कलयुग में ब्रह्मास्त्र है, महा मृतुन्जय मन्त्र

20 मार्च 2017

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

 

शिव सत्य है और शिव ही परम ब्रह्म है। शिव भगवान अजन्मी हैं, हिन्दू शास्त्रों में शिव को स्वंमभू बताया गया है। भगवान शिव के ना माता-पिता है और ना ही इनका बचपन है, भगवान शिव ने खुद को स्वयं से प्रकट किया है। कलयुग में इंसान की सभी इच्छाओं की पूर्ति भगवान शिव की आराधना से हो सकती हैं। चाहे बात करें धन या व्यवसाय की, या सुख समृद्धि की, सभी प्रकार की पीड़ा से लाभ प्राप्त करने के लिए देवों के देव महादेव की पूजा उपयुक्त होती है।

 

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लेकिन अब बात आती है कि भगवान शिव की पूजा किस तरह से की जाए? तो यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि सतयुग में तो मूर्ति पूजा से ही लाभ प्राप्त हो जाता था किन्तु कलयुग में मात्र मूर्ति पूजा से सुख नहीं पाया जा सकता है। भविष्यपुराण में भी इस बात का जिक्र आता है कि कलयुग में बिना मंत्र ध्यान और जप से इंसान सुख प्राप्त नहीं कर सकता है। तो यदि हम भगवान शिव की अपार कृपा प्राप्त करना चाहते हैं तो महा मृतुन्जय मन्त्र का नित्य रोज जप बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।

 

महा मृतुन्जय मन्त्र का महत्व

 

- यदि व्यक्ति की कुंडली में मास, गोचर और दशा, अंतर्दशा, स्थूलदशा आदि में किसी भी प्रकार की कोई पीड़ा है तो यह दोष महा मृतुन्जय मन्त्र से दूर किये जा सकते हैं।

-यदि कोई मनुष्य किसी महारोग से कोई पीड़ित है तो भगवान शिव के मृतुन्जय मन्त्र से लाभ प्राप्त किया जा सकता है। यहाँ तक की यह मन्त्र म्रत्यु को भी टाल देता है।

-जमीन-जायदाद के बँटवारे की संभावना हो या किसी महामारी से लोग मर रहे हों। ऐसे समय में महा मृतुन्जय मन्त्र का प्रयोग ब्रह्मास्त्र का कार्य करता है।

-घर में कलेश रहता हो, पारिवारिक दुःख चल रहा हो या घर में अकाल म्रत्यु हो रही हो तब ऐसे में नित्य रोज सुबह-शाम महा मृतुन्जय मन्त्र का जाप किया जाये, तो पीड़ा जड़ से खत्म हो जाती है।

-यदि आपके जीवन में किसी भी कारण से धन की हानि हो रही है या आपका व्यवसाय नहीं चल पा रहा है तो महा मृतुन्जय मन्त्र से लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

-बार-बार हमारी आत्मा जन्म लेकर, दुःख भोगती है। यदि हम महा मृतुन्जय मन्त्र का जाप निरंतर करते रहते हैं तो आत्मा इस आवागमन के दुःख से छूटते हुए, ब्रह्म शक्ति में लीन हो जाती है।

 

महा मृत्युंजय मंत्र का शब्दशः अर्थ अगर देखें तो-

 

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

 

-त्रयंबकम = त्रि-नेत्रों वाला (कर्मकारक)

-यजामहे = हम पूजते हैं, सम्मान करते हैं, हमारे श्रद्देय

-सुगंधिम= मीठी महक वाला, सुगंधित (कर्मकारक)

-पुष्टि = एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली, समृद्ध जीवन की परिपूर्णता

-वर्धनम = वह जो पोषण करता है, शक्ति देता है, (स्वास्थ्य, धन, सुख में) वृद्धिकारक; जो हर्षित करता है, आनन्दित करता है और स्वास्थ्य प्रदान करता है,

-उर्वारुकम= ककड़ी (कर्मकारक)

-इव= जैसे, इस तरह

-बंधना= यह वरुणादित्या का बोधक है जो वाम गुल्फा में स्थित है।

-मृत्युर = मृत्यु से

-मुक्षिया = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति दें

-मा= न

-अमृतात= अमरता, मोक्ष।

 

महा मृतुन्जय मन्त्र जप विधि

 

शास्त्रों में वैसे जप का सबसे उपयुक्त समय तो ब्रह्म महूर्त (प्रातः 2 से 4) ही बताया गया है किन्तु यदि इस समय जप नहीं हो पाता है तो प्रातःकाल और सायंकाल में स्नान और सभी जरूरी कार्यों से निर्वत होकर, कम से कम 5 बार महा मृतुन्जय मन्त्र, माला का जाप करना चाहिए।

 

-जाप के समय रुद्राक्ष की माला का ही प्रयोग करना, अच्छा माना जाता है।

 

-ध्यान दें कि पूर्व दिन में जपी गयी माला से कम जाप अगले दिन नहीं करना होता है। बेशक जप संख्या ज्यादा हो सकती है किन्तु यह कम ना हों।

 

-ध्यान के समय, मन किसी भी अन्य कार्य में नहीं होना चाहिए।

 

-जप काल में शिवजी की प्रतिमा, शिवलिंग या महामृत्युंजय यंत्र का पास में रखना काफी अच्छा समझा जाता है। तथा मंत्र का उच्चारण होठों से बाहर नहीं आना चाहिए।

 

-इंसान यदि मासाहार छोड़कर महा मृतुन्जय का जप करता है तो इससे शीघ्र ही लाभ प्राप्त होता है।

साथ ही साथ एकमुखी रुद्राक्ष महामृत्युंजय पेंडेंट की मदद से भी बहुत लाभ प्राप्त होता है। 

 

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