
क्या आपने कभी सोचा है कि आपके जीवन में आने वाली खुशियां और कठिनाइयां किस वजह से होती हैं? क्या इसके पीछे सिर्फ मेहनत और संयोग ही काम करते हैं, या फिर ग्रहों की भी कोई भूमिका होती है? ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, हमारे जीवन में होने वाली हर छोटी-बड़ी घटना का संबंध नौ ग्रहों (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु) से होता है। ये ग्रह हमारी जन्म कुंडली में स्थित होकर हमारे भाग्य, करियर, रिश्ते और स्वास्थ्य तक को प्रभावित करते हैं।
अब सवाल यह उठता है कि ग्रह कब शुभ फल देते हैं और कब अशुभ? क्या किसी ग्रह की अशुभ स्थिति को ठीक किया जा सकता है? कौन से ज्योतिषीय नियम यह तय करते हैं कि ग्रह हमारे लिए अनुकूल हैं या प्रतिकूल? अगर आप भी इन सवालों के जवाब जानना चाहते हैं, तो इस लेख में आपको ज्योतिष शास्त्र के 10 महत्वपूर्ण नियम बताए जाएंगे, जिनसे आप समझ सकेंगे कि कौन से ग्रह आपको सफलता देंगे और किन ग्रहों से सतर्क रहने की जरूरत है। तो चलिए, जानते हैं विस्तार से!
इस लेख में हम आपको बताएंगे कि ग्रह कब शुभ और कब अशुभ फल देते हैं और ज्योतिष शास्त्र के वे 10 महत्वपूर्ण नियम, जिनके आधार पर ग्रहों के प्रभाव को समझा जा सकता है।
1. ग्रह अपनी उच्च राशि, स्वगृही या मित्र ग्रह की राशि में शुभ फल देते हैं
यदि कोई ग्रह अपनी उच्च राशि में स्थित हो या स्वगृही (अपनी खुद की राशि) में हो, तो वह बेहद शुभ फल देता है। इसके अलावा, यदि ग्रह अपने मित्र ग्रह की राशि में स्थित हो, तो यह जातक को सकारात्मक परिणाम देता है।
उदाहरण:
बुध कन्या राशि में उच्च का होता है, इसलिए यह शुभ फल देता है।
गुरु कर्क राशि में उच्च का होता है और सौभाग्य, ज्ञान व समृद्धि देता है।
लेकिन यदि ग्रह नीच राशि या शत्रु ग्रह की राशि में स्थित हो, तो यह जातक के जीवन में बाधाएं उत्पन्न करता है।
उदाहरण:
शुक्र कन्या राशि में नीच का होता है, जिससे विवाह, प्रेम और आर्थिक स्थिति में समस्याएं आती हैं।
सूर्य तुला राशि में नीच का होता है, जिससे आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता कमजोर हो सकती है।
2. ग्रह अपनी राशि को देख रहे हों तो शुभ फल देते हैं
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, यदि कोई ग्रह कुंडली में ऐसी स्थिति में हो कि वह अपनी स्वयं की राशि को देखता हो, तो वह उस राशि से संबंधित भावों को शुभ फल देता है।
उदाहरण:
यदि शनि मकर राशि में हो और कुंडली में ऐसा स्थान रखता हो कि वह अपनी राशि को देखे, तो जातक को दृढ़ निश्चय और अनुशासन का लाभ मिलेगा।
इसी तरह, यदि गुरु धनु राशि में हो और अपनी ही राशि को देख रहा हो, तो यह शिक्षा और आध्यात्मिकता में सफलता देता है।
3. मित्र ग्रहों के साथ बैठने पर ग्रह शुभ फल देते हैं
अगर कोई ग्रह अपने मित्र ग्रह के साथ बैठा हो, तो यह शुभ परिणाम देता है।
उदाहरण:
शुक्र और बुध आपस में मित्र हैं। यदि दोनों ग्रह एक साथ बैठे हों, तो यह बुद्धि और सौंदर्य में वृद्धि करता है।
गुरु और चंद्रमा की युति शुभ मानी जाती है और इसे गजकेसरी योग कहा जाता है, जो समृद्धि और सफलता प्रदान करता है।
लेकिन यदि कोई ग्रह अपने शत्रु ग्रह के साथ बैठा हो, तो यह अशुभ प्रभाव देता है।
उदाहरण:
शनि और सूर्य शत्रु ग्रह माने जाते हैं। अगर कुंडली में ये दोनों ग्रह साथ बैठे हों, तो व्यक्ति के करियर में बाधाएं आ सकती हैं।
4. ग्रह अपनी नीच राशि से उच्च राशि की ओर जाए तो शुभ फल देते हैं
अगर कोई ग्रह अपनी नीच राशि से निकलकर उच्च राशि की ओर जाता है, और वक्री अवस्था में नहीं होता, तो यह शुभ फल देने लगता है।
उदाहरण:
यदि शनि मेष राशि (नीच) से निकलकर वृषभ राशि की ओर बढ़े, तो जातक के जीवन में सुधार होने लगेगा।
यदि गुरु मकर (नीच) से निकलकर कुंभ राशि की ओर जाए, तो ज्ञान और धन में वृद्धि होती है।
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5. त्रिकोण भावों के स्वामी ग्रह शुभ फल देते हैं
कुंडली में 1st, 5वें और 9वें (त्रिकोण भाव) बहुत शुभ माने जाते हैं। यदि इन भावों का स्वामी ग्रह लग्नेश का मित्र हो, तो यह हमेशा शुभ फल देता है।
उदाहरण:
यदि गुरु पंचम भाव (5वें house) या नवम भाव (9वें house) का स्वामी हो और लग्नेश का मित्र हो, तो जातक को धन और सम्मान की प्राप्ति होती है।
यदि शुक्र 9वें भाव का स्वामी हो और कुंडली में शुभ स्थिति में हो, तो यह भाग्य और धन में वृद्धि करता है।
6. क्रूर भावों के स्वामी ग्रह अशुभ होते हैं
कुंडली में 3rd, 6वें और 11वें भाव (क्रूर भाव) माने जाते हैं। यदि कोई ग्रह इन भावों का स्वामी हो, तो यह सामान्यतः अशुभ फल देता है।
उदाहरण:
यदि मंगल 6वें भाव का स्वामी हो, तो व्यक्ति को कोर्ट-कचहरी, ऋण और शत्रुओं से परेशानी हो सकती है।
यदि शनि 11वें भाव का स्वामी हो, तो यह देरी से सफलता देता है।
7. अशुभ भावों में स्थित ग्रह परेशानी देते हैं
यदि कोई ग्रह 6वें, 8वें या 12वें भाव में स्थित हो, तो यह जातक को कष्ट देता है।
उदाहरण:
यदि सूर्य 8वें भाव में हो, तो व्यक्ति को पिता से संबंधों में तनाव हो सकता है।
यदि शुक्र 12वें भाव में हो, तो यह अनावश्यक खर्च और वैवाहिक जीवन में समस्याएं दे सकता है।
8. चंद्रमा की स्थिति शुभ हो तो जीवन सुखी होता है
कुंडली में चंद्रमा जितना मजबूत होगा, जीवन उतना ही सुखी होगा। चंद्रमा के पास जितने ज्यादा शुभ ग्रह होंगे, यह उतना ही शुभ फल देगा।
उदाहरण:
यदि चंद्रमा गुरु के साथ हो, तो यह व्यक्ति को धन और मानसिक शांति देता है।
लेकिन यदि चंद्रमा राहु या शनि के साथ हो, तो यह मानसिक तनाव और अस्थिरता ला सकता है।
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9. सूर्य के निकट आने से ग्रह अस्त हो जाते हैं
जब कोई ग्रह सूर्य के बहुत पास आ जाता है, तो वह ग्रह अस्त (Combust) हो जाता है और अपनी शक्ति खो देता है।
उदाहरण:
यदि शुक्र अस्त हो, तो विवाह और प्रेम संबंधों में दिक्कतें आती हैं।
यदि गुरु अस्त हो, तो शिक्षा और आध्यात्मिक ज्ञान प्रभावित होता है।
10. बुध, राहु और केतु तटस्थ ग्रह होते हैं
बुध, राहु और केतु जिस ग्रह के साथ होते हैं, उसी के अनुसार फल देते हैं।
उदाहरण:
यदि बुध गुरु के साथ हो, तो यह विद्या और बुद्धिमत्ता में वृद्धि करता है।
यदि राहु मंगल के साथ हो, तो यह आक्रामकता और दुर्घटनाओं का कारण बन सकता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ग्रहों की स्थिति और उनके प्रभाव को समझना बहुत जरूरी है। कुंडली में ग्रहों की शुभ स्थिति सुख-समृद्धि लाती है, जबकि अशुभ स्थिति समस्याओं को जन्म देती है। यदि आपकी कुंडली में किसी ग्रह की स्थिति अशुभ हो, तो सही उपाय करके उसका प्रभाव कम किया जा सकता है।
अगर आप कोई ज्योतिषीय सलाह प्राप्त करना चाहते हैं या किसी समस्या का उपाय जानना चाहते हैं तो आप एस्ट्रोयोगी के विशेषज्ञ ज्योतिषियों से संपर्क कर सकते हैं। आपके लिए पहली कॉल या चैट बिलकुल मुफ्त है।