शिवरात्रि - क्या सीख देता शिव परिवार?

भगवान शिव की उपासना करने से समस्त कामनाओं की पूर्ति होती है | भगवान शिव स्वरूप से विषम जैसे आभासित होने पर भी परम शांत, एक रूप और कृपा सागर कहलाए | अनिष्टकारक दुर्योगों में शिव की सहस्त्रनामावली, रूद्वाष्टाध्यायी, दारिद्रयदहन स्त्रोत, महामृत्युंजय मंत्र, षडाक्षर एवं पंचाक्षर का श्रद्वा व विश्वास के साथ पाठ करने भगवान शिव प्रसन्न हो जाते हैं | ग्रहजन्य की बाधा दूर हो जाती है और सभी दिव्य सुख मिलते हैं | सौभाग्य प्रदान करने वाले शिव काल के भी काल हैं और महाकाल नियन्ता है| भगवान शिव परम कल्याणकारी हैं और श्रद्धा भाव से जो भी उनके दरबार में आया उसको अपना लेते हैं | भगवान शिव को जल की धारा के साथ ही मन की धारा भी अर्पित करने से समस्त कामनाओं की पूर्ति होती है | शिव की पूजा में सबसे श्रेष्ठ पार्थिव पूजा है इस पूजा से रोग, शोक, पाप और दुखों का नाश होता है | श्रद्धा और समर्पण भाव से शिव की उपासना करने से शिवत्व तो जागृत होता ही है शिव तत्व की प्राप्ति भी होती है और यहीं से हमें जीवन में एकता और सन्तुलन की सीख भी मिलती है| पं. मनोज कुमार द्विवेदी से परामर्श करने के लिये यहां क्लिक करें।

 

भगवान शिव के परिवार से मिलती है यह सीख

देवाधिदेव भगवान शिव के परिवार में यह देखने को मिलता है कि उनके परिवार में जितने वाहन हैं जैसे भगवान शंकर गले में सर्प धारण करते हैं। उनके पुत्र गणेश का वाहन चूहा है। सर्प और चूहा एक दूसरे के शत्रु होते हुए भी नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। भगवान कार्तिकेय का वाहन मोर है, जो कि सर्प का भक्षण करता है, लेकिन दोनों आपस में प्रेम से रहते हैं।  भगवान शिव का वाहन बैल है, जबकि माता पार्वती का वाहन शेर है। दोनों एक दूसरे के दुश्मन होते हुए आपस में मिलजुलकर रहते हैं। भगवान शिव के परिवार में रहन-सहन और खानपान में काफी विषमता होने के बावजूद भी सभी प्रेम, एकता और भाईचारे की भावना से रहते हैं।  और इन सभी की परस्पर आपस में शत्रुता है लेकिन फिर भी इनके बीच में कभी कोई लड़ाई छिड़ी हो ऐसा नहीं हुआ क्योंकि देवताओं के जो प्रतीकात्मक  पशु वाहन हैं वे शत्रुता के बीच मित्रता का भाव जाग्रत करते हैं और अपने स्वभाव अपनी प्रवृति  को छोड़े बिना सभी  मिलजुलकर  रहते हैं | सामाजिक तौर पर देखें तो परिवारों में भी यह जरूरी है अलग-अलग विचारों,  अभिरूचियों, स्वाभावों के बावजूद हम लोग हिलमिल कर रहें अपनी सोच दूसरों पर न थोपी जाय और सबसे खास बात यहकि मुखिया और अन्य बड़े सदस्यों के गले में गरल थामें रखने का धीरज और सबको साथ लेकर चलने की आदत हो तभी संयुक्त परिवार चल सकते हैं| यह बात हमारे परिवार तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए वरन हमारे देश में विभिन्न धर्मो, जाति और विविधताओं के बीच एकता व संतुलन शिव परिवार की तरह जरूरी है|

 

सर्वमान्य और सर्वोचित निर्णय ठण्डे दिमाग से ही लिये जा सकते हैं। महाशिव के मस्तक पर चन्द्रमा और गंगा का होना इस बात का संकेत है कि मस्तिष्क को सदा शीतल रखो। चन्द्रमा और गंगाजल दोनों में असीम शीतलता है। 

 

मानव मात्र को भगवान शिव यह संदेश देते हैंकि भले ही हमारा स्वाभाव और प्रकृति  भिन्न हो पर हमें परस्पर मिल कर रहना चाहिए|

पं. मनोज कुमार द्विवेदी

 

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