Skip Navigation Links
भगवान विष्णु को समर्पित है बद्रीनाथ धाम


भगवान विष्णु को समर्पित है बद्रीनाथ धाम

वैसे तो पूरे भारतवर्ष को ही तीर्थों का स्थल कहा जाये तो कुछ भी गलत नहीं होगा। चूंकि हिंदू धर्म के मानने वालों की संख्या बहुतायत में है इसलिये हिंदुओं की आस्था के केंद्र भी अधिक मिलते हैं। उत्तर-दक्षिण, पूर्व-पश्चिम चारों दिशाओं में चार धाम हिंदूओं की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। इन्हीं में एक धाम है बद्रीनाथ। हिमालय में समुद्र तल से लगभग 3050 मीटर की ऊंचाई पर स्थित बद्रीनाथ का नजारा बहुत मोहक होता है। आइये आपको बताते हैं भगवान विष्णु के इस मंदिर बद्रीनाथ की कहानी।


क्यों कहते हैं बद्रीनाथ

अलकनंदा नदी के बांई और तट पर नर और नारायण नामक दो पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित भगवान विष्णु के इस धाम के आस-पास एक समय में जंगली बेरी बद्री प्रचुर मात्रा में पाई जाती थी। इसी बद्री के नाम पर इस धाम का नाम बद्रीनाथ पड़ा। वहीं बद्रीनाथ नाम होने के पिछे एक कथा भी प्रचलित है हुआ यूं कि भगवान विष्णु तपस्या में लीन थे कि भयंकर हिमपात होने लगा। हिमपात के कारण भगवान विष्णु भी पूरी तरह हिम में डूब चुके थे। तब माता लक्ष्मी से उनकी यह दशा सहन न हो सकी और उनके समीप ही एक बेरी यानि बदरी के वृक्ष का रुप लेकर उन्हें धूब, वर्षा और हिम से बचाने लगी। कालांतर में जब भगवान विष्णु ने आंखे खोली तो देखा की मां लक्ष्मी स्वयं हिम से ढकी हुई हैं। भगवान विष्णु ने माता लक्ष्मी के तप को देखते हुए कहा कि आपने भी मेरे समान ही तप किया है इसलिये इस धाम को मुझे तुम्हारे साथ पूजा जायेगा साथ ही उन्होंने कहा चूंकि आपने बदरी वृक्ष का रूप धारण कर मेरी रक्षा की है इसलिये मुझे भी बदरी के नाथ यानि बदरीनाथ के नाम से जाना जायेगा।


छह महीने तक नारद करते हैं पूजा

बद्रीनाथ धाम के कपाट सर्दियों के मौसम में बंद रहते हैं। कहते हैं मंदिर के कपाट बंद होने के बाद फिर छह मास तक देवर्षि नारद भगवान की पूजा करते हैं। कहा जाता है कि मंदिर के कपाट बंद करते समय जो ज्योति जलाई जाति है वह कपाट खुलने के बाद भी वह जलती हुई मिलती है।


बद्रीनाथ में रहते थे भगवान भोलेनाथ

कहा जाता है कि बद्रीनाथ धाम पहले भगवान शिव का निवास होता था और वे यहां माता पार्वती के साथ रहा करते थे। एक बार की बात है कि भगवान शिव और माता पार्वती देखते हैं कि द्वार पर एक बालक बहुत तेज-तेज रो रहा है। माता पार्वती इस दारुण दृश्य को देखकर चुप न रह सकी और बच्चे की तरफ जाने लगी। भगवान शिव ने उन्हें रोकने की कोशिश भी की समझाया भी कि इस निर्जन इलाके में यह अकेला बच्चा जरुर कुछ गड़बड़ है। लेकिन बच्चे का रुदन माता पार्वती के हृद्य को भेद रहा था  वे बच्चे को उठाने लगी की भगवान भोलेनाथ ने फिर रोका और कहा कि पार्वती बच्चे को मत छुओ। इस माता पार्वती बिफर गई और बोली की आप इतने निर्दयी कैसे हो सकते हैं। लाख समझाने पर भी वे नहीं मानी और बच्चे को अंदर ले गई थोड़ी देर बाद बच्चा चुप हो गया। माता पार्वती बच्चे को दुध पिलाकर निश्चिंत हुई तो उसे छोड़कर भगवान शिव के साथ नजदीक के गरम पानी के झरने में स्नान करने चली गईं। जब वे वापस लौटे तो देखा कि घर अंदर से बंद है। ऐसे में माता पार्वती आश्चर्यचकित हुई और बोली ऐसा कैसे हुआ? भगवान शिव बोले मैनें पहले ही कहा था बच्चे को मत उठाओ वह कोई साधारण बालक नहीं लेकिन तुम नहीं मानी अब भुगतो। माता पार्वती बोली अब हम क्या करेंगें कहां जायेंगें तब भगवान शिव बोले यह तुम्हारा प्रिय बालक है इसलिये मैं इसे कोई हानि नहीं पंहुचा सकता अब हमारे पास एक ही विकल्प बचता है कि हम अपने लिये कोई और ठिकाना ढूंढ लें तब भगवान शिव शंकर ने वहां से कूच कर केदारनाथ में अपना नया ठिकाना बनाया। आप सोच रहे होंगें की यह बालक कौन थे तो यह थे भगवान विष्णु जिन्हें अपनी साधना के लिये यह स्थान पसंद आया और बालक बनकर भगवान शिव के घर में अपना डेरा जमाया।


नर और नारायण की कहानी

नर और नारायण नाम के जिन दो पर्वतों के बीच बद्रीनाथ धाम स्थित है इनकी भी अपनी कहानी हैं और पौराणिक ग्रंथों में अलग-अलग कहानियों के उल्लेख मिलते हैं। इन्हें साक्षात विष्णु का अवतार माना जाता है जो ब्रह्मा के पुत्र धर्म की पत्नी से पैदा हुए। माना जाता है कि यहां पर इन्होंनें जगत के कल्याण के लिये कठोर तप किया। केदारनाथ में शिवलिंग की स्थापना भी नर और नारायण द्वारा किये जाने की मान्यता है। लेकिन एक कहानी कुछ इस तरह है कि एक बार सहस्त्र कवच नाम का एक असुर होता था जो भगवान सूर्यदेव का अनन्य भक्त था। वैसे उसका असली नाम तो दम्भोद्भव था लेकिन सूर्यदेव की कठोर तपस्या से उसने वरदान में सहस्त्र कवच हासिल किये थे और एक कवच को वही तोड़ सकता था जिसने हजारों वर्ष तपस्या की हो। इसी कारण उसका नाम सहस्त्र कवच हो गया। ऐसे में सभी उससे डरने लगे। देवताओं के सिंहासन तक उसके भय से डोलने लगे। संसार को सहस्त्र कवच के भय मुक्त कराने के लिये ही भगवान विष्णु ने नर और नारायण के रुप में अवतार लिया और यहां तपस्या करने लगे। मान्यता है कि बद्रीनाथ धाम में की गई तपस्या का फल भी हजारों साल की तपस्या जितना मिलता है। ऐसे में नर और नारायण में से एक सहस्त्र कवच के साथ युद्ध करता और दूसरा तप करता और रोज़ सहस्त्र कवच का एक कवच तोड़ देता। फिर दूसरे रोज़ दूसरा युद्ध करता और पहला तपस्या में लीन रहता इस प्रकार जब सहस्त्र कवच के 999 कवच टूट गये तो उसने डर के मारे सूर्यदेव की शरण ली। मान्यता है कि कालांतर में नर और नारायण ने ही श्री कृष्ण और अर्जुन का अवतार लिया और सहस्त्र कवच ने कर्ण के रुप में जन्म लेकर अपने पूर्वजन्म के दुष्कर्मों की सजा काटी। जो एक कवच बचा हुआ था उसके रहते कर्ण को नहीं मारा जा सकता था इसलिये देवराज इंद्र ने कर्ण से कवच और कुंडल मांग लिये थे जिसके बाद कर्ण का वध हुआ।


कैसे पंहुचे बद्रीनाथ

हरिद्वार, ऋषिकेश, रुद्रप्रयाग से होते हुए बद्रीनाथ धाम पंहुचा जा सकता है लेकिन वहां का मौसम बहुत ठंडा होता है इसलिये पूरी तैयारी के साथ जाना चाहिये। ऋषिकेश से बद्रीनाथ धाम की दूरी 295 किलोमीटर की है। साथ ही सर्दियों में बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद रहते हैं और पूरा क्षेत्र निर्जन रहता है इसलिये सर्दियों के समय बद्रीनाथ की यात्रा नहीं की जाती मई महीने से लेकर नवबंर तक बद्रीनाथ धाम की यात्रा के लिये विशेष प्रबंध किये जाते हैं।


संबधित लेख

द्वारकाधीश मंदिर   |   अमरनाथ - बाबा बर्फानी की कहानी   |   हरिद्वार – हरि तक पंहुचने का द्वार   |      राधावल्लभ मंदिर वृंदावन   |   

यहाँ भगवान शिव को झाड़ू भेंट करने से, खत्म होते हैं त्वचा रोग   |   पाताल भुवनेश्वर गुफा मंदिर

दिन में तीन बार अपना रंग बदलता है यह शिवलिंग   |   चमत्कारी शिवलिंग, हर साल 6 से 8 इंच बढ़ रही है इसकी लम्बाई 

भगवान शिव और नागों की पूजा का दिन है नाग पंचमी




एस्ट्रो लेख संग्रह से अन्य लेख पढ़ने के लिये यहां क्लिक करें

नरक चतुर्दशी 2017 - क्यों कहते हैं छोटी दिवाली को नरक रूप या यम चतुदर्शी

नरक चतुर्दशी 2017 ...

कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी यानि अमावस्या से पूर्व आने वाला दिन जिसे हम छोटी दिवाली के रूप में मनाते हैं। क्या आप जानते हैं इस दिन ...

और पढ़ें...
दीपावली पूजन विधि और शुभ मूहूर्त

दीपावली पूजन विधि ...

दीपावली प्रकाश का त्यौहार हैं जो यह सीख देता हैं कि व्यक्ति के जीवन में सुख दुःख सदैव आता-जाता रहता है।  इसलिए मनुष्य को वक्त की दिशा में आगे...

और पढ़ें...
दिवाली पर यह पकवान न खाया तो क्या त्यौहार मनाया

दिवाली पर यह पकवान...

सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रीति-रिवाज़ों, परंपराओं के तहत मनाये जाने वाले उत्सवों को त्यौहार कहा जाता है। भागदौड़ और व्यस्तताओं भरी जीवनश...

और पढ़ें...
गोवर्धन  2017 - गोवर्धन पूजा  कथा और शुभ मुहूर्त

गोवर्धन 2017 - गो...

दिवाली के पर्व के बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा का पर्व मनाया जाता है। आमतौर पर यह पर्व अक्सर दिवाली के आगामी दिव...

और पढ़ें...
भैया दूज 2017 - भैया दूज पूजा मुहूर्त और व्रत कथा

भैया दूज 2017 - भै...

भाई-बहन के प्रेम, स्नेह का प्रतीक भैया दूज दिवाली के जगमगाते पर्व के दो दिन बाद मनाया जाता है| भारत में ‘रक्षा बंधन` के अलावा यह दूसरा पर्व ह...

और पढ़ें...