हिंदू धर्म में मंगलकारी कार्यों के लिए शुभ समय का ध्यान रखने की परंपरा है। इसी परंपरा के तहत रक्षाबंधन पर भी राखी बांधने के लिए शुभ समय देखा जाता है। रक्षाबंधन पर खासतौर पर भद्रा काल की स्थिति देखी जाती है, इसलिए भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधने से पहले इसकी अवधि का ध्यान रखा जाता है। ऐसे में अक्सर मन में यह सवाल आता है कि भद्रा को लेकर इतनी सतर्कता क्यों बरती जाती है?
तो चलिए आज जानते हैं कि रक्षाबंधन पर भद्रा का क्या महत्व है और इस दौरान राखी बांधने से क्यों बचा जाता है? साथ ही जानेंगे इसके पीछे कौन-सी पौराणिक मान्यता है और अनजाने में भद्रा के समय राखी बंध जाए तो इसे लेकर क्या मान्यता है?
रक्षाबंधन पर भाई की कलाई पर राखी बांधना एक शुभ रस्म मानी जाती है। इस दौरान बहन भाई की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना करती है। इसी वजह से पारंपरिक रूप से राखी बांधने के लिए ऐसे समय का चुनाव किया जाता है, जिसे धार्मिक दृष्टि से अनुकूल माना जाए। पंचांग में भद्रा की स्थिति भी इसी मुहूर्त-विचार का एक हिस्सा है। इसलिए रक्षाबंधन पर राखी की तैयारी करते समय केवल तिथि ही नहीं, बल्कि उस दिन भद्रा की स्थिति क्या है, इसका भी ध्यान रखा जाता है।
रक्षाबंधन पर भद्रा से बचने की परंपरा का संबंध पंचांग के विष्टि करण से माना जाता है। पंचांग में विष्टि करण को भद्रा से जोड़ा जाता है और इसकी अवधि को भद्रा काल कहा जाता है। इसे शुभ कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। इसलिए जब रक्षाबंधन की पूर्णिमा तिथि में भद्रा का समय आता है, तो उस अवधि में राखी बांधने की रस्म टालने की परंपरा है। भद्रा के दौरान की गई शुभ रस्म का सकारात्मक फल प्रभावित हो सकता है। इसी कारण रक्षाबंधन पर राखी बांधने से पहले भद्रा रहित समय का ध्यान रखा जाता है।
रक्षाबंधन पर भद्रा से बचने की वजह बताते हुए एक प्रचलित लोककथा रावण और उसकी बहन शूर्पणखा से जुड़ी सुनाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि शूर्पणखा ने भद्रा काल में रावण की कलाई पर राखी बांधी थी। इसके बाद भगवान राम और रावण के बीच युद्ध हुआ, जिसमें रावण के साथ उसके कुल का भी विनाश हुआ। इसी कथा को आधार बनाकर भद्रा के समय राखी बांधने को अशुभ मानने की परंपरा बताई जाती है।
अगर अनजाने में रक्षाबंधन पर भद्रा के दौरान राखी बांध दी जाए, तो इसे लेकर अलग-अलग पारंपरिक मान्यताएं मिलती हैं। कुछ मान्यताओं के अनुसार, इस समय किया गया रक्षाबंधन भाई की मंगलकामना के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। हालांकि, इसे किसी निश्चित अनिष्ट या भाई-बहन के रिश्ते पर पड़ने वाले तय प्रभाव के रूप में नहीं देखना चाहिए। भद्रा से जुड़ी यह मान्यता मुख्य रूप से धार्मिक आस्था और परंपरा का विषय है।
साथ ही, भद्रा से बचने की परंपरा हर परिवार में एक जैसी नहीं होती। कुछ परिवार पंचांग के अनुसार भद्रा-रहित समय में ही राखी बांधना पसंद करते हैं, जबकि कुछ परिवार अपनी पारिवारिक परंपरा, सुविधा और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेते हैं। इसलिए इसे एक धार्मिक मान्यता के रूप में समझना बेहतर है, न कि ऐसा नियम जिसके पालन न करने पर किसी निश्चित अनिष्ट की आशंका हो।
रक्षाबंधन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि पर मनाया जाता है, लेकिन पूर्णिमा की अवधि हमेशा एक ही कैलेंडर दिन तक सीमित नहीं होती। पर्व की तिथि तय करते समय सूर्योदय के समय मौजूद तिथि यानी उदय तिथि का भी ध्यान रखा जाता है। वहीं भद्रा की गणना तिथि और करण की स्थिति से जुड़ी होती है, जो पंचांग की चंद्र-आधारित गणना का हिस्सा हैं। इसलिए किसी साल राखी बांधने के समय भद्रा रह सकती है, जबकि किसी दूसरे साल यह अवधि पहले ही समाप्त हो जाए। इसी वजह से रक्षाबंधन पर राखी बांधने से पहले उस वर्ष के पंचांग में भद्रा की स्थिति देखना जरूरी माना जाता है।
रक्षाबंधन पर भद्रा को लेकर कुछ गलतफहमियां भी आम हैं। इन्हें स्पष्ट कर लेना जरूरी है, ताकि इस परंपरा को सही संदर्भ में समझा जा सके।
भद्रा का मतलब पूरा रक्षाबंधन अशुभ होना नहीं है: पारंपरिक मान्यता में मुख्य रूप से भद्रा की अवधि में राखी बांधने से बचने की बात कही जाती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि भद्रा होने पर रक्षाबंधन का पूरा दिन अशुभ हो जाता है।
पुराने साल का भद्रा समय अगले साल पर लागू नहीं किया जा सकता: भद्रा की अवधि हर वर्ष तिथि और करण की स्थिति के अनुसार बदल सकती है। इसलिए पिछले साल का भद्रा समय देखकर अगले रक्षाबंधन पर राखी बांधने का समय तय नहीं करना चाहिए।
भद्रा से बचना आस्था और परंपरा का विषय है: भद्रा में राखी बांधने को लेकर बताई जाने वाली मान्यताओं को धार्मिक विश्वास के रूप में समझना चाहिए। इसे किसी निश्चित अनिष्ट या भाई-बहन के रिश्ते पर पड़ने वाले तय प्रभाव की तरह नहीं देखना चाहिए।
रक्षाबंधन पर भद्रा की स्थिति जानने के लिए उस वर्ष का पंचांग देखें। अगर राखी बांधने के शुभ समय को लेकर कोई असमंजस हो, तो एस्ट्रोयोगी के ज्योतिषियों से परामर्श करें और उचित मार्गदर्शन पाएं।