Shiv Parvati Vivah Sthal: क्या आपने कभी सोचा है कि वह दिव्य स्थान कौन-सा है, जहां देवताओं ने स्वयं भगवान शिव और माता पार्वती के पवित्र विवाह का साक्षात्कार किया था? उत्तराखंड का त्रियुगीनारायण मंदिर वही स्थल है, जिसे शिव–पार्वती विवाह स्थल के रूप में संपूर्ण भारत में विशिष्ट पहचान मिली है।
क्या यह संभव है कि हजारों वर्ष पूर्व जली विवाह अग्नि आज भी उसी रूप में प्रज्वलित हो? त्रियुगीनारायण में यह मान्यता सजीव प्रतीत होती है, क्योंकि यहां की ऊर्जा, शांति और वातावरण यह एहसास कराते हैं कि यह स्थान केवल मंदिर नहीं, बल्कि दिव्यता का केंद्र है।
क्या कोई स्थान इतना पवित्र हो सकता है कि वहां कदम रखते ही आध्यात्मिक स्पंदन महसूस होने लगें? त्रियुगीनारायण मंदिर ऐसी ही अनुभूति देता है। यह वही पवित्र भूमि है जहां आदिदेव और आदिशक्ति का दिव्य मिलन हुआ था, और जिसकी स्मृति आज भी हवा, पर्वत और वातावरण में जीवित है।
भारत में अनेक मंदिर हैं जहां शिव–पार्वती से जुड़े प्रसंगों का वर्णन मिलता है, परंतु विवाह स्थल मात्र एक है — त्रियुगीनारायण।
मान्यता है कि देवताओं की उपस्थिति में हुआ यह दिव्य विवाह यहीं संपन्न हुआ। विवाह की सारी विधियां, फेरे, अनुष्ठान, मंत्रोच्चारण—सब इसी भूमि पर संपन्न हुए थे।
मंदिर की वास्तुकला और वातावरण के बारे में कहा जाता है कि यह केदारनाथ मंदिर की शैली का प्रतीक है, जिससे यह भी माना जाता है कि उस काल में यह क्षेत्र देवताओं का प्रमुख केंद्र रहा होगा।
त्रियुगीनारायण मंदिर का सबसे बड़ा प्रमाण इसका अखंड धुनी कुंड है। इस धुनी के बारे में तीन प्रमुख बातें प्रसिद्ध हैं—
इसी कारण इस स्थान को त्रियुगीनारायण कहा जाता है।
त्रि = तीन
युगी = युगों से चलने वाली अग्नि
श्रद्धालु यहां अग्नि में लकड़ी चढ़ाते हैं, और प्रसाद के रूप में उसी अग्नि की राख घर लेकर जाते हैं, जो शुभ और मंगलकारी मानी जाती है।
त्रियुगीनारायण में तीन प्राचीन कुंड हैं, जो विवाह स्थल की प्राचीनता और दिव्यता को सिद्ध करते हैं—
यह वह कुंड है जिसमें ब्रह्माजी ने पुरोहित की भूमिका निभाने से पहले स्नान किया था।
विवाह में भगवान विष्णु ने पार्वती के भाई का कर्तव्य निभाया था। उन्होंने विवाह से पूर्व यहां स्नान कर पवित्रता ग्रहण की थी।
अन्य देवी–देवताओं ने इस कुंड में स्नान करके विवाह में सम्मिलित हुए थे।
इन कुंडों का पानी कभी नहीं सूखता। सालभर इनका जल साफ और पवित्र बना रहता है।
त्रियुगीनारायण की पहाड़ों से घिरी शांत सुबह में आज भी एक कथा हवा में तैरती है—शिव और पार्वती के दिव्य विवाह की। देवी सती के देहत्याग के बाद जब पार्वती ने हिमालयराज के घर जन्म लिया, तब उनके मन में केवल एक ही इच्छा थी—अपने पिछले जन्म के अराध्य शिव को पति रूप में प्राप्त करना।
पार्वती ने कठोर तपस्या शुरू की। हिमालय की सर्द हवाएँ, बर्फ से ढके जंगल और तप की कठिन अग्नि—कुछ भी उनके संकल्प को रोक न सका। वर्षों तक चले उपवास, ध्यान और साधना के बाद जब उनकी भक्ति पूरे ब्रह्मांड में गूंजी, तब शिव जी ने समाधि से नेत्र खोले और पार्वती की प्रार्थना से प्रसन्न होकर विवाह के लिए सहमत हो गए।
देवताओं ने विवाह का आयोजन किया और स्थल चुना गया—त्रियुगीनारायण। यहाँ मंडप सजाया गया, देवताओं के मंगल गीत पर्वतों में गूंजे और ब्रह्माजी ने मंत्रोच्चार किया। इसी पवित्र भूमि पर शिव और पार्वती ने अग्नि के सात फेरे लिए, और वही अग्नि आज भी अनंत ज्योति के रूप में जल रही है।
इस दिव्य मिलन ने त्रियुगीनारायण को सदैव के लिए शिव–पार्वती विवाह स्थल बना दिया—जहाँ प्रेम, तपस्या और आस्था एक साथ अमर हो गए।
विवाह की अग्नि का निरंतर जलना एक बड़ा प्रमाण माना जाता है। आज तक यह धुनी कभी बुझी नहीं।
मंदिर परिसर में एक विशेष चबूतरा है जिसे विवाह मंडप का स्थान माना जाता है।
मंदिर की ऊंचाई और स्थिति बताती है कि यह स्थान देवताओं की सभा के लिए उपयुक्त रहा होगा।
मंदिर की रचना और पत्थर के उपयोग से यह स्पष्ट होता है कि यह स्थान अत्यंत प्राचीन है और केदारनाथ की शैली का है।
त्रियुगीनारायण केवल प्राचीन स्थल ही नहीं, एक जागृत शक्ति वाला स्थान माना जाता है।
यहां आने वाले लोग बताते हैं कि—
मंदिर पंडितों के अनुसार यहां देवताओं की उपस्थिति आज भी महसूस की जा सकती है।
त्रियुगीनारायण केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि शिव–पार्वती के पवित्र मिलन की जीवित स्मृति है। यह वही स्थान है जहां प्रेम ने तपस्या का रूप लिया और विवाह ने दिव्यता का। आज भी यहां की अग्नि, कुंड, वातावरण, पर्वत और शांति यह प्रमाण देते हैं कि यह स्थल साक्षात् वह भूमि है जहां देवताओं ने ब्रह्मांड के सर्वश्रेष्ठ दंपत्ति का विवाह संपन्न किया था। जो भी यहां आता है, वह अपने साथ अनुभव, आस्था और दिव्यता की अनोखी अनुभूति लेकर जाता है।
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