नरसिंह जयंती

भगवान विष्णु के चौथे अवतार नरसिंह भगवान माने जाते हैं। बैशाख मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को नरसिंह जयंती(narasimha jayanti) मनाई जाती है। पौराणिक कथानुसार, महर्षि कश्यप और अदिति के हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप नाम के दो पुत्र हुए। दोनों ही बहुत शक्तिशाली और राक्षसों के राजा थे। हिरण्याक्ष का आतंक इतना बढ़ गया कि भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर उसका वध कर दिया। वहीं भाई के वध के क्रोधित हो कर हिरण्यकश्यप ने भगवान विष्णु से बदला लेने की ठानी। इसके लिए हिरण्याकश्यप ने हजारों साल तप किया और ब्रह्मा जी को प्रसन्न करके वरदान मांगा। उसने वरदान मांगा कि कोई नर या पशु उसका वध न कर सके और ब्रह्मा जी ने तथास्तु कह दिया। 

ब्रह्मा जी के वरदान के बाद हिरण्याकश्यप निर्भीक हो गया औऱ उसने तीनों लोकों पर आतंक मचा दिया। उसने स्वर्गलोक से देवताओं को निर्वासित कर दिया और तीनों लोकों पर आधिपत्य जमा लिया। भगवान विष्णु से प्रतिशोध लेने के लिए उसने अपने राज्य में घोषणा की कि वह स्वयं भगवान है और उसके अलावा कोई किसी को नहीं पूजेगा। लेकिन हिरण्याकश्यप अपने पुत्र प्रह्लाद के जन्म के बाद उसकी भक्ति से भयभीत होने लगा, उसे मृत्युलोक पहुंचाने का प्रयार करने लगा। उसने अपनी बहन होलिका के जरिए भी प्रह्लाद का वध करना चाहा लेकिन होलिका खुद ही जल गई। बहन की मृत्यु के बाद हिरण्याकश्यप अत्यधिक क्रोधित हो गया और उसने बैशाख शुक्ल चतुर्दशी के दिन अपने पुत्र का वध करने की ठानी। 

हिरण्याकश्यप ने प्रह्लाद से कहा कि तुम अपने भगवान विष्णु को बुलाओ। इस पर प्रह्लाद ने कहा कि प्रभु सर्वत्र विद्यमान है और कण-कण में समाए हुए हैं। इस पर प्रह्लाद का उपहास उड़ाते हुए कहा कि इस स्तंभ में भी तुम्हारा विष्णु मौजूद है, तो प्रह्लाद ने कहा कि हां इसमें भी वह विद्यमान हैं। ये बात सुनकर हिरण्याकश्यप को क्रोध आ गया और उसने स्तंभ पर अपनी तलवार से वार किया। वार करते ही स्तंभ को चीरकर भगवान विष्णु के अवतार नरसिंह प्रकट हुए। नरसिंह भगवान ने हिरण्याकश्यप को अपनी गोद में लिटाकर अपने नाखुन से उसका पेट चीर डाला। लेकिन इसके बाद भी नरसिंह भगवान का क्रोध शांत नहीं हुआ । उनके क्रोध को शांत करने के लिए सभी देवता भगवान विष्णु के पास पहुंचे। तीनों देवता भगवान नरसिंह का क्रोध शांत कराने पहुंचे लेकिन उनका क्रोध शांत नहीं हुआ। यहां तक साक्षात भगवान शिव सामने आकर खड़े हो गए, लेकिन नरसिंह भगवान ने उन पर आक्रमण कर दिया। भगवान शंकर को क्रोध आ गया और उन्होंने एक विकराल वृषभ का रूप धारण कर लिया और नरसिंह को अपनी पूंछ में लपेटकर खींचकर पाताल में ले गए। काफी देर तक नरसिंह को जकड़कर रखा और नरसिंह ने अपनी सभी शक्तियों को इस्तेमाल किया लेकिन स्वतंत्र होने में असमर्थ रहे और शक्तिहीन हो गए। इसके बाद भगवान नरसिंह का क्रोध शांत हुआ।




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