बृहस्पति वक्री

बृहस्पति का वक्री अवस्था में आना वैदिक ज्योतिष में काफी महत्व रखता है। ज्योतिष के अनुसार यदि ग्रह सही स्थिति व सही दिशा में हो तो जातक को इससे अधिक लाभ मिलता है। परंतु यदि ग्रह उल्टा चलने लगे व वक्री अवस्था में आ जाए तो इसका परिणाम उलट हो सकता है। वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति को गुरू का स्थान प्राप्त है ऐसे में इसका वक्री होना जातक के जीवन पर गहरा असर डालता है। इस लेख में हम वक्री बृहस्पति के बारे में विस्तार से बात करेंगे, लेख में हम वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति का प्रभावी व कमजोर होना, वक्री बृहस्पति का कुंडली में गोचर करना, खगोलीय दृष्टि से बृहस्पति का वक्री (Jupiter Retrograde 2020) होना तथा वक्री गुरू का मानव जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है इसकी जानकारी देंगे।

वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति का प्रभावी होना

वैदिक ज्योतिष के अनुसार गुरू की यदि किसी जातक पर कृपा हो जाए तो वह जीवन में सब कुछ हासिल कर लेता है। गुरू का प्रभावी होना जातक को विवेक वान बनाता है। इसके साथ ही वह विचलित नहीं होता है। जातक आध्यात्म की ओर अधिक झुकाव रखता है। ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। करियर में भी अच्छा ग्रोथ मिलता है। परंतु गुरू के कारण जातक अहंकारी भी हो सकता है। खान पान की चीजों को लेकर वह ज्यादा ही गंभीर होता है।


बृहस्पति का कुंडली में कमजोर होना

बृहस्पति का कुंडली में कमजोर व कम प्रभावी हो तो ऐसी परिस्थिति में जातक अल्प ज्ञान प्राप्त करता है। जातक असभ्य भी हो सकता है। छोटे – बड़ों का सम्मान नहीं करते हैं। ज्योतिष की माने तो ऐसे जातक को विद्या और धन प्राप्ति में बाधा के साथ ही बड़ों का सहयोग पाने में भी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। जातक का पाचन तंत्र कमजोर होता है, स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएँ बृहस्पति ही देता है। संतान से जुड़ी समस्याएँ भी परेशान करती हैं। जातक आमतौर पर कम काम की ओर झुकाव रखता है।


बृहस्पति का वक्री होकर कुंडली में गोचर करना

वैदिक ज्योतिष में गुरू का वक्री होना शुभ व अशुभ दोनों ही परिणाम देता है। ज्योतिषाचार्यों की माने तो गुरू का वक्री होकर कुंडली में बैठना कहीं न कहीं जातक को अधिक प्रभावीत करता है। उल्टे दिशा में गुरू का चलना जातक के लिए सही नहीं होता है। यह जरूर जातक के लिए परेशानी लेकर आता है। लेकिन परेशानी कितना गंभीर होगा यह तो स्थिति पर निर्भर करता है।


खगोलीय दृष्टि से बृहस्पति का वक्री होना

गुरू की वक्री विशेष रूप से वह खगोलीय घटना है जब सौर मंडल में बृहस्पति ग्रह आगे की ओर न बढ़कर पीछे की ओर बढ़ता है। गुरू प्रतिवर्ष दो से तीन बार वक्री चाल चलते हैं। 


वक्री बृहस्पति का मानव जीवन पर प्रभाव

ज्योतिष में उल्लेखित 12 भाव के मुताबिक देखा जाए तो वक्री बृहस्पति (Jupiter Retrograde) का प्रभाव भिन्न होता है।

गुरू बृहस्पति कुंडली के पहले भाव में वक्री होकर विराजना जातक को विद्वान और गुणी बनाता है। स्वस्थ और आकर्षक शरीर प्रदान करता है। जातक सार्वजनिक जीवन में मान सम्मान प्राप्त करता है।  

वक्री बृहस्पति का दूसरे भाव में होना जातक अनरगल खर्च करता है। धन संचय करने में परेशानी होती है। इन्हें पैतृक संपत्ति प्राप्त होती हैं, परंतु ये उसका महत्व नहीं समझ पाते हैं।

वैदिक में जातक की कुंडली में यदि गुरू वक्री अवस्था में तीसरे स्थान में बैठें हो तो उसका मिलाजुला प्रभाव मिलता है। जातक स्वयं के प्रयास से उच्च पद प्राप्त करता है। जातक धन संचय करने में कामयाब होता है परंतु धन और पद उन्माद में अहंकारी हो जाता है।

कुंडली के चौथे भाव में बैठा वक्री बृहस्पति जातक को अहंकारी बनाता है। ऐसे जातक परिवार और समाज के प्रति उदार नहीं होते हैं। दूसरों के प्रति अपने मन पूर्वाग्रह रखते हैं। बिना मतलब दुश्मनी पाल बैठते हैं। जीवन में जातक धन तथा सम्मान हासिल करने में कामयाब होते हैं।

बृहस्पति वक्री (Jupiter Retrograde) होकर पंचम स्थान में बैठना जातक को अपने बच्चों के प्रति कठोर बनाता है। ऐसे जातक कई स्त्रियों से संबंध रखते हैं। ज्योतिष के अनुसार पंचम भाव में वक्री गुरु संतानसुख में भी बाधा उत्पन्न करता है।

पत्रिका के छठे भाव में वक्री गुरु का होना जातक को बलवाल को अपनाने वाला, शक्तिशाली और विरोधियों को परास्त करने में सक्षम बनाता है। जातक व्यापार के तुलना में नौकरी से अधिक लाभ प्राप्त  होता है।


कुंडली के अन्य छः भाव में वक्री बुध का प्रभाव

सपत्म भाव में गुरू का वक्री होना जातक के लिए जातकों का विवाह के बाद भाग्योदय का कारक बनता है। जातक को जीवनसाथी उच्चकुल का धनवान तथा  परोपकारी मिलता है।

कुंडली के आठवें भाव में वक्री का होना जातक को तंत्र-मंत्र विद्या में निपुण बना सकता है। अष्टम का वक्री गुरु यदि शुभ ग्रहों के साथ बैठा हो तो जातक को पैतृक धन प्राप्त करवाता है।

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पत्रिका के नवम भाव में वक्री बृहस्पति विराजना जातक को चार भवनों का स्वामी बनाता है। जातक का सरकारी उच्चाधिकारियों से अच्छा संबंध स्थापित होता है।

दशम भाव में वक्री गुरु वाले जातकों की प्रतिष्ठा अपने पिता तथा दादा से अधिक होती है। जातक धनी होता है। जातक गैर जिम्मेदारी भी हो सकता है। निर्णय क्षमता में कमी के कारण जातक कई मौके गंवा बैठते हैं।

कुंडली के एकादश भाव में वक्री गुरु हो तो जातक लगातार आगे बढ़ने का प्रयास करता है, परंतु इनका जीवनस्तर सामान्य ही रहता है। जातक की सोच भी छोटी होती है।

द्वादश भाव में गुरू का वक्री होना जातक से शुभ कार्यों में पैसे खर्च करवाता है। जातक के गुप्त शत्रु इन्हें परेशान करने की कोशिश करते हैं, परंतु ये आपको अधिक परेशान नहीं कर पाते हैं


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