Skip Navigation Links
संत रविदास जयंती 2018 – माघ पूर्णिमा को हुआ था गुरु रविदास का जन्म


संत रविदास जयंती 2018 – माघ पूर्णिमा को हुआ था गुरु रविदास का जन्म

भक्तिकाल को हिंदी साहित्य का स्वर्णयुग कहा जाता है और कहा भी क्यों न जाये आखिर कबीर, रैदास, सूर, तुलसी इसी युग की तो देन हैं जिन्होंने भगवान के सगुण और निर्गुण रूप को हर व्यक्ति तक पंहुचाया। यही वो दौर था जब इन संत कवियों ने मानवीय मूल्यों की पक्षधरता की और जन जन में भक्ति का संचार किया। इन्हीं में से एक थे संत रविदास। संत रविदास तो संत कबीर के समकालीन व गुरूभाई माने जाते हैं।


संत रविदास का जन्म

वैसे तो संत रविदास के जन्म की प्रामाणिक तिथि को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं लेकिन अधिकतर विद्वान सन् 1398 में माघ शुक्ल पूर्णिमा को उनकी जन्म तिथि मानते हैं। कुछ विद्वान इस तिथि को सन् 1388 की तिथि बताते हैं। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि हर साल माघ पूर्णिमा को संत रविदास की जयंती मनाई जाती है। कहते हैं माघ मास की पूर्णिमा को जब रविदास जी ने जन्म लिया वह रविवार का दिन था जिसके कारण इनका नाम रविदास रखा गया। रविदास चर्मकार कुल में पैदा हुए थे इस कारण आजीविका के लिये भी इन्होंने अपने पैतृक कार्य में ही मन लगाया। ये जूते इतनी इतनी लगन और मेहनत से बनाते मानों स्वयं ईश्वर के लिये बना रहे हों। उस दौर के संतों की खास बात यही थी कि वे घर बार और सामाजिक जिम्मेदारियों से मुंह मोड़े बिना ही सहज भक्ति की और अग्रसर हुए और अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वाह करते हुए ही भक्ति का मार्ग अपनाया।


मन चंगा कठौति में गंगा

संत रविदास की अपने काम के प्रति प्रतिबद्धता इस उदाहरण से समझी जा सकती है एक बार की बात है कि रविदास अपने काम में लीन थे कि उनसे किसी ने गंगा स्नान के लिये साथ चलने का आग्रह किया। संत जी ने कहा कि मुझे किसी को जूते बनाकर देने हैं यदि आपके साथ चला तो समय पर काम पूरा नहीं होगा और मेरा वचन झूठा पड़ जायेगा। और फिर मन सच्चा हो तो कठौति में भी गंगा होती है आप ही जायें मुझे फुर्सत नहीं। मान्यता है कि यहीं से यह कहावत जन्मी कि मन चंगा तो कठौति में गंगा।


सामाजिक भेदभाव का विरोध

संत रविदास ने अपने दोहों व पदों के माध्यम से समाज में जागरूकता लाने का प्रयास भी किया। सही मायनों में देखा जाये तो मानवतावादी मूल्यों की नींव संत रविदास ने रखी। वे समाज में फैली जातिगत ऊंच-नीच के धुर विरोधी थे और कहते थे कि सभी एक ईश्वर की संतान हैं जन्म से कोई भी जात लेकर पैदा नहीं होता। इतना ही नहीं वे एक ऐसे समाज की कल्पना भी करते हैं जहां किसी भी प्रकार का लोभ, लालच, दुख, दरिद्रता, भेदभाव नहीं हो। वे इसे बेगमपुरा कहते हैं।


संत रविदास और उनसे जुड़े चमत्कार

संत रविदास का जीवन हालांकि बहुत ही सरल सीधा रहा है लेकिन उनके जीवन से जुड़े कई प्रसंग ऐसे भी बताये जाते हैं जो किसी न किसी चमत्कार से जुड़े हों। कुछ चमत्कार इस प्रकार हैं-

उनके द्वारा पत्थर की मूर्ति को गंगा में छोड़ने पर उस मूर्ति का गंगा में तैरना

एक साधु द्वारा पारस पत्थर दिये जाने पर उसे इस्तेमाल न करना

अपनी कठौति से गंगा जल की धारा प्रवाहित होना

कठौति के जल से कुष्ठ रोग दूर होना

रविदास जी द्वारा एक मित्र सेठ को दी गंगा जी को दान देने के लिये दी गई राशि स्वयं गंगा मैया द्वारा स्वीकार करना

गंगा मैया द्वारा दूसरा कंगन लेना

उनके तन से जनेऊ निकलना


ये चमत्कार तो हो सकता है चमत्कार ही हों और रविदास जी के जीवन से इनका कोई संबंध न भी हो लेकिन उनकी भक्ति साधना और ईश्वर के प्रति आसक्ति को कोई नहीं नकार सकता बल्कि उन्हें तो स्वयं संत कबीरदास ने संतन में रविदास कहकर उच्च दर्जा दिया है। संत रविदास जी का यह पद तो आपने जरूर सुना होगा।


प्रभुजी तुम चंदन हम पानी।

जाकी अंग अंग वास समानी।।

प्रभुजी तुम स्वामी हम दासा।

ऐसी भक्ति करै रैदासा।।

ऐसे बहुत सारे पद गुरु ग्रंथ साहब में शामिल हैं। आज भी अपने पदों से संत रविदास हमें राह दिखाते हैं।


2018 में रविदास जयंती

माघ शुक्ल पूर्णिमा की तिथि अंग्रेजी कलेंडर के अनुसार 31 जनवरी को है इसलिये इसी दिन संत रविदास जी जयंती मनायी जायेगी। इस दिन संत रविदास जी की पूजा अर्चना की जाती है, शोभा यात्राएं निकाली जाती हैं, रथ यात्राएं निकाली जाती हैं और भजन कीर्तन कर संत रविदास को याद किया जाता है। आप सभी पाठकों को भी संत रविदास जी की जंयती की हार्दिक शुभकामनाएं।


संबंधित लेख

संत सिपाही गुरु गोबिंद सिंह की 352वीं जयंती   |   गुरु नानक जयंती - सतगुरु नानक प्रगटिया, मिटी धुंध जग चानण होआ   |   

गुरु पूर्णिमा - गुरु की पूजा करने का पर्व   |   कबीर जयंती – जात जुलाहा नाम कबीरा   |   गोस्वामी तुलसीदास – राम के नाम को घर घर पंहुचाने वाला कवि   

महर्षि वाल्मीकि - विश्व विख्यात ‘रामायण` के रचयिता   ।   महावीर जयंती    |   पौष पूर्णिमा 2018 - पौष पूर्णिमा व्रत विधि व महत्व

बैसाख पूर्णिमा - महात्मा बुद्ध जयंती 




एस्ट्रो लेख संग्रह से अन्य लेख पढ़ने के लिये यहां क्लिक करें

कन्या राशि में बुध का गोचर -   क्या होगा आपकी राशि पर प्रभाव?

कन्या राशि में बुध...

राशिचक्र की 12 राशियों में मिथुन व कन्या राशि के स्वामी बुध माने जाते हैं। बुध बुद्धि के कारक, गंधर्वों के प्रणेता भी माने गये हैं। यदि बुध के प्रभाव की बात करें तो ...

और पढ़ें...
भाद्रपद पूर्णिमा 2018 – जानें सत्यनारायण व्रत का महत्व व पूजा विधि

भाद्रपद पूर्णिमा 2...

पूर्णिमा की तिथि धार्मिक रूप से बहुत ही खास मानी जाती है विशेषकर हिंदूओं में इसे बहुत ही पुण्य फलदायी तिथि माना जाता है। वैसे तो प्रत्येक मास की पूर्णिमा महत्वपूर्ण ...

और पढ़ें...
अनंत चतुर्दशी 2018 – जानें अनंत चतुर्दशी पूजा का सही समय

अनंत चतुर्दशी 2018...

भादों यानि भाद्रपद मास के व्रत व त्यौहारों में एक व्रत इस माह की शुक्ल चतुर्दशी को मनाया जाता है। जिसे अनंत चतुर्दशी कहा जाता है। इस दिन अनंत यानि भगवान श्री हरि यान...

और पढ़ें...
परिवर्तिनी एकादशी 2018 – जानें पार्श्व एकादशी व्रत की तिथि व मुहूर्त

परिवर्तिनी एकादशी ...

हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को व्रत, स्नान, दान आदि के लिये बहुत ही शुभ फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि एकादशी व्रत ...

और पढ़ें...
श्री गणेशोत्सव - जन-जन का उत्सव

श्री गणेशोत्सव - ज...

गणों के अधिपति श्री गणेश जी प्रथम पूज्य हैं सर्वप्रथम उन्हीं की पूजा की जाती है, उनके बाद अन्य देवताओं की पूजा की जाती है। किसी भी कर्मकांड में श्री गणेश की पूजा-आरा...

और पढ़ें...