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पौष अमावस्या – 12 साल बाद बन रहा है अद्भुत संयोग!


पौष अमावस्या – 12 साल बाद बन रहा है अद्भुत संयोग!

धार्मिक दृष्टि से पौष मास का बहुत ही खास महत्व होता है। इस माह में अक्सर सूर्य धनु राशि में विचरण करते हैं। इस कारण आध्यात्मिक उन्नति के लिये बहुत ही अच्छा माना जाता है जबकि खर मास होने के कारण शुभ कार्यों को इस माह में नहीं किया जाता। इसी कारण पौष मास की अमावस्या भी बहुत खास हो जाती है। कई बार कुंडली में कालसर्प दोष, पितृदोष आदि संयोग भी जातकों के लिये बन जाते हैं जो कि जातक के जीवन में सफलता के आड़े भी आते हैं। इसलिये इनके उपाय के लिये अमावस्या की तिथि श्रेष्ठ मानी जाती है। पौष अमावस्या के दिन स्नान दान आदि का विशेष महत्व माना जाता है।


12 साल बाद पौष मास में आई है सोमवती अमावस्या

पौष अमावस्या का संयोग प्रत्येक वर्ष बड़ा ही दुर्लभ है। किसी वर्ष में पौष मास की दो-दो अमावस्याएं होती है जैसे की 2016 में जनवरी व दिसंबर माह में पौष अमावस्या की तिथि पड़ी तो वहीं किसी किसी वर्ष पौष अमावस्या का संयोग बनता ही नहीं है। साल 2015 में पौष अमावस्या की तिथि का संयोग बना ही नहीं। उस पर भी सोमवती अमावस्या का संयोग तो और भी दुर्लभ हो जाता है। 2017 में सोमवार के दिन पौष अमावस्या की तिथि 12 साल के बाद पड़ रही है। इससे पहले 2005 में 10 जनवरी को सोमवार के दिन पौष मास में सोमवती अमावस्या थी इसी साल में दूसरी अमावस्या 31 दिसंबर को शनिवार के दिन थी। अत: 2017 में पौष सोमवती अमावस्या का संयोग बहुत ही शुभ फलदायी है। अंग्रेजी कलेंडर के अनुसार पौष अमावस्या इस वर्ष 18 दिंसबर को सोमवार के दिन है।


2018 में नहीं है पौष अमावस्या

यदि पौष अमावस्या को आपको कोई विशेष उपाय करना है तो इसी वर्ष कर लें अन्यथा इसके लिये आपको एक साल का लंबा इंतजार करना पड़ेगा क्योंकि 2018 में पौष अमावस्या की तिथि नहीं पड़ेगी। 2017 की सोमवती अमावस्या के बाद अगली अमावस्या पौष अमावस्या 2019 में 5 जनवरी व 26 दिसबंर दो बार इस अमावस्या का योग बनेगा। लेकिन पौष मास की सोमवती अमावस्या के लिये आपको अगले सात सालों तक इंतजार करना पड़ेगा। इसके बाद पौष सोमवती अमावस्या 30 दिसंबर 2024 को होगी।


सोमवती अमावस्या की व्रत कथा

वैसे तो सोमवती अमावस्या की कई कथाएं लोक में प्रचलित मिलती हैं लेकिन जिसे अक्सर सोमवती अमावस्या के दिन व्रती महिलाएं सुनती हैं वह कथा कुछ इस प्रकार है। बहुत समय पहले की बात है किसी गांव में एक गरीब ब्राह्मण परिवार रहता था। ब्राह्मण की एक कन्या भी थी। कहते हैं लड़कियां बेल की तरह बढ़ती हैं और कब बड़ी हो जाती हैं पता ही नहीं चलता। लड़की जवान होने लगी तो माता-पिता को विवाह की चिंता भी सताने लगी। घर की आर्थिक हालात कुछ खास थी नहीं फिर भी हाथ तो पीले करने ही थे। लेकिन प्रभु की मर्जी की कोई रिश्ता लड़की के लिये नहीं मिल रहा था। ब्राह्मण था तो पूरा भक्त लेकिन भगवान जाने किस जन्म के कर्मों की सजा दे रहे थे जो इतनी दरिद्रता और चिंता में उसे डाल रखा था। लेकिन कहते हैं कि उसके घर देर है अंधेर नहीं एक दिन एक साधु उनके यहां आ पंहुचे। सामर्थ्य अनुसार साधु की आवभगत की साधु तो प्रेम के ही भूखे होते हैं प्रसन्न हो गये साथ ही भक्त की परेशानी को भी भांप लिया और चिंता का कारण पूछा। ब्राह्मण ने अपनी समस्या बता दी। साधु ने पुत्री को पास बुलाया। लड़की को देखा और अपनी आंखे बंद कर ली कुछ देर बाद आंखे खोली तो बोले कि इसके भाग्य में तो विवाह के योग ही नहीं है। ब्राह्मण बोले हे साधु महाराज जब आपने समस्या बताई है तो कोई न कोई समाधान भी अवश्य होगा। साधु बोले समाधान तो है पर क्या आपकी पुत्री वह कर पायेगी इसमें मुझे संदेह है। ब्राह्मण बोले महाराज आप उपाय बतायें, मैं आपसे कहता हूं वह हर संभव प्रयास करेगी। वह बड़ी नेकदिल और धर्म परायण लड़की है। साधु महाराज बोले तो सुनो यहां से कुछ दूर सोना नाम की एक महिला अपने परिवार के साथ रहती है यदि यह लड़की उसे प्रसन्न कर आशीर्वाद स्वरूप उसकी मांग का सिंदूर उससे ले सके तो इसका भाग्य बदल सकता है। पिता ने लड़की को यह बात बता दी। अब लड़की नित्य सोना के घर जाती और किसी के जागने से पहले ही घर का सारा कामकाज निपटा कर घर लौट आती। उधर सोना हैरान की बहु को अचानक क्या हुआ उठती हूं तो सारा काम किये मिलती है। बहु सोचती कि सास को क्या हो गया है हमारे उठने से पहले ही सारा काम निपटा देती है। एक दिन दोनों ने पूछ ही लिया तो पता चला कि कोई ओर ही है जो इसे अंजाम दे रहा है। फिर क्या था पहरा शुरु हो गया। ब्राह्मण की लड़की जैसे ही घर आई सोना ने उसे पकड़ लिया और पूछा कि माजरा क्या है। इतनी मेहनत कर रही हो कोई न कोई वजह तो जरुर होगी। तब लड़की ने अपनी पीड़ा उसे बता दी। सोना थी थोड़े कठोर स्वभाव की लेकिन अंदर से बिल्कुल कोमल, सच्ची भक्त, धर्म पर डटी रहने वाली, पतिव्रता स्त्री थी। उसने उसकी मदद के लिये आशीर्वाद स्वरूप अपना सिंदूर दे दिया। वह दिन था सोमवती अमावस्या का। अब हुआ यूं कि सोना के सिंदूर देते ही उसके पति की तबीयत खराब हो गई। सोना निर्जला थी दौड़ी-दौड़ी पीपल के पेड़ के पास पंहुची और हाथ जोड़कर परिक्रमा करने लगी। अर्पित करने के लिये कुछ था नहीं तो कुछ कंकर जमा किये और उन्हें ही अर्पित करने लगी। जैसे ही सोना ने 108 परिक्रमा पूरी की, पति की चेतनता लौटने लगी। मान्यता है कि उस दिन से सोमवती अमावस्या का महत्व और अधिक बढ़ गया। सोना के आशीर्वाद से ब्राह्मण की लड़की का भाग्य भी बदल गया और उसे एक योग्य वर मिला जिसके साथ वह सुख पूर्वक रहने लगी। बेटी की चिंता से मुक्त होकर ब्राह्मण परिवार भी सुखमय जीवन व्यतीत करने लगा।

इस प्रकार सोमवती अमावस्या का महात्म्य बहुत ही अधिक है।


सोमवती अमावस्या व्रत व पूजा विधि

जैसा कि उपरोक्त कहानी में बताया गया है। इस व्रत में विवाहित स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु के लिये पीपल के वृक्ष की पूजा करती हैं। 108 की मात्रा में सामर्थ्य अनुसार जो भी अर्पित कर सकती हैं करना चाहिये। मौन रहकर यह व्रत किया जाये तो बहुत अच्छा माना जाता है अन्यथा अपने मुख से इस दिन कोई अपशब्द, किसी के लिये भला बुरा बिल्कुल भी नहीं कहना चाहिये। पवित्र तीर्थ स्थल अथवा नदी में स्नान करने का भी इस दिन बहुत महत्व होता है। पीपल को अर्पित की जाने वाली सामग्री को किसी जरुरतमंद, कन्या अथवा योग्य ब्राह्मण को दान देना चाहिये।

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