कुंडली में संतान योग

जिस तरह विवाह के बिना किसी भी व्यक्ति का जीवन अधूरा माना जाता है उसी प्रकार संतान के बिना भी परिवार को अधूरा ही माना जाता है। बच्चों की किलकारियों से घर के आंगन में जीवन जीवंत हो उठता है। अक्सर देखा जाता है कि विवाह के तुरंत बाद नव दंपति संतान के लिये योजना बनाने लगते हैं। साल भर बाद कुछ के आंगन में नया मेहमान दस्तक दे देता है। अगर विवाह के बाद दंपति चाहे सोच समझकर ही बच्चा पैदा करने में देरी कर रहे हों लेकिन परिजन, मित्रगण, रिश्तेदार हर तरफ से आप पर संतानोत्पत्ति के लिये दबाव बनाया जाता है। बहुत बार ऐसा भी होता है कि आपके लाख चाहने पर भी संतान का योग नहीं मिल रहा होता और बहुत बार आपके न चाहने पर भी आपको यह खुशखबरी मिल जाती है। क्या आप जानते हैं कि आपके साथ ऐसा क्यों है। ऐस्ट्रोयोगी ज्योतिषाचार्यों के पास आपके इस सवाल का जवाब है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार जातक की जन्मकुंडली में ग्रहों की दशा से यह पूर्वानुमान लगाया जा सकता है कि जातक की कुंडली में संतान का योग है कि नहीं। तो आइये जानते हैं ऐसे कौनसे योग हैं आपकी कुंडली में जो बताते हैं कि आपको जीवन में संतान का सुख प्राप्त होगा या नहीं।

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ग्रहों की कौनसी दशाएं बनाती हैं प्रबल संतान योग

एस्ट्रोयोगी ज्योतिषाचार्यों के अनुसार जब पंचम पर शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो तो संतान योग बनने की संभावनाएं प्रबल होती हैं। जब जातक की कुंडली में शुक्र अच्छा होता है तो वह गर्भ में शिशु कन्सीव होने के लिये एक शुभ योग बनाता है। अब गर्भ में शिशु स्वस्थ रहे और स्वस्थ ही वह जन्म ले इसके लिये बृहस्पति का शुभ होना मंगलकारी माना जाता है। लग्नेश एवं पंचमेश का संबंध भी संतानोत्पत्ति के लिये अच्छा योग बनाता है। बृहस्पति का लग्न में या भाग्य में या एकादश में बैठना और महादशा में चलना भी संतान उत्पति का प्रबल योग बनाता है। जब शुक्र पंचम को देख रहा हो या वह पंचमेश में हो तो इन परिस्थितियों में संतान पैदा होने की तमाम संभावनाएं जन्म लेती हैं। इस प्रकार यदि कोई जातक संतान को लेकर चिंतित है तो उसे स्वास्थ्य जांच के साथ-साथ अपनी कुंडली का अध्ययन विद्वान ज्योतिषाचार्यों से अवश्य करवाना चाहिये और जानना चाहिये कि कहीं ग्रहों की दशा प्रतिकूल तो नहीं। कहीं संतान उत्पति में देरी का कारण ग्रहों की यह प्रतिकूल दशा तो नहीं।


ग्रहों की कौनसी दशा से होता है संतान उत्पति में विघ्न

ग्रहों के शुभ योग से संतान उत्पति की संभावनाएं तो पैदा होती हैं लेकिन यदि ग्रहों के इस शुभ योग पर पाप ग्रहों की दृष्टि पड़ रही हो तो ऐसी परिस्थितियों में संतान उत्पति में में विलंब हो सकता है। उदाहरण के तौर पर यदि पंचम स्थान पर राहू की दृष्टि पड़ रही हो तो ऐसे में संतान को हानि पहुंच सकती है। यहां तक बच्चे के लिये प्राणघातक योग भी बन जाता है अन्यथा बाधा तो पहुंचती ही है। संतान उत्पति का कारक घर पंचम है यदि इस पर पाप ग्रहों की दृष्टि पड़ती है तो इससे नकारात्मक योग बनता है। इससे संतान होने में बाधा होती है। कभी कभी संतान मृत पैदा होती है या फिर पैदा होने के कुछ समय बाद उसकी मौत हो जाती है तो उसका कारण भी ज्योतिषशास्त्र के अनुसार यही पाप ग्रह होते हैं।

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