वक्री ग्रह 2020

वैदिक ज्योतिष में जिस तरह ग्रहों का महत्व है उसी तरह से वक्री ग्रह का भी काफी महत्व है। यह ग्रह तब तक अच्छे परिणाम देते हैं जब तक की वे सही व सीधे चलते हैं लेकिन अगर वे उलट जाए तो क्या होगा। इस लेख में हम आपको वक्री ग्रह क्या है? वक्री ग्रह से खगोल शास्त्र का क्या संबंध है? ज्योतिष में वक्री ग्रह का क्या महत्व है? वक्री ग्रह कितने प्रकार के हैं? और वक्री ग्रहों का कुंडली पर क्या प्रभाव पड़ता है? आइये जानते हैं वक्री ग्रह के बारे में -

वक्री ग्रह क्या है?

परिभाषा के अनुसार, एक ग्रह वक्र तब होता है जब वह सौर मंडल में पीछे की ओर बढ़ रहा होता है। इसी स्थिति को ग्रह का वक्री (Retrograde 2020) होना कहते हैं। हालांकि, ज्योतिष में, एक स्पष्ट गति की तुलना में एक वक्री ग्रह का महत्व बहुत गहरा और जटिल है। वैदिक ज्योतिष में जब जन्म के समय ग्रह वक्री होता है तो इसका जातक के ऊपर अलग प्रभाव पड़ता है। क्योंकि वैदिक ज्योतिष में इसके कई मायने हैं। ऐसे में वक्री का महत्व और भी बढ़ जाता है।

वक्री ग्रह व खगोलशास्त्र

खगोलीय दृष्टि से, जैसे कि पृथ्वी का चक्कर अन्य ग्रहों द्वारा लगाया जाता है या पृथ्वी परिक्रमा करती है। पीछे की ओर ग्रह का बढ़ना एक भ्रम है, क्योंकि ग्रह हमेशा एक ही दिशा में सूर्य के चारों ओर घूमते हैं। ऐसा इसलिए प्रतीत होता है क्योंकि ग्रह के गति में सापेक्ष अंतर आ जाती है और ग्रह वक्री प्रतीत होता है। यह तब होता है जब ग्रह पृथ्वी के अपने निकटतम कोण पर होते हैं जो स्पष्ट वक्री गति होती है। संक्षेप में, वक्री गति ग्रहों की निकटता का एक भ्रम पूर्ण पक्ष-प्रभाव है।

वक्री ग्रह का वैदिक ज्योतिष में महत्व

ज्योतिषीय रूप से, जब हम किसी ग्रह के पीछे की ओर बढ़ने के अर्थ को समझने की कोशिश करते हैं, तो पहली बात यह है कि यह काफी दुर्लभ घटना है। ग्रहों की गति का अधिकांश हिस्सा प्रत्यक्ष है, इसलिए प्रत्यक्ष सामान्य हो जाता है। अधिकांश समय, ग्रह आगे की ओर गति में, या अपेक्षाकृत समांतर बढ़ते हैं। बस सामान्य प्रवाह के विपरीत होने से वक्री गति सामान्यतः के इस अर्थ के लिए एक अपवाद या शायद एक चुनौती का भी प्रतिनिधित्व करती है। यदि वक्री (retrograde) ग्रह जन्म के समय ही उचित स्थान में न हो तो ऐसे में जातक को जीवन में कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ज्योतिषियों का कहना है कि जन्म के समय वक्री ग्रह का विश्लेषण ध्यान से करना होता है क्योंकि यह जातक के व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। जातक अपने जीवन में किसी भी वस्तु को प्राप्त करने के लिए औसत से अधिक परिश्रम करता है। सेहत पर भी इन वक्री ग्रहों का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है। जातक रोगी व कमजोर होता है। विवेक व मानसिक स्थिति कमजोर होती है।

वैदिक ज्योतिष में वक्री ग्रह

सबसे पहले तो हम आपको ये बता दें कि सूर्य व चंद्रमा को छोड़कर वैदिक ज्योतिष में हर ग्रह वक्री होता है। राहु व केतु सदैव वक्र स्थिति में ही रहते हैं।


वक्री मंगल- वैदिक ज्योतिष में मंगल दो राशियों पर शासन करता है, मेष और वृश्चिक। मंगल मकर राशि में उच्च का और कर्क राशि में नीच का होता है। ऐसे में मंगल का वक्री होना स्वभाविक रूप से मकर राशि वालों के लिए सकारात्मक और कर्क राशि वालों के लिए नकारात्मक परिणाम देगा।


वक्री बुध- बुध को भी दो राशियों का स्वामित्व प्राप्त है, जो मिथुन और कन्या राशि हैं। बुध ग्रह कन्या में उच्च का और मीन में नीच का माना जाता है। जब बुध वक्री होता है तो कन्या राशि के जातकों के लिए शुभ परिणाम देने वाला होता है और जब मीन रा‍शि राशि में वक्री होता है तो यह मीन राशि वालों के लिए नकारात्मक फल देता है।


वक्री बृहस्पति- वैदिक ज्योतिष में गुरू को दो ग्रहों का अधिपत्य प्राप्त है। गुरू की दो राशियां हैं- धनु और मीन। बृहस्पति ग्रह कर्क राशि में उच्च का और मकर में नीच का होता है। जब बृहस्पति ग्रह वक्री होता है तो कर्क राशि वालों के लिए सकारात्मक परिणाम देने वाला बन जाता है परंतु यह मकर राशि वालों के लिए नकारात्मक असर देता है।


वक्री शुक्र- शुक्र को भी दो राशियां मिली हुई हैं ये दोनो राशियां हैं- वृषभ और तुला। वैदिक ज्योतिष में शुक्र को सुख व प्रेम का कारक माना जाता है। ऐसे में इसका वक्री होना जातक के लिए काफी महत्व रखता है। यह ग्रह मीन राशि में में उच्च और कन्या ‍राशि में नीच का होता है। जब यह ग्रह वक्री होता है तो मीन राशि वालों के लिए सकारात्मक और कन्या राशि वालों के लिए नकारात्मक परिणाम देता है।


वक्री शनि- वैदिक ज्योतिष में शनि को कर्म फलदाता ग्रह माना जाता है। शनि को भी दो राशियां मिली हुई हैं जो कुंभ और मकर राशि है। यह ग्रह तुला में उच्च और मेष में नीच का होता है। जब यह ग्रह वक्री होता है तो तुला राशि वालों के लिए सकारात्मक और मेष राशि वालों के लिए नकारात्मक परिणाम देता है।


राहु- वैदिक ज्योतिष में राहु छाया ग्रह है इसे किसी भी ग्रह का स्वामित्व नहीं प्राप्त हैं। राहु वृषभ राशि में उच्च का और वृश्चिक राशि में नीच का होता है। राहु वक्री (retrograde) होता है तो वृषभ राशि वालों के लिए शुभ परिणाम देता है और वृश्चिक राशि वालों के लिए नकारात्मक।


केतु- राहु भी छाया ग्रह है। वृश्चिक में उच्च का और वृषभ में नीच का होता है। वृश्चिक राशि वालों के लिए राहु सकारात्मक और वृषभ राशि वालों के लिए अशुभ माना जाता है।


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