महर्षि दयानंद सरस्वती जयंती – वैदिक ज्ञान की अलख जगाने वाला संत

महर्षि दयानंद सरस्वती का जन्म गुजरात के टकारा गांव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। हिंदू पंचाग के अनुसार उस दिन फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि व संवत 1881 का साल था। इस वर्ष इनकी जयंती 28 फरवरी को है। इनके पिता अंबाशंकर थे। इनका प्रारंभिक नाम भी मूलशंकर तिवारी था। तो आइये जानते हैं मूलशंकर से स्वामी दयानंद सरस्वती बनने की उनकी संक्षिप्त जीवन यात्रा के बारे में।

होनहार बिरवान के होत चिकने पात अर्थात कोई बालक भविष्य में कितना बुद्धिमान, कितना निडर बनेगा इसके लक्षण पहले ही दिखाई देने लग जाते हैं। स्वामी दयानंद भी बचपन से बहुत ही मेधावी व होनहार थे जब बालक मूलशंकर की आयु मात्र दो साल की थी तब गायत्री मंत्र इन्हें कंठस्थ हो गया था और उसका उच्चारण भी बिल्कुल सपष्ट करने लग गये थे। इनका परिवार बहुत ही धार्मिक परिवार था, घर में पूजा-पाठ होते रहते थे। पिता अंबाशंकर भगवान शिवशंकर के अनन्य भक्त थे। इसी वातावरण में आप पल-बढ़ रहे थे और आपकी भी भगवान के प्रति गहरी आस्था थी। कहा जाता है कि आपने मात्र चौदह वर्ष की आयु में ही धर्मशास्त्रों सहित संपूर्ण संस्कृत व्याकरण, सामवेद व यजुर्वेद का अध्ययन कर लिया था। ये चीज़ों को तार्किक दृष्टि से समझने का प्रयास करते। इसी समय धार्मिक कर्मकांडों से इनका विश्वास उठने लगा इसी कारण मथुरा में स्वामी विरजानंद से शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत गुरुआज्ञा से पाखण्डों का खण्डन करने के लिये निकल पड़े। स्वामी विरजानंद के पास ही इन्हें सरस्वती की उपाधि प्राप्त हुई। ये देश भर में भ्रमण करते रहे, विद्वान आचार्यों से ज्ञान अर्जित करते रहे। तत्पश्चात 1875 में धर्म सुधार के लिये ही स्वामी जी ने आर्य समाज की स्थापना की और वेदों के महत्व को देश भर में घूम-घूम कर इन्होंने बतलाया। स्वामी दयानंद सरस्वती के प्रयासों से ही कालांतर से चली आ रही कई सामाजिक व धार्मिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज़ बुलंद हुई। ये जातिवाद, बाल-विवाह के खिलाफ थे और विधवा-विवाह के समर्थक। इनका मानना था कि गैर हिंदू भी हिंदू धर्म में शामिल हो सकते हैं। माना जाता है कि इन्हीं के प्रयासों से वर्ण व्यवस्था के कारण हिंदूओं में जो धर्म परिवर्तन हो रहा था वह थम गया था। इन्होंने अंग्रेजों से भी लोहा लिया व आजादी के प्रथम संग्राम में भूमिका निभाई।

हालांकि इनकी राह भी आसान नहीं रही, और धार्मिक कट्टरवादियों, पोंगा पंडितों व अंग्रेजी हुकूमत की नजरों में ये कांटे की तरह चुभते थे जिसके चलते इन्हें कई जगहों पर विरोध सहना पड़ा, इन पर हमले होते। इनके खिलाफ षड़यंत्र रचे जाते। इन्हीं षड़यंत्रों में से एक के कारण 1883 में कार्तिक अमावस्या यानि की दीपावली की संध्या को स्वामी दयानंद सरस्वती शारीरिक रूप से संसार के बीच नहीं रहे। लेकिन सत्य का जो प्रकाश इन्होंने जगत में फैलाया है वह आज भी अंधेरे को दूर कर उजियारा कायम करता है। इन्होंने सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, ऋग्वेद भाष्य, यजुर्वेद भाष्य, संस्कारविधि, पञ्चमहायज्ञविधि, आर्याभिविनय, गोकरूणानिधि, भ्रांतिनिवारण, अष्टाध्यायीभाष्य, वेदांगप्रकाश, संस्कृतवाक्यप्रबोध, व्यवहारभानु आदि पुस्तकें भी लिखी जो आज भी हमें राह दिखाती हैं।

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