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नाड़ी शोधन

नाड़ी शोधन (Nadi Shodhana) से अन्य अंगों में शुद्धि और रक्त का संचार होता है। नाड़ी शोधन और प्राणायाम में कुछ खास फर्क नहीं है। प्रदूषित वातावरण के चलते वर्तमान में प्राणायाम का अभ्यास हमारे प्राणों के लिए और अधिक आवश्यक हो गया है। इस लेख में हम आपको नाड़ी शोधन क्या है? नाड़ी में बाधा के कारण क्या हैं?, नाड़ी शोधन करने की विधि क्या है?, इसे करते समय किन बातों का ध्यान रखें और इसे करने से अभ्यासकर्ता को क्या लाभ मिलता है?, इसके बारे में जानेंगे। तो आइये नाड़ी शोधन के बारे में विस्तार से जानें -

नाड़ी शोधन क्या है?

नाड़ी हमारे शरीर में सूक्ष्म ऊर्जा संचरण मार्ग है जो कई कारणों के चलते बंद हो सकती है। नाड़ी शोधन प्राणायाम से हम इन नाड़ियों को सुचारु रूप से साँस लेने की एक ऐसी प्रक्रिया है जो इन ऊर्जा प्रणाली को साफ कर सुचारु रूप से संचालित करने में मदद करती है और इस प्रकार मन शांत होता है। इस क्रिया को अनुलोम विलोम प्राणायाम के नाम से भी जाना जाता है। इस प्राणायाम को हर उम्र के लोग कर सकते हैं।

नाड़ियों में बाधा का कारण

नाड़ी शोधन (Nadi Shodhana) क्रिया तब किया जाता है जब अभ्यासकर्ता की नाड़ियों में बाधा उत्पन्न हो जाए। ये बाधाएं कई कारणों से बंद हो सकती हैं। हम यहां इन्हीं में से कुछ के बारे में बताने जा रहे हैं -

  1. मानव शरीर में उपस्थित नाड़ियाँ तब बंद होती हैं जब जातक जरूरत से ज्यादा तनाव में हो। यह तनाव किसी भी कारण हो सकता है।
  2. यदि किसी कारण मानव शरीर में टॉक्सीक की मात्रा बढ़ जाए तो, नाड़ियों में रुकावटे आ जाती हैं। ऐसा इसलिए होता है कि ये विषैले कण हमारे शरीर को अधिक नुकसान न पहुंचा पाएं।
  3. नाड़ियां शारीरिक और मानसिक घात के कारण बंद हो सकती है। ऐसी कोई स्थिति जिससे व्यक्ति को गहरा शारीरिक व मानसिक आघात पहुंचा हो, ऐसे में यह बंद हो जाती है।
  4. अनियमित जीवन शैली भी नाड़ी बाधा के कारणों में से एक हैं।

नाड़ी शोधन करने की विधि

यहां हम आपके लिए नाड़ी शोधन क्रिया को कैसे करें, इसके बारे में जानकारी देने जा रहे हैं जो आपके लिए काफी लाभदायक साबित होगा।

नाड़ी शोधन शुरूआत आप प्राणायाम से कर सकते हैं। यह बहुत ही सरल क्रिया है। आप इस प्रक्रिया का अभ्यास प्रातःकाल में करने से साथ ही संध्या काल में भी कर सकते हैं। इसका अभ्यास आप अपने घर के गॉर्डन में कर सकते हैं। बात कुल मिलाकर शुद्ध वातावरण की ही है क्योंकि इसका अभ्यास शुद्ध वातावरण में ही करना चाहिए।

  1. पहले चरण में आपको किसी भी सुखासन में बैठकर अपने कमर को सीधा करके रखना है और अपने आँखें बंद कर लें।
  2. दूसरे चरण में अभ्यासकर्ता को अपने दाएँ हाथ के अँगूठे से दायीं नसिका बंद कर पूरी श्वास बाहर निकालें।
  3. तीसरे चरण में अभ्यासकर्ता को अपने बायीं नसिका से सांस को भरना है, अब हाथ की तीसरी अँगुली से अपनी बायीं नसिका को बंद करें। जितनी देर आप इस स्थिति में सांस को रोक सकते हैं, उतने समय तक रोक कर रखें।
  4. चौथे चरण में आपको अपने दायें नसिका से अंगूठा हटाकर सांस को जितना धीरे हो सके बाहर की ओर छोड़ें। फिर दायीं नसिका से सांस ले और इसे रोकें, फिर बायें नसिका के माध्यम से धीरे से निकाल दें।
  5. यहां प्रक्रिया का एक चक्र पूरा हुआ। इसे आपको 5 से 7 बार करना है।

नाड़ी शोधन करते समय बरते यें सावधानियाँ

नाड़ी शोधन (Nadi Shodhana) करना आपको जितना आसान लग रहा है इसे करते समय उतना ही सावधान भी रहना होगा। अन्यथा आप इससे परेशानी में भी पड़ सकते हैं। हम यहां कुछ सावधानियों के बारे में बता रहे हैं जो आपके लिए काफी सहायक होगा।

  1. सबसे जरूरी बात यह कि आपको नाड़ी शोधन प्रक्रिया करते समय अपने मुँह से श्वांस नहीं लेना है। ऐसा करने से आपको किसी भ तरह का लाभ नहीं मिलेगा।
  2. अभ्यासकर्ता को सांस लेते और छोड़ते समय अधिक बल का प्रयोग करने से बचना चाहिए। इसका बुरा असर आपको नसिका के नलिका पर पड़ सकता है।
  3. यदि आपको किसी तरह की सांस संबंधी परेशानी है तो सबसे पहले आपको अपने डॉक्टर से इस संबंध में बात करनी चाहिए। इसके साथ ही इसकी जानकारी आप अपने ट्रेनर को दें। इसके बाद ही प्राणायाम करें।
  4. इस क्रिया को करने से पहले कुछ भी ना खाएं। खाना खाने के तक़रीबन 2 से 3 घंटे बाद इसे करें।

नाड़ी शोधन के लाभ

नाड़ी शोधन प्रक्रिया का अभ्यास करने से व्यक्ति को कई तरह के लाभ मिलते हैं, जिनमें से हम कुछ के बारे में बता रहे हैं जो इस प्रकार हैं-

  1. नाड़ी शोधन करने से अभ्यासकर्ता की मस्तिष्क की कार्य करने की क्षमता में बृद्धि होती है।
  2. यह क्रिया करने से शरीर में उपस्थित विषैले तत्व बहार निकल जाते हैं। जिससे आपके सेहत में सुधार होता है।
  3. नाड़ी शोधन करने से रक्त का शुद्धिकरण होता है। जिससे रक्त में लाल रक्त कणिकाएं अधिक बनती है जो रक्त संचार में सुधार करता है।
  4. इस प्रक्रिया से अभ्यासकर्ता के श्वसन क्रिया में सुधार होता है। जिससे सांस संबंधी समस्याओं से राहत मिलता है।
  5. नाड़ी शोधन क्रिया को करने से तनाव,चिंता, अवसाद व अनिद्रा से मुक्ति मिलती है।
  6. नाड़ियों को स्वस्थ लाभ मिलता है साथ ही नेत्र ज्योति भी बढ़ती है।

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