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नरसिंह जंयती – जानें नृसिंह जयंती की व्रतकथा व पूजा विधि


नरसिंह जंयती – जानें नृसिंह जयंती की व्रतकथा व पूजा विधि

वैशाख का महीना बहुत ही पावन माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से इस माह का बहुत ही खास महत्व है। भगवान विष्णु के चौथे अवतार जो नरसिंह रूप में प्रकट हुए थे मान्यता है कि इसी माह में वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को अवतरित हुए थे। इसी कारण वैशाख मास की शुक्ल चतुर्दशी नृसिंह जयंती के रूप में मनाई जाती है। हिंदू धर्म के अनुयायि विशेषकर भगवान विष्णु के उपासक इस दिन उपवास भी रखते हैं। वर्ष 2017 में नृसिंह जयंती 9 मई को है। आइये जानते हैं नरसिंह जयंती पर व्रत कथा व पूजा विधि के बारे में।

नरसिंह अवतार की कथा

 बात बहुत समय पहले की है। महर्षि कश्यप और अदिति के दो पुत्र हुए हरिण्यक्ष और हरिण्यकश्यप (हरिण्यकशिपु)। दोनों बहुत ही शक्तिशाली से और असुरों के राजा थे। हरिण्यक्ष का बहुत आतंक बढ़ा तो भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर उसका वध कर दिया। अब अपने भाई के वध से क्रोधित हरिण्यकशिपु ने भगवान विष्णु से प्रतिशोध लेने की ठानी। हजारों साल तक कड़ा तप कर ब्रह्मा को प्रसन्न किया और उनसे अजेय होने का वरदान पाया और यह वरदान भी मांगा कि उसे कोई नर या पशु उसका वध न कर सके। ब्रह्मा से वरदान पाकर हरिण्यकशिपु निर्भय हो गया। अब उसने समस्त लोकों पर आक्रमण बोल दिया। स्वर्गलोक से देवताओं को निर्वासित कर दिया और अपना आधिपत्य जमा लिया। कोई उसे पराजित नहीं कर सकता था। हरिण्यकशिपु भगवान विष्णु से प्रतिशोध तो लेना ही चाहते थे उसने प्रजा को उनकी पूजा न करने का फरमान सुना दिया और कहा कि वह स्वयं भगवान है उसके अलावा कोई किसी को नहीं पूजेगा। एक बार हरिण्यकशिपु एक वट वृक्ष के नीचे तपस्या कर रहे थे तो देवगुरु बृहस्पति तोते का रूप धारण कर उस वृक्ष पर नारायण नारायण की रट लगाने लगे। इस ध्वनि से खिन्न होकर हरिण्यकशिपु अपनी तपस्या बीच में छोड़कर चले आये। जब पत्नी ने तप छोड़कर आने का कारण पूछा तो पूरा वृतांत कह सुनाया। हरिण्यकशिपु की पत्नी ने भी नारायण का जाप किया जिससे उसे गर्भ ठहर गया। अब जिस बालक ने जन्म लिया वह थे भक्त प्रह्लाद। अपने ही घर में विष्णु भक्त पैदा होने पर हरिण्यकशिपु बहुत दुखी थे। छल से बल से हर प्रपंच रचकर प्रह्लाद तो भगवत् भक्ति से विमुख करने के प्रयास किये लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। यहां तक उसे अपनी बहन होलिका के जरिये जीवित तक जलाना चाहा लेकिन प्रभु की कृपा से प्रह्लाद सकुशल थे और होलिका जल चुकी थी। अब तो हरिण्यकशिपु के क्रोध का ठिकाना नहीं था। वैशाख शुक्ल चतुर्दशी का ही दिन था जब पिता पुत्र में पुन: भगवान विष्णु को लेकर बहस हुई। हरिण्यकशिपु ने कहा कहां है तुम्हारा भगवान विष्णु बुलाओ उसे। तो प्रह्लाद शांत होकर बोले प्रभु तो सर्वत्र विद्यमान हैं, कण-कण में समाये हैं। इस पर प्रह्लाद का उपहास उड़ाते हुए कहा तो क्या इस स्तंभ में भी तुम्हारे भगवान मौजूद हैं। प्रह्लाद ने कहा हां कण-कण में मौजूद हैं तो इसमें भी निश्चित रूप से वे समाये हैं। हरिण्यकशिपु को क्रोध आ गया और उसने उस स्तंभ पर अपनी तलवार से वार किया। वार करते ही स्तंभ को चीरकर उसमें से नर एवं सिंह के संयुक्त रूप का एक प्राणी निकला जिसने अपने नख से हरिण्यकशिपु को चीर डाला। कहते हैं इसके पश्चात जब विष्णु के नरसिंह अवतार का क्रोध कम नहीं हुआ तो उन्हें शांत करने के लिये भगवान शिव को भी शरभावतार धारण करना पड़ा था।

नरसिंह जयंती व्रत पूजा विधि

नरसिंह जयंती का उपवास भी एकादशी उपवास के समान ही रखा जाता है। यह भी बहुत पुण्य फलदायी माना जाता है। इस दिन प्रात: काल उठकर स्नानादि से निबट कर साफ वस्त्र धारण करने चाहिये। चतुर्दशी को मध्याह्न के समय व्रती को संकल्प लेना चाहिये। सांयकाल के समय भगवान नृसिंह की पूजा अर्चना करनी चाहिये। रात्रि में जागरण करते हुए अगले दिन प्रात:काल भगवान नृसिंह व माता लक्ष्मी की मूर्ति का विसर्जन करना चाहिये। तत्पश्चात किसी योग्य ब्राह्मण या फिर किसी जरूरतमंद को दान करना चाहिये। फिर व्रत का पारण करना चाहिये। मान्यता है कि भगवान विष्णु इस व्रत से प्रसन्न होकर सांसारिक दु:खों से मुक्ति दिलाते हैं।  

नृसिंह जयंती तिथि व मुहूर्त

नृसिंह जयंती – 9 मई 2017

मध्याह्न संकल्प का समय – 10:57 से 13:37 बजे

नरसिंह जयंती सांयकाल पूजा समय – 16:17 से 18:57 बजे

पारण का समय – 05:37 बजे से सूर्योद्य के पश्चात  (10 मई 2017)

चतुर्दशी तिथि आरंभ – 23:16 बजे (08 मई 2017)

चतुर्दशी तिथि समाप्त – 01:07 बजे (10 मई 2017)

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