शुक्र वक्री

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्र ग्रह को मान-सम्मान, सुख और वैभव, दांपत्य सुख और भोग विलासिता का कारक माना जाता है। जिन जातकों की कुंडली में शुक्र अच्छी स्थिति में होते हैं वह जातक को हंसमुख, मिलनसार और विनोद प्रिय बनाते हैं। वहीं जब शुक्र अपनी सामान्य दिशा की बजाए उल्टी दिशा यानि विपरीत दिशा में चलना शुरू कर देता है तो शुक्र वक्री (Venus Retrograde 2020) कहलाते हैं। 

क्या है वक्री शुक्र? 

वक्री शुक्र ज्योतिष में एक स्थिति है और नौ ग्रहों में से चमकीलता और सुंदर ग्रह है। वक्री शुक्र के होने पर जातक के भीतर अलग तरह के गुणों का संचार होता है। वक्री शुक्र की वजह से जातक लोगों से घुलता मिलता नहीं है और उसे एकाकी रहना पसंद होता है। साथ ही वक्री होने पर जातक भोग विलास और पारिवारिक जीवन से दूरी बना लेता है और कभी कभी तो वह सन्यासी बनने की भी सोचने लगता है। कुंडली में शुभ शुक्र की स्थिति जीवन को सुखमय और प्रेमपूर्ण बनाती है जबकि वक्री होने पर खुशियों में कमी आने लगती है। शुक्र वक्री (Venus Retrograde) होने पर दांपत्य जीवन में अशांति और क्लेश बना रहता है और त्वचा संबंधी रोग बने रहते हैं। यदि किसी स्त्री की कुंडली में वक्री शुक्र स्थित होते हैं तो वह उन्हें आक्रामक बना देते हैं। ऐसी महिलाएं आमतौपर अपने प्रेमी या पति पर नियंत्रण रखती हैं और रिलेशनशिप खत्म होने के बाद भी पीछा नहीं छोड़ती हैं। 

वैदिक ज्योतिष में शुक्र का प्रभावी होना

वैदिक ज्योतिष, के अनुसार यदि किसी जातक की कुंडली में शुक्र शुभ स्थिति में है तो उस जातक को अच्छे परिणाम मिलते हैं। शुक्र तो प्रेम और भोग विलाश का अधिपति माना गया है। यदि कुंडली में शुक्र 7वें भाव में किसी ग्रह के साथ संबंध बनाता है तो पारिवारिक जीवन और गृहस्थ जीवन सुखमय बना रहता है। शुक्र जब 12वें घर में होता है तो तब धन और उच्चपद को प्रदान करता है। अगर किसी पुरुष की कुंडली में शुक्र शुभ स्थिति में होता है तो वह ऋंगारप्रिय होता है। 


कुंडली में शुक्र के कमजोर होने पर 

यदि कुंडली में शुक्र नीच राशि में हो तो जातक की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं रहती हैं। जातक को आर्थिक पक्ष मजबूत करने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है। साथ ही कमोजर शुक्र की वजह से जीवन में मान-सम्मान भी प्राप्त नहीं होता है। कुंडली में शुक्र के कमोजर होने पर विवाह में देरी होने और वैवाहिक जीवन में वैचारिक मतभेद हमेशा बना रहता है। कुंडली में शुक्र के पीड़ित होने पर स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बनी रहती हैं। पुरुष की कुंडली में शुक्र पीड़ित होने पर स्पर्म काउंट की समस्या पैदा होती है जबकि महिलाओं की कुंडली में शुक्र के पीड़ित होने पर मासिक धर्म संबंधी समस्याएं पैदा हो जाती हैं। 


शुक्र का वक्री होकर कुंडली में गोचर करना

वैदिक ज्योतिष के अनुसार, वक्री ग्रह सामान्य गति से चलने वाले ग्रहों की तरह ही होते हैं। नवग्रहों में सूर्य और चंद्रमा हमेसा सीधा सामान्य दिशा में ही चलते हैं ये कभी भी वक्री नहीं होते हैं। इसके विपरीत राहु और केतु सदा उल्टी दिशा यानि हमेशा वक्री रहते हैं। भाव के अनुसार वक्री शुक्र अलग परिणाम देता है तो आइए जानते हैं। 


खगोलीय दृष्टि से शुक्र का वक्री होना

शुक्र की वक्री (Venus Retrograde) विशेष रूप से वह खगोलीय घटना है जब सौर मंडल में शुक्र आगे की ओर न जाकर पीछे की ओर चलता दिखाई देता है। शुक्र के कुल वक्री दिन 43 होते हैं। शुक्र प्रतिवर्ष 2 बार वक्री चाल चलता है। 


वक्री शुक्र का मानव जीवन पर प्रभाव

कुंडली के 12 भावों के अनुसार देखा जाए तो वक्री शुक्र का प्रभाव अलग-अलग होता है। 

यदि वक्री शुक्र कुंडली के प्रथम भाव में विराजमान हो तो जातक को अपनी शारीरिक सुंदरता पर घमंड आ जाता है। आमतौर पर वक्री शुक्र कुंडलीधारक विपरीत लिंग वालों को सहजता से अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं और जिस वजह से वह बदनाम भी होते हें। 

कुंडली के द्वितीय भाव में वक्री शुक्र होने पर जातक को कामुक और विलासी बनाता है। साथ ही भोग विलासता के साथ जीवन जीने की इच्छा भी पैदा करता है जिसकी वजह से वह गलत राह भी पकड़ लेता है। वक्री शुक्र की वजह से जातक दिखावा बहुत करते हैं और दिखावे की वजह से धन भी बहुत खर्च करते हैं। 

जातक की कुंडली के तृतीय भाव में अकेला वक्री शुक्र अशुभ फल देता है। जातक व्यभिचारी और रंगीन मिजाज होने की वजह से समाज में उसके मान-सम्मान में कमी आती है। शत्रु पक्ष से हमेशा परेशान रहता है और संपत्ति भी नष्ट हो जाती है। 

किसी कुंडली के चतुर्थ भाव में वक्री शुक्र भूमिपति होने की ओर इंगित करता है परंतु जातक को अपनी भूमि और भवन से दूर भी कर देता हैं। यदि वक्री शुक्र मंगल से प्रभावित हो तो जातक को अपने परिवार से लगाव कम हो जाता है और बौद्धिक विकास में बाधा आती है। 

किसी जातक की कुंडली में वक्री शुक्र का पंचम भाव में होने पर जातक को कन्या के रूप में संताने प्राप्त होती है। जातक की रूचि लॉटरी, जुआ जैसे खेलों में होती है। इतना ही नहीं वक्री शुक्र की वजह से जातक समलैंगिक भी होता है लेकिन उसे लव लाइफ में असफलता ही हाथ लगती है। 

छठे भाव में यदि वक्री शुक्र (Venus Retrograde) बैठा है तो ऐसे में जातक स्त्रियों से द्वेष रखता है और उसके जीवन में शत्रु बहुत होते हैं। जातक अपनी पैतृक संपत्ति को नष्ट भी कर देता है। वक्री शुक्र की वजह से जातक दूसरों को शारीरिक पीड़ा देते रहते हैं। 


कुंडली के अन्य छः भाव में वक्री शुक्र का प्रभाव

कुंडली के सांतवे भाव में शुक्र का वक्री होकर बैठना जातक के जीवन में अनेक शत्रुओं को पैदा करता है। ऐसे जातक अपनी लव लाइफ और मैरिड लाइफ में पार्टनर के प्रति पूर्ण निष्ठा और विश्वास नहीं रखते हैं। ये जातक धनी और एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर के प्रति ज्यादा रुचि रखते हैं। 

आठवें भाव में वक्री शुक्र होने पर जातक को पिता का लिया हुआ कर्ज चुकाना पड़ता है। जातक के जीवन में कर्ज का मर्ज हमेशा बना रहता है। वक्री शुक्र होने पर जातक की मृत्यु किसी रोग या जानवर के काटने से हो सकती है।

कुंडली के नवम भाव में वक्री शुक्र (Venus Retrograde) का विराजना जातक को सूदखोर बना देता है। ये लोग केवल दिखावे की वजह से धार्मिक कार्यों, दान और यज्ञ में भाग लेते हैं बल्कि इनके मन में सकारात्मकता नहीं होती है। 

दशम भाव में शुक्र का वक्री होकर विराजना जातक को धनवान और वैभवशाली बनाता है। जातक का विवाह उच्च कुल में होता है। लेकिन जातक का माता के साथ विवाद बना रहता है। इस भाव में वक्री शुक्र जातक को पदोन्नति, मान-सम्मान और वैभव दिलाता है। 

पत्रिका के एकादश भाव में वक्री अवस्था में शुक्र का बैठना जातक को धन-संपत्ति, वाहन सुख और नौकर चाकरों का सुख प्राप्त कराता है। 

द्वादश भाव में वक्री शुक्र का विराजना जातकों को ख़र्चीला बनाता है। जातक धन एकत्र करने में असफल रहते हैं। जातक को पित्त कफ की समस्या रहती है और पुरुष की कुंडली के 12वें भाव में वक्री शुक्र परस्त्री के साथ रहने की ओर दर्शाता है।


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