नाम के अनुसार जानिए अपना राशि नक्षत्र

10 अप्रैल 2020

कई बार लोग बोलते हैं कि इनके सितारे गर्दिश में हैं या इनके ग्रह-नक्षत्र अच्छे नहीं चल रहे हैं....यानि कि जातक के जीवन में इस वक्त समस्याएं चल रही हैं। और ज्योतिषशास्त्र में इन समस्याओं का जिम्मेदार ग्रह और नक्षत्रों को माना जाता है। जब कभी हम आकाश में तारों को देखते हैं तो क्या महसूस करते हैं? क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे जीवन में होने वाली अप्रत्याशित घटनाएं या भविष्य में होने वाली घटनाओं के पीछे इन्हीं सितारों और ग्रहों का हाथ होता है? जी हां, वैदिक ज्योतिष के अनुसार, तारे और ग्रहों की चाल का असर जातक की जीवनशैली, व्यवहार और व्यक्तित्व पर जरूर पड़ता है। वहीं आकाश मंडल में स्थित कुछ खास तारों के समूह को नक्षत्र(rashi nakshatra) कहा जाता है। एक नक्षत्र 13.20 अंश का होता है। 

 

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नक्षत्रों का ज्योतिष महत्व 

हिंदू ज्योतिष के अनुसार, सितारों को नक्षत्र( rashi nakshatra) कहा जाता है। नक्षत्र शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के नक्ष यानि आकाश और क्षत्र यानि क्षेत्र से हुई है। ज्योतिषशास्त्र में 12 राशियां होती हैं और 27 नक्षत्र हैं। हर राशि में 2 या 3 नक्षत्र आते हैं। कहा जाता है कि इन 27 नक्षत्रों के नाम दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं के नाम पर आधारित हैं और दक्ष ने अपनी 27 बेटियों का विवाह चंद्रदेव से कर दिया था। इसलिए ज्योतिषशास्त्र के मुताबिक चंद्रमा इन 27 नक्षत्रों में गोचर करता रहता है, तब कहीं 27.3 दिन में धरती की परिक्रमा पूरी कर पाता है। वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा की स्थिति के अनुसार ही बच्चे का नामक्षर और उसकी राशि तय की जाती है। इसके अलावा प्रत्येक नक्षत्र का एक स्वामी होता है जिसका जातक के जीवन में गहरा प्रभाव पड़ता है। 

 

नक्षत्रों को प्रमुख तौर पर देवगण, नरगण और राक्षसगण में विभाजित किया गया है। वहीं हिंदू धर्म में शादी या किसी शुभ तिथि को तय करने के लिए नक्षत्र की गणना की जाती है। ये नक्षत्र जातक के शारीरिक अंगों को परिभाषित करने के साथ-साथ बीमारियों को बताने के लिए जाने जाते हैं। ज्योतिष के अनुसार 27 नक्षत्र होते हैं। परंतु इन 27 नक्षत्रों को भी तीन भागों में विभाजित कर दिया गया है। शुभ नक्षत्र, मध्यम नक्षत्र और अशुभ नक्षत्र। 

 

शुभ, मध्यम और अशुभ नक्षत्र

शुभ नक्षत्र वे नक्षत्र होते हैं जिनमें किए गए समस्य कार्यों सिद्ध और सफल होते हैं।  इनमें 15 नक्षत्र आते हैं - रोहिणी, अश्विन, मृगशिरा, पुष्य, हस्त, चित्रा, रेवती, श्रवण, स्वाति, अनुराधा, उत्तराभाद्रपद, उत्तराषाढा, उत्तरा फाल्गुनी, घनिष्ठा, पुनर्वसु। वहीं मध्यम नक्षत्र में वे नक्षत्र आते हैं जिनमें किए गए कार्य मध्यम फलदायी और सिद्धकारी होते हैं। इसमें हानि नहीं होती है लेकिन मध्यम फल ही प्राप्त होता है। जैसे -पूर्वा फाल्गुनी, पूर्वाषाढ़ा, पूर्वाभाद्रपद, विशाखा, ज्येष्ठा, आर्द्रा, मूला और शतभिषा। अंतिम में अशुभ नक्षत्र वे होते हैं, जिसमें किए गए कार्यों का फल अशुभ और बुरा मिलता है। साथ ही कार्य के दौरान बाधाएं जरूर आती हैं। वे नक्षत्र होते हैं - भरणी, कृतिका, मघा और आश्लेषा।

 

पंचक

अक्सर आपने पंचक और गंडमूल नक्षत्रों के बारे में कई बार सुना होगा। दरअसल इन नक्षत्रों में कोई भी शुभ काम की शुरुआत नहीं की जाती है और अगर इस नक्षत्र में कोई जातक जन्म लेता है तो जन्म के 27 दिन बाद मूलशांति की पूजा की जाती है। पंचक नक्षत्र तब होता है जब चंद्रमा कुंभ और मीन राशि में गोचर करता है। उस वक्त घनिष्टा से रेवती के बीच में जितने नक्षत्र होते हैं उन्हें पंचक कहा जाता है। मान्यता है कि पंचक के दौरान जोखिम भरा कार्य करना वर्जित है और दक्षिण दिशा की तरफ यात्रा करना अशुभ माना जाता है। इस नक्षत्र के दौरान घर की छत यानि लेंटर नहीं डलवाना चाहिए। 

 

गंडमूल नक्षत्र

वैदिक ज्योतिष के अनुसार, इस नक्षत्र को सबसे अशुभ माना जाता है। अश्विनी,आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती को गंडमूल नक्षत्र कहा गया है। इस नक्षत्र में पैदा होने वाले जातक को जीवनभर कष्टों और संघर्षों का सामना करना पड़ता है। यदि इन 6 नक्षत्रों में किसी में भी बच्चा जन्म लेता है तो 27 दिन के पश्चात घर पर मूलशांति का पाठ करवाना पड़ता है और 27 दिन तक पिता बच्चे का मुख भी नहीं देखते हैं। 

 

आइए जानते हैं नक्षत्र उनके चरणों के अक्षर और राशि के बारे में - 

  1. मेष - अश्विनि (चू, चे, चो, ला), भरणी(ला, ली, लू, ले, लो),  कृतिका( आ,ई, ऊ, ए)
  2. वृष - कृतिका( आ,ई, ऊ, ए), रोहिणी(ओ, वा, वी, वू), मृगशिरा(वे, वो,का, की)
  3. मिथुन - मृगशिरा(वे, वो,का, की), आर्द्रा( कू, घ, ङ, छ), पुनर्वसु(के, को, हा, ही) 
  4. कर्क - पुनर्वसु(के, को, हा, ही), पुष्य(हू, हे, हो, डा), अश्लेषा(डी, डू, डे, डो) 
  5. सिंह - मघा(मा, मी, मू, मे), पूर्वाफाल्गुनी(मो, टा, टी, टू), उत्तराफाल्गुनी(टे,टो,पा,पी)
  6. कन्या - उत्तराफाल्गुनी(टे,टो,पा,पी), हस्त(पू, ष, ण, ठ), चित्रा(पे,पो, रा,री) 
  7. तुला - चित्रा(पे,पो, रा,री), स्वाती(रू, रे, रो, ता), विशाखा(ती, तू, ते, तो) 
  8. वृश्चिक - विशाखा(ती, तू, ते, तो), अनुराधा( ना, नी, नू, ने), ज्येष्ठा(नो, या, यी, यू) 
  9. धनु - मूल(ये, यो, भा, भी), पूर्वाषाढ़ा(भू, धा, फा, ढा), उत्तराषाढ़ा(भे,भो, जा, जी) 
  10. मकर - उत्तराषाढ़ा(भे,भो, जा, जी), श्रवण(खी, खू, खे, खो), धनिष्ठा(गा, गी, गू, गे) 
  11. कुंभ - धनिष्ठा(गा, गी, गू, गे), शतभिषा(गो, सा, सी, सू), पूर्वाभाद्रपद(से, सो, दा, दी) 
  12. मीन - पूर्वाभाद्रपद(से, सो, दा, दी), उत्तराभाद्रपद(दू, थ, झ, ण), रेवती(दे, दो, चा, ची)

 

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