजा विधि

माँ चंद्रघंटा - नव...

माँ दुर्गाजी की तीसरी शक्ति का नामचंद्रघंटाहै। नवरात्रि उपासनामें तीसरे दिन की पूजा का अत्यधिक महत्व है और इस दिन इन्हीं के विग्रह कापूजन-आरा...

और पढ़ें...
माँ कूष्माण्डा - नवरात्र का चौथा दिन माँ दुर्गा के कूष्माण्डा स्वरूप की पूजा विधि

माँ कूष्माण्डा - न...

नवरात्र-पूजन के चौथे दिन कूष्माण्डा देवी के स्वरूप की ही उपासना की जाती है। जब सृष्टि की रचना नहीं हुई थी उस समय अंधकार का साम्राज्य था, तब द...

और पढ़ें...
दुर्गा पूजा 2017 – जानिये क्या है दुर्गा पूजा का महत्व

दुर्गा पूजा 2017 –...

हिंदू धर्म में अनेक देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। अलग अलग क्षेत्रों में अलग-अलग देवी देवताओं की पूजा की जाती है उत्सव मनाये जाते हैं। उत्त...

और पढ़ें...
जानें नवरात्र कलश स्थापना पूजा विधि व मुहूर्त

जानें नवरात्र कलश ...

 प्रत्येक वर्ष में दो बार नवरात्रे आते है। पहले नवरात्रे चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरु होकर चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि ...

और पढ़ें...
नवरात्र में कैसे करें नवग्रहों की शांति?

नवरात्र में कैसे क...

आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से मां दुर्गा की आराधना का पर्व आरंभ हो जाता है। इस दिन कलश स्थापना कर नवरात्रि पूजा शुरु होती है। वैसे ...

और पढ़ें...