कुम्भ मेला 2019 - जानें कुम्भ की कहानी

कुम्भ मेला 2019 - जानें कुम्भ की कहानी


कुंभ मेला भारत में लगने वाला एक ऐसा मेला है जिसका आध्यात्मिक व ज्योतिषीय महत्व तो है ही इसके साथ-साथ यह सामाजिक-सांस्कृतिक और वर्तमान में आर्थिक-राजनैतिक रूप से भी महत्वपूर्ण होने लगा है। जितना जन समुदाय कुंभ मेले में शामिल होता है दुनिया के किसी भी मेले, उत्सव, पर्व त्यौहार में इतने लोग दिखाई नहीं देते हैं। एक पूरा का पूरा शहर इस मेले के आयोजन के लिये अस्थाई तौर पर नदियों के तट पर बसाया जाता है। कुम्भ का मेला वैसे तो दुनिया भर के लोगों के लिये आकर्षण का केंद्र होता है लेकिन हिंदू धर्म के मानने वालों के लिये यह बहुत खास होता है। आइए जानते हैं क्या है इस कुम्भ मेले की कहानी।


कहां लगता है कुम्भ का मेला

भारत में कुम्भ मेला कहां पर व क्यों लगता है इसके बारे में पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलते हैं। विशेषकर भागवत पुराण, महाभारत व विष्णुपुराण में समुद्र मंथन का जिक्र किया गया है। समुद्र मंथन के 14 रत्न प्राप्त हुए। जिसके लिये यह समुद्र मंथन किया गया था वह था अमृत कलश। इसे सुधा कुम्भ भी कहा जाता है। अब अमृत के निकलते ही देवताओं व दैत्यों में अमृतपान को लेकर युद्ध छिड़ गया। यह युद्ध पूरे 12 दिन तक चला। हर दिन युद्ध अलग जगह पर होता था। कहते हैं जहां-जहां युद्ध हुआ हर उस जगह पर अमृत छलका। युद्ध स्थलों में चार स्थान ऐसे हैं जो मृतलोक यानि पृथ्वी पर हुए यह स्थान थे हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन और नासिक। बाकि के आठ स्थल स्वर्गआदि लोकों में माने जाते हैं। इसलिये कुंभ मेले का आयोजन भी इन्हीं चार स्थानों में होता है।

कुम्भ मेला प्रयागराज – प्रयागराज में कुंभ मेले का आयोजन गंगा-यमुना व अदृश्य सरस्वती के संगम स्थल पर लगता है। देव गुरु ग्रह जब मेष राशि में हों सूर्य व चंद्रमा मकर राशि में हों या फिर गुरु वृषभ राशि में या सूर्य मकर राशि में हों तो प्रयागराज में कुंभ मेले का आयोजन होता है यह वार्षिक रूप से आयोजित होने वाला मेला है इसे मिनी कुंभ भी कहा जाता है। प्रत्येक वर्ष माघ माह में इस मेले का आयोजन होता है जो कि ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार लगभग जनवरी-फरवरी माह में होता है।

कुम्भ मेला हरिद्वार – हरिद्वार मे भी गंगा तट पर कुंभ मेले का आयोजन होता है। हरिद्वार में कुंभ मेला गुरु के कुंभ राशि में होने पर या फिर सूर्य के मेष राशि में होने पर भी कुंभ का मेला लगता है। यह चैत्र माह में आयोजित होता है जो कि अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार मार्च-अप्रैल माह में पड़ता है।

कुम्भ मेला नासिक-त्र्यंबकेश्वर (सिंहस्थ) – नासिक में लगने वाले कुंभ मेले को सिंहस्थ कहा जाता है यह गोदावरी नदी के तट पर लगता है। जब गुरु ग्रह सिंह राशि में हों या फिर सूर्य, गुरु व चंद्रमा कर्क राशि में हों तो सिंहस्थ मेला लगता है। अमावस्या के दिन भी यहां पर कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है। यह मेला भाद्रपद माह में लगता है जो कि अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार अगस्त-सितंबर माह में पड़ता है।

कुम्भ मेला उज्जैन (सिंहस्थ) – उज्जैन में मेले का आयोजन सिंह राशि में गुरु, मेष राशि में सूर्य या फिर कार्तिक अमावस्या को जब गुरु चंद्रमा व सूर्य तुला राशि में हों तो सिंहस्थ का आयोजन बड़े स्तर पर किया जाता है। शिप्रा नदी के तट पर आयोजित होने वाले इस मेले का आयोजन वैशाख मास में किया जाता है जो कि अप्रैल-मई माह में पड़ता है।


कब लगता है कुंभ मेला

जैसा कि अब तक हम जान चुके हैं कि कुंभ मेले का आयोजन हरिद्वार, प्रयागराज, उज्जैन व नासिक में होता है। यह आयोजन प्रत्येक 12 साल में होता है। इसका कारण यह है कि देवताओं का एक दिन मृतलोक के एक वर्ष के बराबर माना जाता है। यही कारण है कि 12 साल में कुंभ मेले का आयोजन होता है। कुंभ मेले के कई प्रकार हैं-

महाकुम्भ – महाकुम्भ मेले का आयोजन प्रत्येक 144 साल बाद किया जाता है। वर्ष 2013 में इस महाकुंभ का आयोजन प्रयागराज में हुआ था। प्रयागराज में अगला महाकुम्भ मेला 2157 में लगेगा।

कुम्भ – कुम्भ मेला प्रत्येक 12 साल में आयोजित होता है। नासिक में कुंभ का मेला 2015 में लगा था तो 2016 में उज्जैन में। हरिद्वार में कुंभ मेले का आयोजन 2022 में होना है तो वहीं प्रयाग में कुंभ का मेला 2025 में लगने वाला है।

अर्धकुम्भ – 6 साल के बाद लगने वाले मेले को अर्धकुम्भ कहा जाता है। हरिद्वार व नासिक में लगने वाले मेलों में 3 साल का अंतराल होता है। 2016 में अर्धकुंभ का आयोजन हरिद्वार में किया गया था। 2019 में प्रयागराज में अर्धकुम्भ का मेला लगने वाला है।

कुम्भ मेला 2019

2019 में प्रयागराज में अर्धकुम्भ मेले का आयोजन किया जा रहा है। यह मेला 15 जनवरी 2019 से आरंभ हो रहा है जो कि 4 मार्च तक चलने वाला है।

2019 कुम्भ स्नान की प्रमुख तिथियां

कुम्भ स्नान वैसे तो 15 जनवरी से आरंभ हो रहा है जो कि 4 मार्च तक चलेगा। कुम्भ के दौरान पारौणिक ग्रंथों में 51 दिन के कल्पवास का विधान है। जिसमें कुम्भ स्नान आरंभ होने के पश्चात कुम्भ के अंतिम दिन तक स्नान करने का महत्व माना जाता है। लेकिन इसमें भी कुछ प्रमुख तिथियां विशेष रूप से पुण्य फलदायी मानी जाती हैं। जो कि इस प्रकार हैं:-

मकर संक्रांति – कुंभ मेले का आरंभ इसी दिन से हो रहा है। चूंकि इस दिन सूर्य धनु राशि से गोचर कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं जिसे मकर संक्रांति कहते हैं। इससे पहले सूर्य का गोचर दक्षिणायन माना जाता है। दक्षिणायन से उत्तरायण में सूर्य का आना बहुत ही शुभ माना जाता है इसलिये यह तिथि स्नान दान तपादि के लिये बहुत ही शुभ मानी जाती है। मकर संक्रांति का पर्व 15 जनवरी को है। मकर संक्रांति पर कुम्भ में स्नान करना बहुत ही सौभाग्यशाली है।

पौष पूर्णिमा – पौष माह की पूर्णिमा भी स्नान दान के लिये बहुत शुभ मानी जाती है। कुम्भ मेले की औपचारिक शुरुआत इस तिथि से होती है साथ ही कल्पवास भी इसी तिथि से शुरु होता है। यह तिथि 21 जनवरी को है।

मौनी अमावस्या – मौनी अमावस्या का दिन बहुत ही शुभ होता है। इस दिन कुम्भ में स्नान के लिये श्रद्धालुओं का विशाल जनसमूह उमड़ता है। यह तिथि 4 फरवरी के पड़ रही है।

बसंत पंचमी – बसंत पंचमी विद्या व वाणी की देवी मां सरस्वती की पूजा का दिन माना जाता है। कल्पवास करने वाले श्रद्धालुओं के लिये भी यह बहुत ही पुण्य तिथि होती है। इस दिन स्नान के पश्चात श्रद्धालु पीतांबर धारण करते हैं। यह तिथि 10 फरवरी को पड़ रही है।

माघी पूर्णिमा – 19 फरवरी को माघी पूर्णिमा का स्नान किया जाता है। इस देव गुरु बृहस्पति की पूजा की जाती है। कुम्भ स्नान का महत्व इस दिन इसलिये बढ़ जाता है क्योंकि यह मान्यता है कि इस दिन पवित्र नदियों में स्नान के लिये स्वर्गलोक से स्वयं देवता उतर कर आते हैं।

महाशिवरात्रि – 4 मार्च को भगवान शिवशंकर की आराधना का महापर्व महाशिवरात्रि है। महाशिवरात्रि कुम्भ मेले का भी अंतिम दिन है। इसलिये इस दिन भी स्नान का विशेष महत्व रहेगा।

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