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Neel Saraswati Stotram: नीलसरस्वती स्तोत्रम् एक अत्यंत प्रभावशाली भजन है, जो देवी सरस्वती को समर्पित है। देवी सरस्वती ज्ञान, विद्या, संगीत और कला की अधिष्ठात्री हैं। इस स्तोत्र के पाठ से मन में शांति, एकाग्रता और बौद्धिक क्षमता का विकास होता है। विद्यार्थी, कलाकार और शोधकर्ता इसे विशेष रूप से करते हैं ताकि उनकी सीखने की शक्ति, स्मरणशक्ति और रचनात्मकता में वृद्धि हो। नीलसरस्वती स्तोत्र का नियमित जाप जीवन में सफलता, मानसिक संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा लाता है। यह स्तोत्र न केवल आध्यात्मिक लाभ देता है, बल्कि व्यक्ति के व्यक्तित्व और बुद्धिमत्ता को भी निखारता है।
घोर-रूपे महा-रावे
सर्व शत्रु भयङ्करि ।
भक्तेभ्यो वरदे देवि
त्राहि मां शरणागतम् ॥१॥
ॐ सुर-सुरार्चिते देवि
सिद्ध-गन्धर्व-सेविते ।
जाड्य-पाप-हरे देवि
त्राहि मां शरणागतम् ॥२॥
जटा-जूट-समा-युक्ते
लोल-जिह्वान्त-कारिणि ।
द्रुत-बुद्धि-करे देवि
त्राहि मां शरणागतम् ॥३॥
सौम्य-क्रोध-धरे रूपे
चण्ड-रूपे नमोऽस्तु ते ।
सृष्टि-रूपे नमस्तुभ्यं
त्राहि मां शरणागतम् ॥४॥
जडानां जडतां हन्ति
भक्तानां भक्त वत्सला ।
मूढतां हर मे देवि
त्राहि मां शरणागतम् ॥५॥
वं ह्रूं ह्रूं कामये देवि
बलि-होम-प्रिये नमः ।
उग्र तारे नमो नित्यं
त्राहि मां शरणागतम्॥६॥
बुद्धिं देहि यशो देहि
कवित्वं देहि देहि मे ।
मूढत्वं च हरेद्-देवि
त्राहि मां शरणागतम् ॥७॥
इन्द्रादि-विलसद्-द्वन्द्व-
वन्दिते करुणा मयि ।
तारे तारा-धिना-थास्ये
त्राहि मां शरणागतम् ॥८॥
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां
नवम्यां यः पठेन्-नरः ।
षण्मासैः सिद्धि-माप्नोति
नात्र कार्या विचारणा ॥९॥
मोक्षार्थी लभते मोक्षं
धनार्थी लभते धनम् ।
विद्यार्थी लभते विद्यां
तर्क-व्याकरणा-दिकम् ॥१०॥
इदं स्तोत्रं पठेद् यस्तु
सततं श्रद्धया-ऽन्वितः ।
तस्य शत्रुः क्षयं याति
महा-प्रज्ञा प्रजायते ॥११॥
पीडायां वापि संग्रामे
जाड्ये दाने तथा भये ।
य इदं पठति स्तोत्रं
शुभं तस्य न संशयः ॥१२॥
इति प्रणम्य स्तुत्वा च
योनि-मुद्रां प्रदर्शयेत् ॥१३॥
॥ इति नीलसरस्वतीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
घोररूपे महारावे सर्वशत्रुभयंकरि ।
भक्तेभ्यो वरदे देवि त्राहि मां शरणागतम् ॥1॥
ऊँ सुरासुरार्चिते देवि सिद्धगन्धर्वसेविते ।
जाड्यपापहरे देवि त्राहि मां शरणागतम् ॥2॥
जटाजूटसमायुक्ते लोलजिह्वान्तकारिणि ।
द्रुतबुद्धिकरे देवि त्राहि मां शरणागतम् ॥3॥
सौम्यक्रोधधरे रूपे चण्डरूपे नमोSस्तु ते ।
सृष्टिरूपे नमस्तुभ्यं त्राहि मां शरणागतम् ॥4॥
जडानां जडतां हन्ति भक्तानां भक्तवत्सला ।
मूढ़तां हर मे देवि त्राहि मां शरणागतम् ॥5॥
वं ह्रूं ह्रूं कामये देवि बलिहोमप्रिये नम: ।
उग्रतारे नमो नित्यं त्राहि मां शरणागतम्॥6॥
बुद्धिं देहि यशो देहि कवित्वं देहि देहि मे ।
मूढत्वं च हरेद्देवि त्राहि मां शरणागतम् ॥7॥
इन्द्रादिविलसदद्वन्द्ववन्दिते करुणामयि ।
तारे ताराधिनाथास्ये त्राहि मां शरणागतम् ॥8॥
अष्टभ्यां च चतुर्दश्यां नवम्यां य: पठेन्नर: ।
षण्मासै: सिद्धिमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥9॥
मोक्षार्थी लभते मोक्षं धनार्थी लभते धनम् ।
विद्यार्थी लभते विद्यां विद्यां तर्कव्याकरणादिकम ॥10॥
इदं स्तोत्रं पठेद्यस्तु सततं श्रद्धयाSन्वित: ।
तस्य शत्रु: क्षयं याति महाप्रज्ञा प्रजायते ॥11॥
पीडायां वापि संग्रामे जाड्ये दाने तथा भये ।
य इदं पठति स्तोत्रं शुभं तस्य न संशय: ॥12॥
इति प्रणम्य स्तुत्वा च योनिमुद्रां प्रदर्शयेत ॥13॥
॥ इति नीलसरस्वतीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
१. हे देवी! आप भयंकर रूपधारी, अघोर निनाद करनेवाली, सभी शत्रुओं को भयभीत करने वाली और भक्तों को वर देने वाली हैं। आप मेरे जैसे शरणागत की रक्षा करें।
२. देवताओं और दानवों द्वारा पूजित, सिद्धों और गन्धर्वों द्वारा सेवित तथा जड़ता और पाप का नाश करने वाली हे देवी! आप मेरी रक्षा करें।
३. जटाजूट से सुशोभित, चंचल जिह्वा को संयमित करने वाली और बुद्धि को तीक्ष्ण करने वाली हे देवी! आप मेरी रक्षा करें।
४. सौम्य क्रोध धारण करने वाली, उत्तम रूपधारी, प्रचण्ड स्वरूप वाली हे देवी! आपको नमन। हे सृष्टि की स्वरूपिणी! आप मेरे शरणागत की रक्षा करें।
५. आप मूर्खों की मूर्खता का नाश करती हैं और भक्तों के प्रति हमेशा करुणामयी हैं। हे देवी! आप मेरी मूढ़ता दूर करें और मेरी रक्षा करें।
६. वं ह्रूं ह्रूं बीजमन्त्र स्वरूपिणी हे देवी! मैं आपके दर्शन की कामना करता हूँ। बलि और होम से प्रसन्न होने वाली, उग्र आपदाओं से तारण करने वाली हे उग्रतारे! आपको नमन। आप मेरी रक्षा करें।
७. हे देवी! आप मुझे बुद्धि, कीर्ति और कवित्व की शक्ति दें तथा मेरी मूढ़ता का नाश करें। आप मेरे शरणागत की रक्षा करें।
८. इन्द्रादि द्वारा पूजित, शोभायुक्त चरणों वाली, करुणा से परिपूर्ण, चंद्रमा समान मुखमंडल वाली और जगत् को तारण करने वाली हे भगवती तारा! आप मेरी रक्षा करें।
९. जो व्यक्ति अष्टमी, नवमी और चतुर्दशी तिथि को इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह छह महीनों में सिद्धि प्राप्त कर लेता है; इसमें कोई संदेह नहीं।
१०. इसका पाठ करने से मोक्ष की इच्छा रखने वाला मोक्ष प्राप्त करता है, धन की इच्छा रखने वाला धन पाता है और विद्या की कामना रखने वाला विद्या एवं तर्क-व्याकरण आदि का ज्ञान प्राप्त करता है।
११. जो भक्तिपूर्वक इस स्तोत्र का निरंतर पाठ करता है, उसके शत्रु नष्ट हो जाते हैं और उसमें महान बुद्धि का उदय होता है।
१२. विपत्ति, संग्राम, मूढ़ अवस्था, दान या भय की स्थिति में इस स्तोत्र का पाठ करने वाले का कल्याण होता है; इसमें कोई संदेह नहीं।
१३. इस प्रकार स्तुति समाप्त करने के बाद देवी को प्रणाम कर उन्हें योनिमुद्रा दिखानी चाहिए।
इस प्रकार नीलसरस्वती स्तोत्र सम्पूर्ण हुआ।