मंगल वक्री

मंगल ग्रह का वक्री (Mars Retrograde 2020) होना वैदिक ज्योतिष में अत्यंत मानये रखता है। मंगल ग्रह को वैदिक ज्योतिष में उत्साह व ऊर्जा का कारक माना जाता है। ऐसे में मंगल का किसी जातक की कुंडली में वक्री अवस्था में बैठना जातक को ऊपर गंभीर प्रभाव डालने का कार्य करता है। वक्र होकर मंगल का कुंडली में बैठना जातक को क्रूर बना देता है। ज्योतिषाचार्यों की माने तो मंगल ग्रह एक क्रूर ग्रह है। इस लेख में हम मंगल का वक्री होकर कुंडली में बैठना आपके ऊपर कैसा प्रभाव डालेगा। इसके बारे में बताएंगे। 

वैदिक ज्योतिष में मंगल का प्रभावी होना

वैदिक ज्योतिष में मंगल का प्रभावी होना जातक को पराक्रमी व निडर बनाता है। जातक की मानसिक शक्ति अधिक होती है। जातक दूरदर्शी होता है। मंगल के प्रबल प्रभाव वाले जातक केवल तथ्यों के आधार पर ही निर्णय लेने में विश्वास रखते हैं। इसके साथ ही जातक अपने निर्णय को व्यवहारिक रूप देने में भी सक्षम होते हैं। ऐसे जातक आमतौर पर किसी भी प्रकार के व किसी के भी दबाव के आगे घुटने नहीं टेकता है। ऐसे जातकों पर दबाव डालकर अपनी बात मनवा लेना नामुमकिन होता है। इन जातकों को दबाव के बजाय तर्क देकर बात समझा या मनाना उचित होता है। अन्यथा ये भी बगावत कर सकते हैं।

मंगल का कुंडली में प्रभावी होना

किसी जातक की कुंडली में अगर मंगल प्रभावी है तो ऐसे जातक शारिरीक तौर पर प्रबल होते हैं। इनके अंदर अधिक क्षमता होती है। जातक खेल में सफल होता है। क्योंकि मंगल को खेल का कारक भी माना जाता है। ऐसे में जातक पर मंगल की कृपा होना उसे खेल में शिखर तक पहुंचने में मदद करता है। इसके साथ ही मंगल का प्रभावी होना जातक को पुलिस, सेना व अग्निशमन दल में कार्य करने में सहायता करता है। ऐसे जातकों में साहस की कमी नहीं होती है। इसलिए वे सुरक्षा व रक्षा के क्षेत्र में काम करना पसंद करते हैं। 


मंगल का कुंडली में कमजोर होना

मंगल का कुंडली में कमजोर होना जातक को क्रोधी तथा हिंसक बनाता है। जातक बिना सोचे ही निर्णय लेते हैं। जिसके चलते उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसके साथ ही जातक का पारिवारिक जीवन भी कष्टदायक होता है। साथी के साथ अकारण ही विवाद होता है। जिसके चलते आप एक दूसरे दूर हो सकते हैं या हो जाते हैं। शारीर में रक्त की कमी का भी कारण मंगल बनाता है। वैदिक ज्योतिष में मंगल को रक्त का कारक कहा गया है। जातक में आत्मबल की कमी भी रहती है। स्वयं पर जातक विश्वास नहीं कर पाता है।


वक्री मंगल का मानव जीवन पर प्रभाव

ज्योतिष में उल्लेखित 12 भाव के मुताबिक देखा जाए तो वक्री मंगल का प्रभाव अलग –अलग होता है।

कुंडली में वक्री मंगल यदि प्रथम भाव में हो तो व्यक्ति झूठ बोलने में माहिर होता है। यानी की वह अधिक झूठ बोलता है ऐसे व्यक्ति पर विश्वास नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही व्यक्ति में अहंकार अत्यधिक होता है और स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने की भूल कर बैठता है।

वक्री मंगल यदि पत्रिका में द्वितीय भाव में विराजमान है, तो व्यक्ति को क्रोधि व असभ्य बना देता है। ऐसा व्यक्ति आकर्षक वस्तुओं और सुंदर स्त्रियों के प्रति हीन भावना रखते हैं। मौका पाते ही कुछ गलत करने की कोशिश भी कर सकते हैं। साथ ही जातक भौतिक सुख-साधनों में अधिक रूचि लेते हैं। इसे पाने के पीछे दौड़ते रहते हैं। 

वक्री मंगल अगर जन्म पत्रिका के तृतीय भाव में बैठा है तो इस स्थिति में जातकों का अपने भाई-बहनों और परिजनों के साथ अच्छे संबंध नहीं रहते हैं। इनके बीच मन मुटाव बना रहता है। ऐसा जातक जीवन में अनुशासनहीन हो जाता है और किसी के नीचे काम करना पसंद नहीं करता है। जिसके चलते उसे कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। 

चतुर्थ भाव में वक्री मंगल बैठा हो तो जातक क्रोधी, हठी और क्रूर बन जाता है। ऐसे में जातक अकारण ही परिवार में लड़ाई-झगड़े करते रहते हैं। व्यक्ति किसी की भी नहीं सुनता और निरंकुश हो जाता है जो मन में आता है वही करता है। चाहे उससे किसी का नुकसान ही हो जाए। वह केवल अपने हित की सोचता है।

वैदिक ज्योतिष में पंचम भाव का वक्री मंगल अत्यधिक हानिकारक माना जाता है। जातक प्रेम संबंध के में अपने साथी को केवल उपभोग की वस्तु समझता है। ऐसा व्यक्ति दुष्कर्म और गलत हरकतें करता है। स्वयं की पत्नी और प्रेमिका के साथ अच्छा व्यवहार नहीं करता है। 

छठे भाव में वक्री मंगल होने पर जातक को सेहत के मोर्चे पर परेशानियों का सामना करना पड़ता है। जातक रोगों से घिरा रहता है। समय पर दवाई नहीं लेने के कारण अपनी बीमारी स्वयं बढ़ा लेते हैं। माना जाता है कि व्यक्ति अपने करीबी लोगों के साथ कठोर व्यवहार करता है।


कुंडली के अन्य छः भावों में वक्री मंगल की बात करें तो - 

कुंडली के सप्तम भाव में वक्री मंगल होने पर व्यक्ति का मन गुप्त संबंधों में लगा रहता है। ऐसा व्यक्ति व्यापार में हानि का सामना करते हैं। खास कर ये जातक अपने साथी यानी की साझेदार से धोखा खा जाते हैं। इसके साथ ही कोर्ट-कचहरी के मामले भी इनके जीवन को उलझा कर रखते हैं। 

वैदिक ज्योतिष में अष्टम भाव का वक्री मंगल जातक को जीवन भर दुख देते रखता है। ऐसा जातक तुनकमिज़ाज होते हैं और छोटी-छोटी बातें सहन नहीं कर पाते जिसके चलते ये परेशानी में पड़ जाते हैं। कार्यस्थल पर भी ये इसी के चलते नौकरी से त्यागपत्र देते हैं।

कुंडली के नवम भाव में वक्री मंगल का बैठना जातक नास्तिक होते हुए भी आस्तिक होने का ढोंग करता है और धर्म के नाम पर लोगों को ठगता है। ऐसे में व्यक्ति की कुंडली में अन्य ग्रह प्रभावी कमजोर हो तो संभव है कि व्यक्ति जेल भी चला जाए या किसी कानूनी पचड़े में पड़ जाए।

ज्योतिष की माने तो दशम भाव का वक्री मंगल जातक को भटकाता बहुत है। चाहे वह नौकरी व करियर के लिए भटके या अपने पारिवारिक ज़रूरतों को पूरी करने के लिए भटके परंतु जातक को भटकना पड़ता है।

एकादश भाव में वक्री मंगल हो तो ज्योतिषियों का कहना है कि ऐसे जातकों की दोस्ती अपने से निम्न वर्ग के लोगों के साथ रहती है। जिसके कारण इनके मित्र भरोसेमंद नहीं होते हैं। बुरे वक्त में साथ आने के बजाए वें साथ छोड़कर भाग जाते हैं।

द्वादश भाव का वक्री मंगल (Mars Retrograde) जातक के सेहत के लिए सही नहीं होता है। जातक का रहन सहन भी ठीक नहीं होता है। जातक की जीवन शैली पूरी तरह गड़बड़ रहती है, जिससे कारण वह कई रोगों का शिकार हो जाता है।


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