योग

क्रिया योग

क्रिया योग (Kriya Yoga) को करने वालों इसे एक प्राचीन योग पद्धति के रूप में जानते हैं। कालांतर में इसे महावतार बाबाजी के शिष्य लाहिरी महाशय के जरीये अठरहवीं शताब्दी के आसपास एक बार फिर से अस्तित्व में लाया गया। आगे चलकर यह परमहंस योगानन्द की पुस्तक एक योगी की आत्मकथा के जरिए यह योग क्रिया को जन सामान्य तक पहुंचा। इस पद्धति में प्राणायाम के कई स्तर शामिल हैं जो ऐसे सिद्धांतों पर आधारित होते हैं जिनका उद्देश्य आध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया को बढ़ाना है। इस तरह क्रिया योग ईश्वर बोध, यथार्थ ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने की एक वैज्ञानिक प्रणाली है।

क्रिया योग का इतिहास

क्रिया योग के इतिहास की बात करें तो लाहिरी महाशय के महावतार बाबाजी से 18वीं शताब्दी में क्रिया योग की दीक्षा प्राप्त की। इस प्रसंग का विवरण परमहंस योगानन्द द्वारा लिखित एक योगी की आत्मकथा में विस्तार से मिलता है। पुस्तक में दर्ज प्रसंग के अनुसार, उस बैठक में महावतार बाबाजी ने लाहिरी महाशय से कहा कि, यह क्रिया योग (Kriya Yoga) जिसे मैं इस दुनिया को तुम्हारे माध्यम से दे रहा हूं, यह  वही क्रिया है, जिसे भगवान श्री कृष्ण ने कालांतर में अर्जुन को दिया था। आगे चलकर यह ज्ञान पतंजलि और सेंट पॉल जैसे अन्य योगियों को मिला।

क्रियायोग का उद्देश्य एवं महत्व

ऋषि पतंजलि ने साधनपाद के दूसरे सूत्र में क्रियायोग का उद्देश्य बताया है-
योग सूत्र 2/2  ‘समाधिभावनार्थ: क्लेशतनुकरणार्थष्च।
अर्थात् यह क्रियायोग साधक को समाधि की सिद्धि प्रदान करने वाला तथा पंचक्लेशों को क्षीण करने वाला है।
पतंजलि मानना है कि मनुष्य के पूर्व जन्म के संस्कार, आने वाले समस्त जन्म में अपना प्रभाव दिखाते है। इसका परिणाम मनुष्य को हर जन्म में भोगना पड़ता है। इन परेशानियों पूरी तरह से दूर किए बिना क्रिया योग की साधना नहीं किया जा सकता है। यदि साधक यह करने में कामयाब होते हैं तो मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर साधक बढ़ सकता है। क्रियायोग की साधना से समाधि की योग्यता आ जाती है।

क्रिया योग का अभ्यास

क्रिया योग पारंपरिक रूप से गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से ही सीखा जाता है। साधक इसे आस योग की तरह नहीं ले सकता है। क्रिया योग (Kriya Yoga) में साधक की दीक्षा के बाद उन प्राचीन कठोर नियमों में निर्देशित किया जाता है जो गुरु से शिष्य संचारित योग कला को नियंत्रित करते हैं। योगानंद के जरिए इस क्रिया योग को विस्तार से वर्णित किया गया है। क्रिया योगी के माध्यम से आप अपनी जीवन ऊर्जा को मानसिक रूप से नियंत्रित कर सकते हैं। मनुष्य के संवेदनशील रीढ़ की हड्डी के इर्द-गिर्द उर्जा के डेढ़ मिनट का चक्कर उसके विकास में तीव्र प्रगति ला सकता है। है योगानंद ऐसा मानना है कि आधे मिनट का क्रिया योग प्रभाव वर्ष के प्राकृतिक आध्यात्मिक विकास के बराबर होता है। स्वामी सत्यानन्द के क्रिया उद्धरण में वर्णन है कि क्रिया साधना को ऐसा माना जा सकता है कि जैसे यह आत्मा में रहने की पद्धति है।

क्रिया योग के लाभ

क्रिया योग के कई लाभ हैं, जिनमें से हम कुछ यहां दे रहे हैं। जो इस प्रकार हैं –

  1.  क्रिया योग के अभ्यास से साधक अपने आत्मा को साध लेता है। इसके साथ ही वह अपने ज्ञानेंद्रियों को साधने मे कामयाब होगा।
  2.  इससे आपको मानसिक राहत मिलती है। अवसाद से आपको छुटकारा मिलता है।
  3.  क्रिया योग के अभ्यास से साधक के रोग प्रतिरोधक क्षमता में बुद्धि होती है। इससे शरीर कई तरह के रोग से लड़ने में सक्षम बनता है।
  4.  साधक परम सत्य को जानने में सक्षम होता है। मोह माया से परे हो जाता है।
  5.  ऐसे जातक अपने परमात्मा में ध्यान लगाने में सामर्थवान बनाता है। उसे सिद्धि मिलती है।
  6.  जातक शारीरिक बंधन से मुक्त होकर आत्मा व परमात्मा में भेद कर पाता है।
  7.  व्यक्तित्व का समग्र विकास होता है। ज्ञानी से साथ ही व तार्किक भी बनता है।
  8.  क्रिया योग (Kriya Yoga) साधक को उसके जीवन का उद्देश्य प्राप्त करने में सहयोग करता है।

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