राहु वक्री

ज्योतिष के अनुसार, सौरमंडल में स्थित नौ ग्रहों में से राहु और केतु छाया ग्रह के रूप में हैं जो पृथ्वी के दो अक्षों पर उपस्थित रहते हैं। राहु को पापी ग्रह माना जाता है। राहु तामसिक है जिसकी वजह से कुंडली में इसका प्रभाव अधिक होता है और ये गलत  कार्य की ओर जातक को आकर्षित करता है। कहा जाता है कि पर राहु अशुभ फल देने वाला ग्रह है। ज्योतिष के अनुसार ग्रह दो तरह की चाल चलते हैं एक मार्गी और दूसरा वक्री। मार्गी में ग्रह सदा सीधी चाल चलते हैं जबकि वक्री में ग्रह उल्टी दिशा में चलना शुरू कर देते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार, नवग्रहों में सूर्य और चंद्रमा हमेशा सीधा सामान्य दिशा में ही चलते हैं ये कभी भी वक्री नहीं होते हैं। इसके विपरीत राहु और केतु सदा उल्टी दिशा यानि हमेशा वक्री रहते हैं।

वैदिक ज्योतिष में राहु का प्रभावी होना

वैदिक ज्योतिष के अनुसार किसी जातक की कुंडली में शनि, शुक्र और बुध लग्न भाव में स्वामी हैं तो राहु शुभ फल प्रदान करता है क्योंकि यह इन ग्रहों का मित्र होता है। 
इसके विपरीत यदि कुंडली में सूर्य, चंद्रमा, मंगल लग्न भाव के स्वामी हैं तो राहु अशुभ फल देता है। वहीं कुंडली में तृतीय भाव, छठें भाव और ग्यारहवें भाव में राहु शुभ फल देता है जबकि चतुर्थ, अष्टम और बारहवें भाव में राहु अशुभ फल देता है।


राहु का शुभ प्रभाव 

ज्योतिष के अनुसार राहु को अशुभ फल देने वाल ग्रह माना जाता है लेकिन हर वक्त यह अशुभ फल नहीं देता है बल्कि कुछ परिस्थितियों में यह शुभ फल भी प्रदान करता है। इसके शुभ फल से जातक धनवान और राजयोग भोगता है। यदि किसी जातक की कुंडली में राहु बलशाली होता है तो वह जातक को कठोर स्वभाव वाला और प्रखर बुद्धि प्रदान करता है। कुंडली में राहु के अच्छी स्थिति में होने से जातक अपने धर्म का पालन करता है। राहु के शुभ प्रभाव से जातक अध्यात्म की ओर झुक जाता है और उसे अंर्तज्ञान की प्राप्ति होती है। राहु की शुभ स्थिति जातक को धार्मिक, आस्तिक और मान-सम्मान के साथ धनवान भी बनाती है। 

वैदिक ज्योतिष के अनुसार, शुभ सूर्य के साथ राहु राजयोग बनाता है। वहीं कुंडली में शुभ चंद्र के साथ राहु जातक को किसानी में सफलता दिलाता है। जबकि शुभ बुध के साथ राहु जातक को उच्च शिक्षा, व्यापार में बढ़ोत्तरी प्रदान करता है। यदि राहु का मेल मंगल के साथ हो तो यह जातक को नौकरी दिलाने और पदोन्नति में मदद करता है। कुंडली में गुरु के साथ राहु होने पर चुनाव में जीत और प्रत्येक कार्य में विजय प्राप्त होती है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि किसी भी व्यक्ति की कुंडली में शुभ ग्रहों के साथ राहु शुभ फल देता है और अशुभ ग्रहों के साथ अशुभ फल प्रदान करता है। 


कुंडली में राहु अशुभ प्रभाव

किसी जातक की कुंडली में यदि राहु बुरी स्थिति में है तो जातक बुरी आदतों में पड़ जाता है। जातक जुआ, लॉटरी और मास-मदिरा का सेवन करने लगता है। अशुभ प्रभाव की वजह से जातक को अपमान झेलना पड़ सकता है साथ ही सफलता भी प्राप्त नहीं होती है। राहु के पीड़ित होने से व्यवहार और नैतिकता में गिरावट आती है। राहु के अशुभ प्रभाव की वजह से जातक चरित्रहीन हो सकता है। यदि आपकी कुंडली में राहु पीड़ित है तो वह पितृदोष बनाता है। साथ ही अशुभ प्रभाव के कारण जातक को कोई गंभीर मानसिक रोग भी हो सकता है। राहु केतु के साथ कुंडली में कालसर्प योग बनाता है। 


द्वादश भावों में राहु का प्रभाव

ज्योतिष में उल्लेखित 12 भाव के मुताबिक देखा जाए तो वक्री राहु का प्रभाव अलग –अलग होता है।

यदि राहु वक्री (Rahu Retrograde) होकर कुंडली के प्रथम भाव में विराजमान हो तो जातक को पारिवारिक जीवन में समस्याओं का सामना करना पड़ता है। साथ ही जातक को शत्रुनाशक, मस्तिष्क रोगी, स्वार्थी प्रवृत्ति का बनाता है।

कुंडली के द्वितीय भाव में राहु होने पर जातक को भय ग्रस्त, मिथ्या भाषी (झूठ बोलने वाला). कृपण (कंजूस) और शत्रु हन्ता (अपने भीतर के शत्रु भाव को समाप्त करना) बनाता है।

जातक की कुंडली के तृतीय भाव में राहु जातक को विवेकी, बलिष्ठ, विद्वान, पुरुषार्थी, पराक्रमी और व्यवसायी बनाता है।

किसी कुंडली के चतुर्थ भाव में राहु जातक को क्रूर, कम बोलने वाला, असंतोषी और माता को कष्ट देने वाला बनाता है।

किसी जातक की कुंडली में राहु का पंचम भाव में होने पर जातक को संतान की ओर से हमेशा कष्ट मिलता है। 

छठे भाव में यदि राहु बैठा है तो ऐसे में जातक बलवान, धैर्यवान, धनवान और शत्रु पर विजय दिलाता है। 


कुंडली के अन्य छः भाव में वक्री राहु का प्रभाव 

कुंडली के सांतवे भाव में राहु का बैठना जातक के जीवन में हमेशा उतार-चढ़ाव को दर्शाता है। यह जातक को लोभी, वातरोगी (गठिया का रोगी), एक से अधिक विवाह और बेशर्म बनाता है।

आठवें भाव में राहु होने पर जातक की मृत्यु आकस्मिक ही हो जाती है। राहु जातक को कठोर परिश्रमी, बुद्धिमान लेकिन कामी बनाता है।
 
कुंडली के नवम भाव में राहु का विराजना जातक का धर्म नष्ट करता है। जातक को राहु सदगुणी, परिश्रमी, लेकिन भाग्य में अंधकार देने वाला होता है।

दशम भाव में राहु का विराजना जातक को ऊंचाई तक ले जाता है लेकिन पारिवारिक सुख नहीं मिलता है। साथ ही जातक को भोग विलास करने वाला व्यक्ति बना देता है।

पत्रिका के एकादश भाव में राहु (Rahu) का बैठना जातक को शुभ फल प्रदान करता है। इससे जातक को आकस्मिक लाभ होता है। 

द्वादश भाव में राहु का विराजना जातक को कुमार्ग और दुर्गुण की ओर ले जाता है। साथ ही मंदबुद्धि, विवेकहीन, दुर्जनों की संगति करवाने वाला बनाता है।


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