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निष्क्रमण संस्कार – हिंदू धर्म में छठा संस्कार है निष्क्रमण


निष्क्रमण संस्कार – हिंदू धर्म में छठा संस्कार है निष्क्रमण

हिंदू धर्म में जातक के जन्म से लेकर मृत्यु तक कई संस्कार किये जाते हैं। मुख्यत: सोलह संस्कार जीवन पर्यंत किये जाते हैं। पहला संस्कार गर्भधारण के दौरान किया जाता है तो अंतिम संस्कार अंत्येष्टि होता है। संस्कार आधारित लेखों में पांच संस्कारों के बारे में हमने बताया है जो गर्भधारण से लेकर जातक का नामकरण होने तक किये जाते हैं। नामकरण पांचवां संस्कार है इसके पश्चात आता है निष्क्रमण संस्कार। यह संस्कार तब आयोजित किया जाता है जब जातक को पहली बार घर से बाहर निकाला जाता है। निष्क्रमण का अर्थ ही बाहर निकालना होता है। आइये जानते हैं इस संस्कार के बारे में।

निष्क्रमण संस्कार का महत्व

हिंदू धर्म में किये जाने वाले सभी संस्कारों का अपना खास महत्व होता है। इन संस्कारों का उद्देश्य जातक में सद्गुणों का संचार करना तो होता ही है साथ ही जातक के बेहतर स्वास्थ्य की कामना भी होती है। कुछ संस्कार आध्यात्मिक रूप से जुड़े होते हैं। निष्क्रमण संस्कार जातक के स्वास्थ्य व उसकी दीर्घायु की कामना के लिये किया जाता है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णन भी मिलता है कि

“निष्क्रमणादायुषो वृद्धिरप्युदृष्टा मनीषिभि:”

कब किया जाता है निष्क्रमण संस्कार

निष्क्रमण संस्कार जातक के जन्म के चौथे मास में किया जाता है। मान्यता है कि जातक के जन्म लेते ही घर में सूतक लग जाता है। जन्म के ग्याहरवें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है हालांकि यह कुछ लोग 100वें दिन या जातक के जन्म के एक वर्ष के उपरांत भी करते हैं। लेकिन जन्म के कुछ दिनों तक बालक को घर के बाहर नहीं निकाला जाता। माना जाता है कि इस समय जातक को सूर्य के प्रकाश में नहीं लाना चाहिये क्योंकि इससे जातक के स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ सकता है, विशेषकर आंखों को नुक्सान पंहुचने की संभावनाएं अधिक होती हैं। इसलिये जब जातक शारीरिक रूप से स्वस्थ हो जाये तो ही उसे घर से बाहर निकालना चाहिये यानि निष्क्रमण संस्कार करना चाहिये।

निष्क्रमण संस्कार की विधि

जैसा कि इस संस्कार का तात्पर्य भी है बाहर निकालना तो सबसे मुख्य काम तो इस संस्कार के दौरान यही किया जाता है कि इसमें जातक को घर से बाहर निकाला जाता है व सूर्य देवता के दर्शन करवाये जाते हैं। जब बच्चे का स्वास्थ्य इस काबिल हो जाता है कि उसकी समस्त दसों इंद्रियां (पांच ज्ञानेंद्रियां व पांच कर्मेन्द्रियां) अच्छे से काम करने लगे व धूप हवा आदि को सहन कर सकें तो ऐसे में सूर्य, चंद्रमा एवं अन्य देवी-देवताओं का पूजन कर शिशु को सूर्य व चंद्रमा के दर्शन करवाये जाते हैं। इस संस्कार से संबंधित निम्न मंत्र भी अथर्ववेद में मिलता है –

शिवे ते स्तां द्यावापृथिवी असंतापे अभिश्रियौ।

शं ते सूर्य आ तपतुशं वातो वातु ते हृदे।

शिवा अभि क्षरन्तु त्वापो दिव्या: पयस्वती:।।

इसका अभिप्राय है कि बालक के निष्क्रमण के समय देवलोक से लेकर भू लोक तक कल्याणकारी, सुखद व शोभा देने वाला रहे। सूर्य का प्रकाश शिशु के लिये कल्याणकारी हो व शिशु के हृद्य में स्वच्छ वायु का संचार हो। पवित्र गंगा यमुना आदि नदियों का जल भी तुम्हारा कल्याण करें।

निष्क्रण संस्कार के दिन प्रात:काल उठकर तांबे के एक पात्र में जल लेकर उसमें रोली, गुड़, लालपुष्प की पंखुड़ियां आदि का मिश्रण करें व इस जल से सूर्यदेवता को अर्घ्य देते हुए बालक को आशीर्वाद देने के लिये उनका आह्वान करें। संस्कार के प्रसाद में सबसे पहले गणेश जी, गाय, सूर्यदेव, व अपने पितरों, कुलदेवताओं आदि के लिये भोजन की थाली अलग से निकाल लें। संस्कार क्रिया के पश्चात लाल बैल को सवा किलो गेंहू व सवा किलो गुड़ भी खिलाना चाहिये। सूर्यास्त के समय ढ़लते सूरज को भी प्रणाम कर शिशु को आशीर्वाद देने के लिये सूर्य देवता का धन्यवाद करना चाहिये। इस पश्चात चंद्रमा के दर्शन भी विधिपूर्वक करवाने चाहिये।

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