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बल्लालेश्वर विनायक मंदिर – अष्टविनायक यात्रा का तीसरा पड़ाव



बल्लालेश्वर विनायक मंदिर – अष्टविनायक यात्रा का तीसरा पड़ाव

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से आरंभ हुआ गणेशोत्सव अपने चरम पर है। इस उत्सव के दौरान हम अपने पाठकों को बता रहे हैं भगवान श्री गणेश के महाराष्ट्र स्थित अष्टविनायक मंदिरों के बारे में। अष्टविनायक तीर्थ यात्रा की शुरुआत मोरेगांव के मोरेश्वर या कहें मयुरेश्वर मंदिर में भगवान गणेश के दर्शन करने से होती है। मयुरेश्वर के पश्चात सिद्धटेक के सिद्धिविनायक मंदिर में भगवान विनायक की आराधना की जाती है। मोरेश्वर एवं सिद्धिविनायक के पश्चात अष्टविनायक तीर्थ यात्रा का तीसरा पड़ाव आता है बल्लालेश्वर विनायक मंदिर का। महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के पाली गांव में भगवान श्री गणेश का यह मंदिर स्थित है। आइये जानते हैं बल्लालेश्वर विनायक के बारे में।

यहां भगवान गणेश को कहते हैं बल्लालेश्वर विनायक

महाराष्ट्र के मुंबई (124 कि.मी) और पुणे (111 कि.मी)  से लगभग समान दूरी पर रायगढ़ जिले के पाली गांव  में भगवान गणेश का यह मंदिर स्थित है। यह अष्टविनायक शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। इस मंदिर के साथ मान्यता जुड़ी है कि यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहां भगवान गणेश किसी साधारण व्यक्ति जैसे परिधान (धोती-कुर्ते) में हैं। मान्यता है कि भगवान गणेश ने यहां पर अपने भक्त बल्लाल को एक ब्राह्मण के वेश में दर्शन दिये थे। भगवान गणेश भक्त के बल्लाल के नाम पर ही इस मंदिर का नाम बल्लालेश्वर विनायक पड़ा। मान्यता है कि भगवान श्री विनायक का यह इकलौता मंदिर है जिसका नाम उनके भक्त के नाम पर रखा गया है। इसकी एक कहानी भी है जो कुछ इस तरह है।

बल्लालेश्वर की कहानी

बहुत समय पहले की बात है पाली गांव में एक सेठ दंपति रहते थे। सेठ का नाम कल्याण तो उनकी पत्नी का नाम इंदुवती था। उनका एक पुत्र भी था जो भगवान गणेश का परमभक्त था। नाम था बल्लाल। उसकी भक्ति से पिता खुश नहीं थे, वह चाहते थे कि बल्लाल उनके कामकाज में हाथ बंटाएं लेकिन वह स्वयं तो सारा दिन भक्ति में लीन रहता ही था साथ ही और भी हम उम्र दोस्तों को भगवान गणेश की महिमा सुनाता रहता और उन्हें भी भक्ति के लिये प्रेरित करता। एक दिन उसके दोस्तों के माता-पिता सेठ कल्याण के यहां पंहुचे और शिकायत की कि बल्लाल खुद तो कुछ करता नहीं है साथ ही वह उनके पुत्रों को भी बिगाड़ रहा है। फिर क्या था सेठ का पारा सातवें आसमान पर वह बल्लाल को ढूंढते हुए जंगल में जा पंहुचे जहां वह भगवान गणेश की आराधना कर रहा था, उन्होंने उसे खूब पीटा यहां तक भगवान गणेश की जिस प्रतिमा की वह पूजा कर रहा था उसे भी उन्होनें क्षतिग्रस्त करने का प्रयास किया। उन्होंने प्रतिमा को उठाकर दूर फेंक दिया और बल्लाल को पेड़ से बांधकर वहीं मरने के लिये छोड़ दिया हालांकि बल्लाल अब भी शांत था और भगवान गणेश के ध्यान में ही खोया था। कहते हैं बल्लाल की निष्ठा व भक्ति से प्रसन्न हो भगवान गणेश ब्राह्मण के वेश में उसके सामने प्रकट हुए और उससे बंधन से मुक्त कर कहा कि वे उसकी भक्ति से प्रसन्न हैं जो मांगना चाहते हो मांगो। तब उसने कहा कि मुझे आपकी शरण के अलावा कुछ नहीं चाहिये मेरी इतनी इच्छा है कि आप इसी क्षेत्र में वास करें। मान्यता है कि भगवान श्री गणेश ने उनकी इच्छा पुरी करते हुए स्वयं को एक पाषाण प्रतिमा में स्थापित कर लिया। यहीं पर उनके मंदिर का निर्माण भी किया गया। इसी मंदिर के समीप बल्लाल के पिता ने जिस प्रतिमा को फेंका था उसे ढूंडी विनायक के नाम से जाना गया। आज भी लोग बल्लालेश्वर के दर्शन से पहले ढूण्ढी विनायक की पूजा करते हैं।

इस स्थान से यह मान्यता भी जुड़ी है कि त्रेता युग में जिस दण्डकारण्य का जिक्र है यह स्थान उसी का हिस्सा था। यह भी कि भगवान श्री राम को आदिशक्ति मां जगदंबा ने यहीं पर दर्शन दिये थे। यहां से कुछ ही दूरी पर वह स्थान भी बताया जाता है जहां सीताहरण के समय रावण और जटायु में युद्ध हुआ था।

बल्लालेश्वर स्वरुप व मंदिर की संरचना

बल्लालेश्वर भगवान की प्रतिमा पाषाण के सिंहासन पर स्थापित है। पूर्व की तरफ मुख वाली 3 फीट ऊंची यह प्रतिमा स्वनिर्मित हुई लगती है। इस प्रतिमा में भगवान श्री गणेश की सूंड बांई ओर मुड़ी हुई है। नेत्रों व नाभि में हीरे जड़े हुए हैं। भगवान श्री गणेश के दोनों और रिद्धी-सिद्धी की प्रतिमाएं भी हैं जो उनके दोनों और चंवर लहरा रही हैं। यह प्रतिमा ब्राह्मण की पोशाक में स्थापित लगती है। वहीं बल्लालेश्वर मंदिर के पीछे की ओर ढुण्डी विनायक का मंदिर है इसमें भगवान गणेश की प्रतिमा का मुख पश्चिम की तरफ है। यह प्रतिमा भी स्वत: बनी लगती है। मंदिर की अगर बात करें तो भगवान बल्लालेश्वर का प्राचीन मंदिर काष्ठ का बताया जाता है। लेकिन कालांतर में इसके जीर्ण-शीर्ण होने पर इसका पुनर्निमाण हुआ जिसमें पाषाण का उपयोग हुआ है। मंदिर के समीप ही दो सरोवर भी हैं। इनमें से एक का जल भगवान गणेश को अर्पित किया जाता है। इतना ही नहीं यदि ऊंचाई से पूरे मंदिर को देखा जाये तो यह देवनागरी के श्री अक्षर की भांति प्रतीत होता है। मान्यता है कि हिंदू पंचाग के अनुसार दक्षिणायन में सूर्योदय के समय भगवान गणेश की प्रतिमा पर सूर्य की किरणे पड़ती हैं। मंदिर में अंत: और बाह्य दो मंडपों का निर्माण किया गया है। बाहरी मंडप 12 तो अंत: मंडप 15 फीट ऊंचा है। अंत: मंडप में ही भगवान बल्लालेश्वर की प्रतिमा स्थापित है। बाहरी मंडप में भगवान गणेश के वाहन मूषक जो कि अपने पंजो में भगवान गणेश के प्रिय आहार मोदक को दबाये हैं कि प्रतिमा भी बनी हुई है।

भगवान बल्लालेश्वर के इस मंदिर में भाद्रपद माह की शुक्ल प्रतिपदा से लेकर पंचमी के बीच यहां गणेशोत्सव की धूम देखी जा सकती है। इसी समय मंदिर में महापूजा व महाभोग का आयोजन भी किया जाता है।

कैसे पंहुचे बल्लालेश्वर मंदिर

हवाई, रेल और सड़क तीनों रास्तों से रायगढ़ के पाली पंहुचा जा सकता है। नजदीकी हवाई अड्डे मुंबई और पुणे हैं तो मुंबई, अहमदनगर व पुणे के रेलवे स्टेशन। रेलमार्ग से करजत उतरकर बस से पाली पंहुचा जा सकता है। मुंबई से पनवेल व खोपोली होते हुए पाली 124 किलोमीटर दूर पड़ता है जबकि लोनावला, खोपोली होकर पुणे से पाली की दूरी सड़क मार्ग से 111 किलोमीटर पड़ेगी। 

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