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महावीर जयंती - जियो और जीने दो का संदेश देते हैं भगवान महावीर



महावीर जयंती - जियो और जीने दो का संदेश देते हैं भगवान महावीर

अहिंसा परमो धर्म: अर्थात अहिंसा सब धर्म में सर्वोपरि है। सत्य और अहिंसा की जब भी बात होती है तो हमारे जहन में सबसे पहले महात्मा गांधी का नाम आता है लेकिन महात्मा गांधी से पहले एक ऐसी महान आत्मा ने भी इस जगत का अपने संदेशों के जरिये मार्गदर्शन किया था। जिन्होंनें सबसे पहले अहिंसा का मार्ग अपनाने के लिये लोगों को प्रेरित किया। जिन्होंनें लोगों को जियो और जीने दो का मूल मंत्र दिया। ये महान आत्म कोई और नहीं बल्कि जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर जिन्हें जैन धर्मावलंबी भगवान का दर्जा देते हैं भगवान महावीर थे। भगवान महावीर जयंती के उपलक्ष्य में आइये जानते हैं उनके जीवन से जुड़े कुछ पहलुओं के बारे में।


भगवान महावीर कब हुआ जन्म


हर साल देश दुनिया में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को भगवान महावीर के जन्मदिवस के रुप में मनाया जाता है। भगवान महावीर सत्य अहिंसा और त्याग की जीती जागती मूर्त थे। देखा जाये तो उनका पूरा जीवन मानवता की रक्षा हेतु अनुकरणीय लगता है। 599 ईसवीं पूर्व बिहार में लिच्छिवी वंश के महाराज सिद्धार्थ के घर इस महापुरुष ने चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को जन्म लिया इसी कारण इस दिन को महावीर जयंती के रुप में दुनिया भर में मनाया जाता है। इनकी माता का नाम त्रिशिला देवी था। उनके बचपन का नाम महावीर नहीं बल्कि वर्धमान रखा गया था। माना जाता है कि जब महाराज सिद्धार्थ ने ज्योतिषाचार्यों को उनकी कुंडली दिखाई तो उसके अनुसार चक्रवर्ती राजा बनने की घोषणा की गई थी। इसके लक्षण जन्म से उनके तत्कालीन राज्य कुंडलपुर का वैभव दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती गई। वे राज परिवार में पैदा हुए थे तो समझा जा सकता है कि धन-दौलत और ऐशो आराम के सारे साधन उन्हें सुलभ थे लेकिन उन्होंनें त्याग का रास्ता चुना और जगत में मानवता का संदेश दिया। युवा वस्था में पहुंचते ही उन्होंनें ठाठ-बाट का अपना राजशी जीवन त्याग कर अपने जीवन का यथार्थ खोजने और दुनिया को मानवता का संदेश देने नंगे पैर निकल पड़े।


वर्धमान से कैसे बने महावीर


जैन धर्म के अनुयायी मानते हैं कि वर्धमान ने कठोर तप कर अपनी इंद्रियों को जीत लिया जिससे उन्हें जिन कहा गया, विजेता कहा गया। उनका यह तप किसी पराक्रम से कम नहीं माना जाता इसी कारण उन्हें महावीर कहा गया और उनके मार्ग पर चलने वाले जैन कहलाये। जैन का तात्पर्य ही है जिन के अनुयायी। जैन धर्म का अर्थ है जिन द्वारा परिवर्तित धर्म।


भगवान महावीर से जुड़े चमत्कार


भगवान महावीर 24वें तीर्थंकर हैं और वर्धमान के रुप में जन्म लेने के उनके ऐतिहासिक तथ्य भी मौजूद हैं। यह भी सही है कि उन्होंनें त्याग का मार्ग चुना और सुख-सुविधाओं का जीवन त्याग दिया। लेकिन उनके जीवन के साथ कुछ अलौकिक घटनायें भी जोड़ी जाती हैं।

एक मान्यता के अनुसार कहा जाता है कि जब वे बालक थे तो सुमेरु पर्वत पर इंद्र देवता उनका जलाभिषेक कर रहे थे। लेकिन वे घबरा गये कि कहीं बालक बह न जाये इसलिये उन्होंनें जलाभिषेक रुकवा दिया। कहा जाता है कि भगवान महावीर ने इंद्र के मन के भय को भांप लिया और अंगूठे से पर्वत को दबाया तो पर्वत कांपने लगा। यह सब देखकर देवराज इंद्र ने जलाभिषेक तो किया ही साथी उन्हें वीर के नाम से भी संबोधित किया।

बाल्यकाल के ही एक और चमत्कार को बताया जाता है कि एक बार वे महल के आंगन में खेल रहे थे तो संजय और विजय नामक मुनि सत्य और असत्य का भेद नहीं समझ पा रहे थे। इसी रहस्य को जानने के लिये दोनों आसमान में उड़ते हुए जा रहे थे कि उनकी नजर दिव्यशक्तियों से युक्त महल के आंगन में खेल रहे बालक पर पड़ी। उन्होंने जैसे ही बालक के दर्शन किये उनकी तमाम शंकाओं का समाधान हुआ। दोनों मुनियों ने उन्हें सन्मति नाम से पुकारा।

एक और वाक्या अक्सर उनके पराक्रम की गाथा कहता है। बात है उनकी किशोरावस्था कि बताया जाता है कि एक बार वे अपने कुछ साथियों के साथ खेल रहे थे एक बड़ा ही भयानक फनधारी सांप वहां दिखाई दिया, उस मौत को अपने सर पर खड़ा देखकर सभी भय से कांपने लगे, जिन्हें मौका मिला वे भाग खड़े हुए लेकिन वर्धमान महावीर अपनी जगह से एक इंच नहीं हिले, न ही उनके मन में किसी तरह को कोई भय था। जैसे ही सांप उनकी तरफ बढा तो वे तुरंत उछल कर सांप के फन पर जा बैठे। उनके भार से सांप को अपनी जान के लाले पड़ गये तभी एक चमत्कार हुआ और सांप ने सुंदर देव का रुप धारण कर लिया और माफी मांगते हुए कहा कि प्रभु मैं आपके पराक्रम को सुनकर ही आपकी परीक्षा लेने पंहुचा था मुझे माफ करें। आप वीर नहीं बल्कि वीरों के वीर अतिवीर हैं।

इन्हीं कारणों से माना जाता है कि वर्धमान महावीर के वीर, सन्मति, अतिवीर आदि नाम भी लिये जाते हैं।


भगवान महावीर के संदेश


वैसे तो उनका पूरा जीवन ही एक संदेश है, अनुकरणीय है लेकिन उन्होंनें जो मूल मंत्र दिया वह अंहिसा परमो धर्म का है, जियो और जीने दो का है। उन्होंने कहा कि हमें किसी भी रुप में किसी भी स्थिति में कभी भी हिंसा का मार्ग नहीं अपनाना चाहिये। जब वे अहिंसा की बात करते हैं तो यह सिर्फ मनुष्यों तक सीमित नहीं बल्कि समस्त प्राणियों के बारे में हैं। जब अहिंसा की बात करते हैं तो यह सिर्फ शारीरिक हिंसा नहीं वरण मन, वचन और कर्म किसी भी रुप में की जाने वाली हिंसा की मनाही है। इसी प्रकार उन्होंनें सत्य का पालन करने की भी कही। उन्होंने कहा कि मनुष्य को मन वचन और कर्म से शुद्ध होना चाहिये। ब्रह्मचर्य का पालन करने का भी उन्होंनें संदेश दिया। साथ ही उन्होंनें अपने जीवन काल में भ्रमण करने पर भी जोर दिया उनका मानना था कि इससे ज्ञानार्जन होता है और भ्रमण ज्ञानार्जन का एक बेहतरीन जरिया है। अपने मन, वचन अथवा कर्म किसी भी रुप में चोरी करने को भी उन्होंनें महापाप करार दिया है।

कैसे मनाते हैं महावीर जयंती


वैसे तो जैन धर्म के अनुयायी उनके संदेश को हर समय प्रसारित करते ही रहते हैं, अपने जीवन में उनकी अनुपालना भी करते हैं लेकिन उनकी जयंती के दिन प्रात: काल से ही अनुयायियों में उत्सव नजर आने लगता है। जगह-जगह पर प्रभात फेरियां निकाली जाती हैं। बड़े पैमाने पर जुलूसों के साथ पालकियां निकाली जाती हैं जिसके बाद स्वर्ण और रजत कलशों से महावीर स्वामी का अभिषेक किया जाता है। मंदिर की चोटियों पर ध्वजा चढ़ाई जाती हैं। दिन भर जैन धर्म के धार्मिक स्थलों पर धार्मिक कार्यक्रमों की धूम रहती है। इस दिन भगवान महावीर की मूर्ति को विशेष स्नान भी करवाया जाता है।


कुल मिलाकर भगवान महावीर के संदेश सिर्फ जैन धर्म के अनुयायियों ही नहीं बल्कि प्रत्येक मनुष्य में सदाचार और नैतिकता का संचार करने का सामर्थ्य रखते हैं बशर्तें हममें उनके दिखाए मार्ग पर चलने की क्षमता हो। आप सभी को ऐस्ट्रोयोगी की और से भगवान महावीर की जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं ‘’जियो और जीने दो’’




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