वैदिक ज्योतिष में जिस तरह ग्रहों का महत्व है उसी तरह से वक्री ग्रह का भी काफी महत्व होता है। यह ग्रह तब तक अच्छे परिणाम देते हैं जब तक की वे सही व सीधे चलते हैं लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर वे उल्टी चाल चलने लगे तो क्या होगा। वक्री ग्रह उन लोगों के लिए खास रूप से महत्वपूर्ण है जिनकी दिलचस्पी कुंडली, करियर, रिश्तों, या आने वाले समय से जुड़ी जानकारी में हो।
इस लेख में आप जानेंगे कि वक्री ग्रह क्या है? ज्योतिष में वक्री ग्रह का क्या महत्व है? वक्री ग्रह कितने प्रकार के हैं? और वक्री ग्रहों का कुंडली पर क्या प्रभाव पड़ता है? आइये जानते हैं वक्री ग्रह के बारे में-
वक्री ग्रह का मतलब होता है कि कोई ग्रह अपनी सामान्य चाल से उल्टी दिशा में चलता हुआ दिखाई देता है। जब स्थिति बनती है तो उसे ग्रह का वक्री (retrograde 2026) होने कहते हैं। खगोलीय दृष्टि से यह इतना महत्वपूर्ण नहीं होता जबकि ज्योतिष में इसे एक खास समय माना जाता है। जब भी कोई ग्रह वक्री होता है, तो उस दौरान उस ग्रह जुड़ी ऊर्जा का बिल्कुल अलग अनुभव होता है। वैदिक ज्योतिष में जब जन्म के समय ग्रह वक्री होता है तो इसका जातक के ऊपर अलग प्रभाव पड़ता है। क्योंकि वैदिक ज्योतिष में इसके कई मायने हैं। ऐसे में वक्री का महत्व और भी बढ़ जाता है।
ज्योतिषीय रूप से, जब हम किसी ग्रह के पीछे की ओर बढ़ने के अर्थ को समझने की कोशिश करते हैं, तो पहली बात यह है कि यह काफी दुर्लभ घटना है। वैदिक ज्योतिष में ग्रहों की वक्री अवधि आपको धीमा होने और अपने फैसलों पर दोबारा नज़र डालने का मौका देती है। कई बार आप उन बातों या कामों पर लौटते हैं जिन्हें पहले टाल दिया था। उदाहरण के लिए, बुध वक्री होने पर लोग गलतफहमी, देरी या पुराने संपर्कों के फिर से जुड़ने जैसी चीज़ें नोटिस करते हैं। यह हर किसी को अलग तरह से प्रभावित करता है, इसलिए इसे डरने वाली बात की बजाय समझने वाली स्थिति माना जाता है।
सरल शब्दों में, वक्री ग्रह हमें यह सोचने का समय देता है कि आप कहाँ खड़े हैं, क्या ठीक चल रहा है और किन चीज़ों को सुधारने की जरूरत है। यह एक तरह का ब्रेक जैसा है, जो आपको खुद को थोड़ा बेहतर समझने में मदद करता है। इसके अलावा ज्योतिषियों का कहना है कि जन्म के समय वक्री ग्रह का विश्लेषण ध्यान से करना होता है क्योंकि यह जातक के व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। जातक अपने जीवन में किसी भी वस्तु को प्राप्त करने के लिए औसत से अधिक परिश्रम करता है।
सबसे पहले तो आपको ये बता दें कि सूर्य व चंद्रमा को छोड़कर वैदिक ज्योतिष में हर ग्रह वक्री होता है। राहु व केतु सदैव वक्र स्थिति में ही रहते हैं। हर व्यक्ति पर इसका असर उसकी कुंडली के हिसाब से बदल जाता है, लेकिन आम तौर पर ये ग्रह आपकी बातों, रिश्तों, करियर, सोच और भावनाओं पर असर डालते हैं। तो चलिए अब जानते हैं कि अन्य वक्री ग्रहों के सामान्य प्रभाव क्या-क्या होते हैं
बुध वक्री के दौरान बातचीत में गलतफहमियाँ बढ़ सकती हैं। काम, यात्रा या मीटिंग जैसी चीज़ें धीमी हो जाती हैं। दिमाग ज़्यादा चलता है, जिससे ओवरथिंकिंग होना आसान है। अच्छा पक्ष यह है कि पुराने काम पूरे करने और अपनी अंतर्दृष्टि को सुनने का मौका मिलता है।
शुक्र वक्री रिश्तों और भावनाओं को गहराई से छूता है। इस समय रिश्तों की सच्चाई सामने आती है, पुरानी भावनाएँ लौट सकती हैं और खर्च या लग्ज़री से जुड़े फैसले उलझ सकते हैं। वहीं, रचनात्मक काम और अपनी मूल्यों को समझने की क्षमता बढ़ती है।
मंगल की ऊर्जा भीतर दब जाती है, जिससे चिड़चिड़ापन या थकान महसूस हो सकती है। कई बार चाहत और काम में तालमेल नहीं बनता, और रिश्तों में टकराव बढ़ सकते हैं। यह समय अपनी ऊर्जा को शांत और सही दिशा में ले जाने की सीख देता है।
बृहस्पति वक्री आपको अपने विश्वास, लक्ष्य और सीख को दोबारा देखने पर मजबूर करता है। बाहर के परिणाम भले धीमे दिखें, लेकिन भीतर स्पष्टता बढ़ती है। वक्री खत्म होते ही कई बातों का मतलब साफ हो जाता है।
शनि वक्री जिम्मेदारियों और पुराने कर्मों की जांच जैसा समय होता है। काम में देरी, दबाव या थकान महसूस हो सकती है। लेकिन यही समय हमें मजबूत बनाता है और लंबी अवधि की स्थिरता के लिए तैयार करता है।
राहु वक्री कभी-कभी भ्रम बढ़ा सकता है, जिससे निर्णय लेना कठिन हो जाता है। वहीं, सही स्थिति में यह अचानक लाभ, तेज दिमाग और करियर में उछाल भी दे सकता है। असर पूरी तरह घर और योग के आधार पर बदलता है।
केतु वक्री भीतर की दुनिया पर रोशनी डालता है। यह आध्यात्मिकता, सच की खोज और अनावश्यक चीज़ों से दूरी की ओर ले जा सकता है। लेकिन अशुभ स्थिति में यह रिश्तों, करियर या भावनात्मक स्थिरता में चुनौती ला सकता है।