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Hariyali Teej Katha: सावन का महीना हिन्दू धर्म में बहुत विशेष महत्व रखता है। इस दौरान कई महत्वपूर्ण तीज-त्योहार मनाए जाते हैं, जिनमें हरियाली तीज भी शामिल है। यह पर्व महिलाओं के लिए बहुत खास होता है। हरियाली तीज को केवल एक त्योहार के रूप में नहीं बल्कि प्रेम, समर्पण और अखंड सौभाग्य के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि इस त्योहार को मनाने का वास्तविक कारण क्या है? और इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती का स्मरण क्यों किया जाता है?
तो चलिए आज हरियाली पर्व की पौराणिक कथा जानते हैं और समझते हैं कि इसका असली महत्व क्या है ?
हरियाली तीज की कथा माता पार्वती की अटूट श्रद्धा, प्रेम और दृढ़ संकल्प की कहानी है। यह कथा बताती है कि सच्ची भक्ति और समर्पण के बल पर असंभव प्रतीत होने वाली इच्छाएं भी पूरी हो सकती हैं। ऐसी मान्यता है कि इसी दिन माता पार्वती को भगवान शिव पति के रूप में प्राप्त हुए थे। इसलिए हरियाली तीज का व्रत विशेष रूप से सुहाग और वैवाहिक सुख से जुड़ा हुआ माना जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती पर्वतराज हिमवान और माता मैना की पुत्री थीं। बचपन से ही उनके मन में भगवान शिव के प्रति गहरा प्रेम और श्रद्धा थी। वे शिवजी को ही अपने पति के रूप में प्राप्त करना चाहती थीं।
एक दिन देवर्षि नारद राजा हिमवान के महल में पहुंचे। उन्होंने पार्वती की जन्म कुंडली का अध्ययन किया और राजा हिमवान से कहा कि उनकी पुत्री के लिए भगवान विष्णु अत्यंत योग्य वर हैं। भगवान विष्णु के गुणों और महिमा को सुनकर राजा हिमवान बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने की इच्छा जताई।
लेकिन जब माता पार्वती को इस बात का पता चला, तो वे बहुत दुखी हो गईं। उनका मन केवल भगवान शिव को ही पति के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार था। वे किसी और से विवाह करने की कल्पना भी नहीं कर सकती थीं। अपनी इच्छा पूरी करने के लिए उन्होंने कठोर तपस्या करने का निश्चय किया।
भगवान शिव को पाने के संकल्प के साथ माता पार्वती चुपचाप घर छोड़कर घने वन में चली गईं। वहां उन्होंने एकांत में रहकर भगवान शिव की आराधना शुरू की। उन्होंने सुख-सुविधाओं का त्याग कर कठिन तप और व्रत का मार्ग अपनाया।
कथा के अनुसार, श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन माता पार्वती ने नदी के किनारे बालू से एक शिवलिंग का निर्माण किया। उन्होंने पूरी श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान शिव की पूजा की तथा उनसे पति रूप में स्वीकार करने की प्रार्थना की।
उनकी तपस्या इतनी कठोर थी कि उन्होंने कई वर्षों तक भोजन और जल का त्याग कर दिया। दूसरी ओर, जब माता पार्वती घर नहीं लौटीं तो राजा हिमवान और माता मैना बहुत चिंतित हो गए। उन्होंने अपनी पुत्री की खोज में अनेक लोगों को भेजा। कहा जाता है कि उनकी तलाश में धरती से लेकर पाताल तक खोज की गई, लेकिन पार्वती अपनी साधना में लीन रहीं।
माता पार्वती की अटूट भक्ति, समर्पण और कठिन तपस्या से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। वे उनके सामने प्रकट हुए और उनकी मनोकामना जानकर उन्हें वरदान दिया कि वे उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार करेंगे।
भगवान शिव के दर्शन पाकर माता पार्वती की वर्षों की तपस्या सफल हो गई। इसके बाद वे अपने पिता के पास लौटीं और स्पष्ट रूप से कहा कि वे केवल भगवान शिव से ही विवाह करेंगी। अपनी पुत्री की मजबूत इच्छा और भगवान शिव की प्रसन्नता को देखकर राजा हिमवान भी प्रसन्न हुए।
इसके पश्चात भगवान शिव और माता पार्वती का विधिपूर्वक विवाह संपन्न हुआ। यह दिव्य मिलन प्रेम, विश्वास और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। हरियाली तीज का पर्व इसी पावन घटना की स्मृति में मनाया जाता है और इसे शिव-पार्वती के पुनर्मिलन का उत्सव भी कहा जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो महिलाएं हरियाली तीज का व्रत श्रद्धापूर्वक रखती हैं और इस कथा का श्रवण या पाठ करती हैं, उन्हें माता पार्वती और भगवान शिव का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है।
हरियाली तीज का व्रत हिंदू धर्म में बहुत फलदायी माना जाता है। यह त्योहार माता पार्वती और भगवान शिव के अटूट प्रेम तथा समर्पण का प्रतीक है। इसी कारण सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से यह व्रत रखती हैं। श्रद्धा और विधि-विधान से किया गया यह व्रत दांपत्य जीवन में प्रेम, विश्वास और खुशहाली बनाए रखने में सहायक होता है।
वहीं अविवाहित कन्याएं भी माता पार्वती की तरह योग्य और मनचाहा जीवनसाथी प्राप्त करने की इच्छा से हरियाली तीज का व्रत करती हैं। ऐसा माना जाता है कि माता पार्वती की कृपा से उनकी विवाह संबंधी मनोकामनाएं पूर्ण हो सकती हैं।
यह पर्व सावन के महीने में आता है, जब प्रकृति हरियाली की चादर ओढ़ लेती है। चारों ओर फैली हरियाली, ठंडी फुहारें और सुहावना मौसम इस त्योहार की सुंदरता को और बढ़ा देते हैं। यही कारण है कि इसे "हरियाली तीज" कहा जाता है।
कई महिलाएं इस दिन निर्जला व्रत भी रखती हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से यह व्रत आत्मसंयम, धैर्य, भक्ति और ईश्वर के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है। यह व्यक्ति को मानसिक रूप से मजबूत बनाने के साथ-साथ सकारात्मक ऊर्जा से भी भर देता है।
हरियाली तीज पर माता पार्वती और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करने के साथ-साथ अपने जीवन से जुड़े सवालों के जवाब भी जानें। प्रेम, विवाह, करियर या पारिवारिक जीवन से जुड़ी किसी भी चिंता के लिए अभी एस्ट्रोयोगी के विशेषज्ञ ज्योतिषियों से बात करें।