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Rahu Vakri 2026: वैदिक ज्योतिष में राहु और केतु दो ऐसे छाया ग्रह हैं जिनके बारे में जितना कहा जाए उतना कम है। ये दोनों ग्रह न दिखते हैं, न ठोस रूप से मौजूद हैं, लेकिन किसी भी कुंडली के परिणाम में जितनी गहराई इनका असर डालता है, वैसी पकड़ शायद किसी और ग्रह की नहीं होती। राहु को पापी ग्रह कहा गया है, इसका स्वभाव तामसिक है और कई बार यह जातक को ऐसे कामों की ओर ले जाता है जिनसे व्यक्ति खुद भी बचना चाहता है पर बच नहीं पाता।
2026 का साल राहु की वक्री अवस्था के लिहाज़ से कई जातकों के लिए महत्वपूर्ण रहेगा। इस समय राहु का प्रभाव किस दिशा में जाएगा, किन भावों में कैसा फल देगा और कौन-सी स्थिति शुभ या अशुभ सिद्ध हो सकती है – ये सारे बिंदु हम विस्तार से समझते हैं।
वैदिक ज्योतिष के अनुसार ग्रह दो तरह की चाल चलते हैं – मार्गी और वक्री। मार्गी चाल का मतलब सीधी दिशा, जबकि वक्री चाल का अर्थ उल्टी दिशा में बढ़ना। सूर्य और चंद्रमा हमेशा सीधी गति में चलते हैं, इसलिए ये कभी वक्री नहीं होते। इसके विपरीत राहु और केतु हमेशा वक्री चलते हैं। इसी वजह से इनके परिणाम कभी सीधे नहीं माने जाते।
राहु जब भी किसी भाव में बैठता है, वह उस भाव की ऊर्जा को बढ़ा भी देता है और भ्रमित भी कर देता है। इसलिए इसकी स्थिति को समझना जरूरी होता है।
कुंडली में राहु का प्रभाव सीधे इस बात पर निर्भर करता है कि आपके लग्न के स्वामी कौन से ग्रह हैं। अगर लग्न स्वामी शनि, शुक्र या बुध हों तो राहु शुभ फल देता है। ये तीनों ग्रह राहु के मित्र माने जाते हैं। ऐसी स्थिति में राहु जातक को राजयोग, धन लाभ और बुद्धि की तीक्ष्णता प्रदान कर सकता है।
इसके विपरीत यदि लग्न स्वामी सूर्य, चंद्रमा या मंगल हों तो राहु शुभ परिणाम नहीं देता। ऐसी स्थिति में राहु भ्रम, व्यसन, मानसिक अस्थिरता और निर्णय क्षमता में कमी जैसे परिणाम ला सकता है।
भाव के अनुसार भी राहु की स्थिति बहुत मायने रखती है। तृतीय, छठे और ग्यारहवें भाव में राहु शुभ माना जाता है, जबकि चौथे, आठवें और बारहवें भाव में यह अशुभ फल देता है।
लोग राहु को केवल अशुभ ग्रह के तौर पर देखते हैं, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। कुछ विशेष स्थितियों में राहु जातक के जीवन में बड़ी सफलताएं भी दिलाता है।
कुंडली में राहु बलशाली हो तो जातक प्रखर बुद्धि वाला होता है। वह बड़ी योजनाएं बना सकता है। ऐसे लोग राजनीति, व्यापार, रिसर्च और विदेश से जुड़े कार्यों में तेजी से उभरते हैं। राहु की शुभ स्थिति व्यक्ति को आध्यात्म की ओर भी ले जाती है। वह भीतर से एक खास तरह का अंतर्ज्ञान विकसित कर लेता है, जिससे उसे फैसला लेने में सच्चाई की दिशा जल्दी दिखाई देती है।
राहु शुभ ग्रहों के साथ मिलकर खास योग भी बनाता है:
शुभ सूर्य के साथ राहु राजयोग देता है।
शुभ चंद्रमा के साथ राहु कृषि और भूमि से लाभ देता है।
शुभ बुध के साथ राहु उच्च शिक्षा और व्यापार में सफलता देता है।
मंगल के साथ इसके मेल से नौकरी, प्रमोशन और प्रशासनिक पदों में लाभ मिलता है।
गुरु के साथ राहु चुनावी जीत और बड़े अवसर दिलाता है।
इसलिए राहु अंधकार नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार ऊर्जा भी हो सकता है।
अगर राहु अशुभ अवस्था में आ जाए तो इसके परिणाम तुरंत नजर आने लगते हैं। जातक गलत आदतों में फंसने लगता है। जुआ, लॉटरी, गलत संगति, शराब-मांस का अत्यधिक सेवन और गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार इसमें शामिल है। राहु जब पीड़ित होता है तो जातक का मन अस्थिर रहता है। वह बार-बार अपने ही बनाए रास्ते से भटक जाता है।
राहु बुरी स्थिति में हो तो व्यक्ति अपमान झेलता है, संबंध टूटते हैं, व्यावसायिक नुकसान होता है और मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है। राहु के अशुभ होने पर पितृदोष भी बनता है और राहु–केतु जब साथ आते हैं तो कालसर्प दोष का निर्माण होता है।
अब सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा। राहु वक्री होकर 12 भावों में कैसे परिणाम देता है।
यदि राहु वक्री (Rahu Retrograde) होकर कुंडली के प्रथम भाव में विराजमान हो तो जातक को पारिवारिक जीवन में समस्याओं का सामना करना पड़ता है। साथ ही जातक को शत्रुनाशक, मस्तिष्क रोगी, स्वार्थी प्रवृत्ति का बनाता है।
कुंडली के द्वितीय भाव में राहु होने पर जातक को भय ग्रस्त, मिथ्या भाषी (झूठ बोलने वाला). कृपण (कंजूस) और शत्रु हन्ता (अपने भीतर के शत्रु भाव को समाप्त करना) बनाता है।
जातक की कुंडली के तृतीय भाव में राहु जातक को विवेकी, बलिष्ठ, विद्वान, पुरुषार्थी, पराक्रमी और व्यवसायी बनाता है।
किसी कुंडली के चतुर्थ भाव में राहु जातक को क्रूर, कम बोलने वाला, असंतोषी और माता को कष्ट देने वाला बनाता है।
किसी जातक की कुंडली में राहु का पंचम भाव में होने पर जातक को संतान की ओर से हमेशा कष्ट मिलता है।
छठे भाव में यदि राहु बैठा है तो ऐसे में जातक बलवान, धैर्यवान, धनवान और शत्रु पर विजय दिलाता है।
कुंडली के सांतवे भाव में राहु का बैठना जातक के जीवन में हमेशा उतार-चढ़ाव को दर्शाता है। यह जातक को लोभी, वातरोगी (गठिया का रोगी), एक से अधिक विवाह और बेशर्म बनाता है।
आठवें भाव में राहु होने पर जातक की मृत्यु आकस्मिक ही हो जाती है। राहु जातक को कठोर परिश्रमी, बुद्धिमान लेकिन कामी बनाता है।
कुंडली के नवम भाव में राहु का विराजना जातक का धर्म नष्ट करता है। जातक को राहु सदगुणी, परिश्रमी, लेकिन भाग्य में अंधकार देने वाला होता है।
दशम भाव में राहु का विराजना जातक को ऊंचाई तक ले जाता है लेकिन पारिवारिक सुख नहीं मिलता है। साथ ही जातक को भोग विलास करने वाला व्यक्ति बना देता है।
पत्रिका के एकादश भाव में राहु (Rahu) का बैठना जातक को शुभ फल प्रदान करता है। इससे जातक को आकस्मिक लाभ होता है।
द्वादश भाव में राहु का विराजना जातक को कुमार्ग और दुर्गुण की ओर ले जाता है। साथ ही मंदबुद्धि, विवेकहीन, दुर्जनों की संगति करवाने वाला बनाता है।
राहु वक्री 2026 जातक के जीवन में कई तरह की सक्रिय ऊर्जा लाता है। किसके लिए ये समय अवसर है और किसके लिए चुनौती, यह पूरी तरह कुंडली की स्थिति, भाव, युति और ग्रहों के मेल से तय होता है। राहु की ऊर्जा को समझना आसान नहीं, लेकिन सही संतुलन और सही उपाय इसे शुभ दिशा में ले जा सकता है।