मां सरस्वती

हिंदू धर्म में ज्ञान, संगीत, कला की देवी के रूप में मां सरस्वती की पूजा की जाती है। उन्हें त्रिदेवी के रूप में पूजा जाता है। देवी के रूप में सरस्वती (Goddess Sarswati) का सबसे पहला उल्लेख ऋग्वेद में है। मां सरस्वती पश्चिम और मध्य भारत के जैन धर्म के विश्वासियों द्वारा भी पूजनीय हैं, साथ ही साथ कुछ बौद्ध संप्रदाय के लोग भी उनकी पूजा करते हैं। ऋग्वेद में वह एक नदी का प्रतिनिधित्व करती हैं और देवता उसकी अध्यक्षता करते हैं। सरस्वती शक्ति और बुद्धिमत्ता का प्रतिनिधित्व करती हैं, जिससे संगठित निर्माण कार्य आगे बढ़ता है।

मां सरस्वती अज्ञान के अंधकार को मिटाने वाली देवी हैं। इसलिए उन्हें हमेशा श्वेत रंग में दर्शाया गया है। चूंकि वह सभी विज्ञानों, कलाओं, शिल्पों और कौशल का प्रतिनिधित्व करती है। वह ज्ञान में रुचि रखने वाले सभी व्यक्तियों, विशेष रूप से छात्रों, शिक्षकों, विद्वानों और वैज्ञानिकों द्वारा पूजी जाती हैं। 

 

मां सरस्वती के नाम का अर्थ क्या है?

सर मतलब सार, स्व मतलब स्वयं जिसका शाब्दिक अर्थ है स्वयं का सार और सरस्वती का अर्थ है "वह जो सार की ओर जाता है" आत्म ज्ञान ”। यह सुरसा-वती (सुरस-वति) का एक संस्कृत मिश्रित शब्द भी है जिसका अर्थ है "पानी से भरपूर"।

देवी सरस्वती के अन्य नाम

प्राचीन हिंदू साहित्य में सरस्वती को कई नामों से जाना जाता है। उनके नाम का शाब्दिक अर्थ है, जो बहता है, जिसे विचारों, शब्दों या नदी के प्रवाह पर लागू किया जा सकता है। वह ऋग्वेद में एक नदी के देवी हैं। उनके अन्य नामों में शारदा (सार की दाता), ब्राह्मणी (विज्ञान की देवी), ब्राह्मी (ब्रह्मा की पत्नी), महाविद्या (परम ज्ञान की धारक), भारती (वाक्पटुता), भारदी (इतिहास की देवी), वाणी और वाची, वर्णेश्वरी (अक्षरों की देवी), कविजविग्रहवासिनी (कवियों की जीभ पर वास करने वाली), महा-विद्या (पारलौकिक ज्ञान), आर्या (श्रेष्ठ व्यक्ति), महा-वाणी (पारलौकिक शब्द), कामधेनु (जैसे इच्छा पूरी करने वाली गाय), धनेश्वरी (धन की दिव्यता), और वागेश्वरी (वाणी की मालकिन)। 

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मां सरस्वती का जन्म कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब ब्रह्मा ने ब्रह्मांड की रचना की उसके बाद उन्हें इसमें रूप, अवधारणा और वाणी का अभाव लगा। उन्होंने सृ्ष्टि को व्यवस्थित बनाने के लिए अपने मुख से देवी सरस्वती को प्रकट किया और उन्हें आदेश दिया कि वह ब्रह्मांड में वाणी, ध्वनि, ज्ञान और चेतना का संचार करें। एक पौराणिक कथानुसार, एक बार गंधर्व देवता ने देवताओं से सोम रस का पौधा चुरा लिया था जिसकी वजह से देवता काफी परेशान हो गए थे। तब मां सरस्वती ने उन्हें वचन दिया था कि वह बिना युद्ध के पौधा वापस ले आएंगी। ठीक ऐसा ही हुआ वह गंधर्वों के बगीचे में गई और अपनी वीणा से विभिन्न तरह का संगीत पैदा कर दिया। जिसे सुनकर गंधर्व मंत्रमुग्ध हो गए उन्होंने सरस्वती माता से यह संगीत सीखने का आवेदन किया। तब सरस्वती ने उनसे सोम रस का पौधा दक्षिणा के रूप में लिया और उन्हें वीणा से संगीत सिखाया। 

देवी सरस्वती का स्वरूप 

आमतौर पर तस्वीरों में सरस्वती माता को सफेद परिधान पहने हुए और कमल पर विराजमान देखा गया है। उनका सफेद कमल प्रकाश, ज्ञान और सच्चाई का प्रतीक है। चित्र में उनके चार हाथ दिखाए गए हैं, जिनमें से दो हाथों से वह वीणा पकड़े हुए हैं और एक में अमला की माला और दूसरे में पुस्तक धारण किए हुए हैं। वह वीणा के जरिए हमें ललित कलाओं के बारे में बताती हैं और अमला का माला तपस (तपस्या), ध्यान और जप (दिव्य नाम की पुनरावृत्ति) सहित सभी आध्यात्मिक विज्ञान या योग का प्रतीक है। बाएं हाथ में पुस्तक और दाहिने हाथ में माला धारण करके वह स्पष्ट रूप से हमें सिखा रही है कि आध्यात्मिक विज्ञान धर्मनिरपेक्ष विज्ञान की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है।

इसके अलावा तस्वीर में आपको मोर और हंस भी नजर आता है। जहां मोर वास्तव में अविद्या का प्रतीक है वहीं दूसरी ओर हंस, जो पानी से दूध को अलग करने की अजीबोगरीब शक्ति का अधिकारी माना जाता है, का अर्थ विवेक (ज्ञान, विवेक) है।

 

मां सरस्वती को प्रसन्न करने के उपाय

  • बुद्धि और वाणी की देवी को प्रसन्न करने के लिए हर साल हम बसंतपंचमी का पर्व मनाते हैं। जिस दिन हम पीले वस्त्र पहनकर मां की पूजा करते हैं।

  • इस दिन मां सरस्वती की तस्वीर या मूर्ति पर रोली, केसर, हल्दी, अक्षत और फूल अर्पित करते हैं।

  • इसके बाद घी का दीपक जलाकर उनकी आरती के साथ उनकी पूजा करते हैं और आशीर्वाद लेते हैं। 

  • मां शारदा को भोग के रूप में पीली मिठाई अर्पित करते हैं। 

  • इसके अलावा सद्बुद्धि और मधुर वाणी के लिए मां सरस्वती मंत्र ऊँ ऐं सरस्वत्यै नम:  का उच्चारण भी करते हैं।

  • यदि आपको इन सब उपायों के बाद भी देवी शारदा की कृपा प्राप्त नहीं हो रही है तो आपको किसी अनुभवी ज्योतिषाचार्य से अपनी राशिनुसार पूजा विधि जानकर पूजा-अर्चन करना चाहिए।

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